धुकधुक सी धौंकनी धरणी की,
धधक-धधककर धिपती है।
हांफ-हांफकर हवा लहकती,
धरती की छाती लीपती है।
प्राण-वायु निष्प्राण जान-सी,
मारे- मारे फिरती है।
वसुधा के वल्कल-वक्ष पर,
किरण आग-सी गिरती है।
पेड़ों की सूखी टहनी का,
डाल-डाल मुरझाता है।
और फुनगी का पात-पात,
मरघट मातम सुर गाता है।
कंधे पर जुआ बैलों के,
बिन जोते जल जाता है।
धंसा फाल लोहे का हल के,
खेतों में गल जाता है।
लू की लकलक लपटों में,
काल तरंगे घूमती है।
श्मशान में शिशुओं को,
'चमकी' से चाट चट चूमती है।
पत्रकार के पाखंडो से,
आई सी यू सहम जाता है।
मृगछौनों के मौत का मातम,
नहीं रहम कोई खाता है।
सियासत की सड़ी सड़कों पर,
गिद्ध-चील मंडराते है।
बच्चों की लाशों को ज़ुल्मी,
नोच-नोचकर खाते हैं।
जब-जब हबस हैवानियत की,
मुर्दों में मदमाती है।
रक्त राजनीति से रंजित,
माटी यह सरमाती है।
प्रदूषण है पग-पग पर,
प्रशासन हो या कुदरत!
गरीब-गुरबा ही मरते है,
कुटिल कौम!कैसी फितरत!!
नमस्कार सर
ReplyDeleteतत्कालीन परिस्थितियों पर कुठाराघात है आपकी ये अभिव्यक्ति।अति सुंदर।
अत्यंत आभार।
Deleteदारुण दावानल है, ना जाने कैसा अभिशाप है।
ReplyDeleteनोनिहाल कैसे काल कलवरित हो रहे हैं
और संवेदनाओं के सिर्फ नाटक हो रहें हैं।
हृदय द्रवित करती प्रस्तुति ।
अत्यंत आभार।
Deleteअद्भुद
ReplyDeleteअत्यंत आभार।
Deleteआभार हृदयतल से।
ReplyDeleteअभिव्यक्ति ऐसी कि पढ़ने सुननेवाले के हृदय में कसक उठा दे। कई मुद्दों को छूती हुई प्रभावशाली रचना। सादर।
ReplyDeleteलेखक की लय जब पाठक पढ़ ले तो रचना सार्थक हो जाती है। बहुत आभार।
Deleteमानवीय संवेदनाओ को झझकोरती और राजनैतिक विद्रूपता का पर्दाफाश करती रचना जिसमें रोष है , क्षोभ है साथ में सनसनी के भूखे मीडिया को कड़ी फटकार है | सादर
ReplyDeleteजी, आभार।
Deleteअच्छी कविता विश्वमोहन जी .
ReplyDeleteजी, बहुत आभार आपका।
Deleteपर्दाफाश करती रचना
ReplyDeleteजी, अत्यंत आभार।
DeleteInnovative narration
ReplyDeleteजी, अत्यंत आभार।
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ReplyDeleteआभार!!!
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