Saturday, 5 September 2026

‘शिक्षक दिवस’ या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’


आज शिक्षक दिवस के पुनीत  अवसर पर हमारे मन में हमारे दो राष्ट्रपति सजीव हो उठते हैं। एक तो राधाकृष्णन और दूसरे अब्दुल कलाम। पहले ने  अपनी  जन्मतिथि को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया, तो दूसरे ने अपने जीवन की अन्तिम साँस भी शिक्षक की भूमिका निबाहते हुए ही ली। ज्ञातव्य है कि एक कक्षा में पढ़ाते समय ही कलाम साहब का देहावसान हो गया था। पता नहीं भारत के भविष्य को ऐसे महिमामय महापुरुष और भारत के सत्ता शिखर को ऐसे सुखद संयोग फिर कभी नसीब हो या न हो! परन्तु यह  बात तो तय है जो जीवन के कुरुक्षेत्र में योग का अमृत बाँचते हुए आध्यात्मिक गुरु योगेश्वर श्री कृष्ण ने किंकर्त्तव्यविमुढ और आत्मिक उलझनों में उलझे अवसन्न अर्जुन को ये शाश्वत वचन सुनाए थे कि  ‘कर्म के बीज का नाश नहीं होता’। भारत की यह माटी ऐसे पुनीत ज्ञान-कर्मों, प्रवचनों और परम्पराओं के बीज से पटी है कि ज्ञानवाचक महान गुरुओं की यह महान श्रिंखला शायद ही कभी लुप्त हो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार  से प्रकाश में जाने की उत्कण्ठा  ही हमारे ज्ञान दर्शन का मूल रहा है।  ‘गु’ का अर्थ तमस अर्थात अज्ञान का अन्धकार  होता है। ‘रु’ का अर्थ निवारण करने वाला होता है। अत: गुरु का शाब्दिक अर्थ अन्धकार  से निजात दिलाने वाला होता है। अर्थात जो असत्य से सत्य की ओर ले जाए। ‘शिश’ धातु से व्युत्पन्न ‘शिष्य’ शब्द का अर्थ भी सीखना होता है। इसलिए हमारी ज्ञान परम्परा  में शिष्य ज्ञान का साधक होता है जिसके जीवन का लक्ष्य अज्ञानता के तिमिर का उच्छेदन  कर आत्मज्ञान और विवेक के आलोक से दीप्त होना है। 

वैदिक काल की गुरुकुल व्यवस्था एक स्वायत्त व्यवस्था होती थी जिसका सबकुछ कुलपति के अधीन होता था। इस पर राज्य का कोई नियन्त्रण नहीं होता था, बल्कि गुरु राजमहल के लिए विशेष श्रद्धा के पात्र होते थे। यह स्व-वित्तपोषी भी होता था। छात्र भिक्षाटन कर आश्रम की व्यवस्था चलाते थे। गाँव- समाज से भी लोग गुरुकुल को सहयोग देते थे। राज्य भी सहयोग कर दिया करता। किन्तु गुरुकुल पर बाहर का कोई प्रशासनिक नियन्त्रण नहीं रहता। यह पूर्ण रूप से आवासीय व्यवस्था थी जहाँ गुरु की छत्रछाया में बिना किसी भेदभाव के छात्र अपने अध्ययन में लीन होते थे। यहाँ जीवन की समस्त विधाओं का पाठ पढ़ाया जाता। गुरु अपने आसन पर बैठकर छात्रों को पाठ पढ़ाते और उनके समीप नीचे बैठे छात्र श्रुति परम्परा में उन पाठों को आत्मसात करते। इसे उपनिषद कहते हैं। गुरु शिष्य को साहचर्य भाव से देखते:

‘स: नौ अवतु, स: नौ भुनक्तु स: वीर्यं करवावहै।

तेजस्वी नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै’।

गुरु का स्थान भी अत्यन्त पूजनीय होता – ‘गुरुम सर्वदा पूज्यम श्रद्धया समन्वित:’। मान्यता है कि शिव आदि गुरु हैं। उनके सात शिष्य – अत्रि, भृगु, गौतम,  वशिष्ट, अंगिरा, मरिचि और पुलह – सप्तर्षि नाम से जाने जाते हैं। इन सातों गुरुओं के आश्रम से नि:सृत  विचार पद्धति (school of thought) एक शाश्वत परम्परा के रूप में आगे बही। कालान्तर  में अन्य गुरुओं और गुरुकुल परम्पराओं का विकास होते रहा तथा समाज में ज्ञान की बहुमुखी धाराएँ प्रस्फुटित होती रहीं। प्रसिद्ध गुरु-शिष्यों की बात करें तो महर्षि धौम्य – आरूणी, आरूणी -सत्यकेतु, वशिष्ट/विश्वामित्र – राम, वाल्मीकि – लव कुश, सन्दीपनी -कृष्ण, परशुराम – कर्ण, द्रोण – अर्जुन, गौतम -जाबालि, वृहस्पति – देवता, शुक्राचार्य – दानव आदि प्रमुख रहे। बाद में आलार कलाम – गौतम बुद्ध, चाणक्य – चन्द्रगुप्त, आदि शंकराचार्य – ( पद्मपाद, मण्डन मिश्र, हस्तामलक, तोटक), रामानन्द  –( अनन्तानन्द, कबीर, सुखानन्द , धना, सेन, सुरसुरानन्द, पद्मावती, नरहरि, पीपा, भावानन्द, धरहरी, रैदास), बाबा नरहरि – तुलसीदास, मत्स्येन्द्रनाथ – गोरखनाथ, रामदास समर्थ – शिवाजी, तोतापुरी महाराज – रामकृष्ण परमहंस, रामकृष्ण परमहंस – स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विरजानन्द  – स्वामी दयानन्द,  गुरु गोविंद सिंह – ( बन्दा सिंह बहादुर, दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकाम सिंह, हिम्मत सिंह, साहिब सिंह) जैसे गुरु -शिष्यों ने ज्ञान परम्परा की इस गरिमा को बनाए रखा।  योग, भक्ति, अध्यात्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, ज्योतिष, वेदांग, चिकित्साशास्त्र, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद, तन्त्र-साधना, रसायनशास्त्र, वैमानिकी, गणित, धातुशास्त्र, कृषि, वनस्पति, मौसम और नीतिशास्त्र जैसे ज्ञान का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं था जो इन महान गुरुओं की परिधि के परे हो।  जीवन का रहस्य, आत्म- अन्वेषण, परमात्म परिचय और मोक्ष की प्राप्ति समस्त ज्ञान के उद्देश्यों की परिणती थी। गुरुओं के द्वारा दिए इस ज्ञान दर्शन  से आलोकित शिष्य और समस्त समाज की दृष्टि में गुरु का स्थान सर्वोच्च था –

गुरुर्ब्रह्मा, गुरु: विष्णु, गुरु देव महेश्वर,

गुरुदेव साक्षात पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:।

गुरु नानक ने तो गुरु के स्थान को ईश्वर से भी ऊँचा बताया –

गुरु गोबिन्द दोउ खड़े, काकों लागे पाय,

बलिहारी गुरुदेव की गोबिन्द दियो बताय।

कबीर ने कहा –

गुरु कुम्हार शिष्य घट है, गढि गढि काढ़ै खोट,

अन्तर  हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।

अर्थात गुरु अपने शिष्य को वैसे ही गढ़ता है जैसे एक कुम्हार अपने मिट्टी के घड़े को। अन्दर से अपने हाथों का सहारा  देकर बाहर से हल्की  चोट देता है ताकि वह शिष्य रूपी घड़ा अपनी आकृति ग्रहण कर सके। इसलिए भारतीय परम्परा में सबसे बड़ा दाता गुरु को ही माना गया है –

‘गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान,

तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।

लोक मानस के महाकवि तुलसी तो गुरु की महिमा शिव और ब्रह्मा से भी ऊपर मानते हैं –

गुरु बिन भव निधि तरई न कोई,

जौ बिरंचि संकर सम होई।

यह परम्परा थी कि राजा या सम्राट जब कभी किसी गुरुकुल या विश्वविद्यालय में जाते तो प्रवेश द्वार पर ही  अपना राजमुकुट और अपने अंगरक्षक छोड़ जाते। गुरु के आश्रम  में प्रवेश करने पर गुरु अपने ऊँचे आसान पर बैठते और राजा नीचे ज़मीन पर। बौद्ध विहार भी शिक्षा के केन्द्र बने रहे। तक्षशिला, नालन्दा, ओदन्तपुरी, विक्रमशिला  जैसे शिक्षा संस्थान अपने विद्वान गुरुओं की गरिमा के साथ छात्रों के विद्या अर्जन के प्रमुख केन्द्र बने रहे। इनकी संरचना भी पारम्परिक गुरुकुलों की तर्ज़ पर ही कमोवेश क़ायम रही और विश्व के कोने-कोने से छात्र यहाँ अध्ययन हेतु आते रहे।

मुग़लों के आगमन के बाद से स्थिति में परिवर्तन दिखना शुरू हो गया। तब शिक्षा को राजकाज की भाषा फ़ारसी से जोड़ा जाने लगा और मदरसों एवं मकतबों की स्थापना होने लगी जिसे राज्य का अनुदान मिलना शुरू हो गया और धीरे-धीरे शिक्षा संस्थानों की यात्रा राजाश्रयी या सरकारीकरण की ओर उन्मुख होने लगी। अंग्रेज़ों के आने के बाद शिक्षा की अवधारणा ही बदल गयी। अंग्रेज़ों को अपना राज चलाने के लिए भारी मात्रा में किरानियों की ज़रूरत पड़ी और उन्होंने उसी हिसाब से शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। यहाँ से भारतीय शिक्षा तथा शिक्षकों के चाल और चरित्र पर  ब्रिटिश नीति के  व्यापक परिवर्तन का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हो गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हम अंग्रेज़ी पद्धति पर ही आधुनिक शिक्षा के मॉडल का अनुसरण करते रहे। 

आज स्थिति यह है कि मेकौले के पदचिह्नों पर चलती शिक्षा-व्यवस्था ने हमारे प्रशासन में नीचे से ऊपर तक किरानी भर दिए। लिपिक से सचिव तक।  गुरु की स्थिति  ‘शिक्षण-कर्मचारी’ की हो गयी। ये ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अपने कार्य निष्पादन में ‘शिक्षणेत्तर किरानियों’ के नियन्त्रण में आ गए। शिक्षा संस्थान या तो पूरी  तरह से राज्य के नियन्त्रण  में आ गए या पूरी तरह निजी नियन्त्रण में।  सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कर्मचारियों के मुख्य कार्य में खाना बनवाना, चुनाव की मतदाता सूची तैयार करना और जनसंख्या कर्मचारी के रूप में लोगों की गिनती करना है। व्यावसायिकता, समाज की गिरती नैतिकता, शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा के प्रतिशत का काम हो जाना, राजनीति से अच्छे लोगों का  बहिर्गमन और समाज के निकृष्टतम तत्वों से इसका भर जाना, अर्थतन्त्र की समाजतन्त्र पर गहरी पकड़, मेकौले की सन्तति, किरानियों, का भ्रष्टाचार के उत्तुंगतम शिखर का अतिक्रमण कर लेना, जीवन के मूल्यों की परिभाषा का बदल जाना, नयी पीढ़ी का अपने मौलिक संस्कार और गौरवमयी परम्परा से कट जाना, शिक्षा का एक उद्योग-धन्धा  का रूप ले लेना, जगह- जगह शिक्षा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह दुकानों का खुल जाना,  घोर असभ्य, अशिक्षित, काला अक्षर भैंस बराबर और शैक्षणिक कुसंस्कारों के प्रतिनिधियों का शिक्षा मन्त्री  तक  बन जाना … ऐसे ढेरों कारण आज के दिन में उपस्थित हैं, जिसने समाज की सबसे गौरवमयी संस्था, ‘गुरु’, को एक कमज़ोर ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अर्थात ‘शिक्षक’ के रूप में बना दिया है।

हरिशंकर परसाई ने एक जगह लिखा है कि दिवस हमेशा से कमज़ोरों का या लुप्त होती जा रही चीज़ों का ही मनाया जाता है। इसीलिए हमारे यहाँ डॉक्टर दिवस, इंजीनियर दिवस, शिक्षक दिवस आदि मनाया जाता है। ये सभी समाज के निर्माण और उत्थान की रीढ़ हैं, लेकिन आज की व्यवस्था के  प्रशासनिक  ढाँचे में बेचारे सबसे लाचार और कमज़ोर हैं। आपने कभी थानेदार दिवस, किरानी साहेब दिवस, बड़ा बाबु दिवस या मन्त्री दिवस नहीं सुना होगा। जब भी कोई नया तबक़ा इन कमज़ोरों की सूची में शामिल होगा, उसका दिवस मनाया जाएगा। हम आभारी हैं राधाकृष्णन के, जिन्होंने उन्नीस सौ बासठ में ही शिक्षकों के भविष्य को भाँप लिया था और अपने जन्मदिन को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया था। राधाकृष्णन इस सनातन परंपरा के उद्भट विद्वान दार्शनिक थे। उनकी और कलाम दोनों की शिक्षा किसी विदेशी संस्थान में नहीं हुई थी। वे विशुद्ध भारतीय मिट्टी और भारतीय संस्कार की उपज थे।  फ़िलहाल उनकी स्मृति ही आज के शिक्षकों और इस देश के लिए गर्व की अनुभूति का एकमात्र कारण प्रतीत होता है। अब इसे  ‘शिक्षक दिवस’ कहें या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’!

‘शिक्षक दिवस’ की बधाई और एक नए भविष्य की आशा की शुभकामनाएँ! 



Sunday, 9 August 2026

पर्यटन निश्चिन्तता

 

हमने जो शब्दावली चुनी है, ‘पर्यटन निश्चिन्तता’ इसे अंग्रेज़ी में टुरिज़म श्योरिटी (tourism surety) कहते

हैं। यह इक्कीसवीं सदी का शब्द है। यह ‘टुरिज़म सेफ़्टी’ और ‘टुरिज़म सिक्यूरिटी’ को समाहित किए एक

विस्तृत अर्थवाली शब्दावली है। ‘सेफ़्टी’ शब्द का सम्बन्ध क्षति पहुँचाने वाली उन चुनौतियों से हिफ़ाज़त का

है जिनका कारण कोई भूल-चूक या ग़ैर-इरादतन हो। जैसे दुर्घटनावश होटल में आग लग जाय, मकान गिर

जाय, वाहन-दुर्घटना, प्राकृतिक-आपदाएँ आदि।

‘सिक्यूरिटी’ का अर्थ उन चुनौतियों से बचाव है जो पूर्णत: इरादतन पैदा की जाती है। जैसे चोरी-डकैती,

छीना-झपटी, आतंकवादी घटनाएँ, आन्तरिक अशान्ति, आपराधिक घटनाएँ आदि। इन शब्दावलियों के

आलोक में यदि हम पर्यटन-उद्योग के संकट की समीक्षा करें तो सम्भवतः हमारी दृष्टि ज़्यादा वैज्ञानिक और

विश्लेषण के स्तर पर ज़्यादा प्रखर हो। पहले हम पर्यटन की दशा और दिशा पर भी थोड़ी नज़र फेर लें।

पर्यटन का अर्थ अपनी जगह से किसी सार्थक उद्देश्य के साथ बाहर जाना है। यह एक सकारात्मक विस्थापन

है। इसकी सकारात्मकता की शक्ति का अन्दाज़ा आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि भारत में आर्यों को

बाहरी बताने वाले मुलर का ‘आर्य-अतिक्रमण-सिद्धान्त’ जब वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त निष्कर्षों की

कसौटी पर भहराने लगा तो इतिहासकारों ने इसे ‘आर्य-पर्यटन-सिद्धान्त’ कहना शुरू कर दिया। अब तो

बात यहाँ तक आ गयी कि आर्यों की मूल-भूमि भारत है जहाँ से पर्यटन के सिलसिले में वे दुनियों के बाक़ी

हिस्सों में छा गए। बात जो भी हो, इस पर्यटन के क्रम में पर्यटकों को कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा

इसका वृतान्त आदि काल से आधुनिक काल तक फैला हुआ है। चाहे मेगस्थनीज़ हो, ह्वेनसांग हों, अल

बरुनी हों, फाहयान हों, कोलम्बस हों, अमेरीगो हों, आदि शंकराचार्य हों, तुलसी हों, कबीर हों, राहुल

सांकृत्यायन हों, केदारनाथ के दर्शनार्थी हों, प्रयागराज के कुम्भ के स्नानार्थी हों या चिकित्सा-पर्यटन एवं

अध्ययन-पर्यटन पर निकलने वाले यात्री हों – सबकी यात्राएँ जोखिम से भरी रही हैं और उनकी चुनौतियाँ

समयुगीन विसंगतियों को उजागर करते रही हैं, भले ही उनकी प्रवृति और प्रकृति समान हो या अलग-

अलग। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता पूरी तरह से ये यात्राएँ महफ़ूज़ नहीं रहीं।

पर्यटन मानव जाति का एक सामाजिक और सांस्कृतिक उद्यम है। विकास के सोपान पर बढ़ते क़दम और

उत्तरोत्तर तकनीकी विकास ने इस सम्पूर्ण संसार को एक ‘वैश्विक-ग्राम’ अर्थात ग्लोबल-विलेज में तब्दील

कर दिया है। उन्नत संचार एवं यातायात साधनों से भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सांस्कृतिक दूरी भी अब

सिमट गयी है। इसलिए पर्यटन के उद्देश्य और इसके आयतन में भी दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ोतरी होती

जा रही है। अब घूमने-फिरने और देश-दुनिया देखने के अलावे लोग मेडिकल-टुरिज़म, व्यावसायिक-टुरिज़म

और एजुकेशन-टुरिज़म पर तक निकलने लगे हैं। यदि हम भारत की ही बात करें तो घरेलू पर्यटन के आकार

में आशातीत वृद्धि हुयी है। पड़ोसी देशों से अध्ययन के लिए छात्र और चिकित्सा के उद्देश्य से रोगियों की

संख्या बढ़ने लगी है जो भारत में अपने रहने के दौरान यहाँ के प्रमुख स्थलों चाहे वे ऐतिहासिक हों या

धार्मिक, के भ्रमण में रुचि दिखाने लगे हैं। घरेलू पर्यटन के साथ अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन में भी अपने देश के लोग

रुचि दिखाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक निश्चिन्त पर्यटन तभी कहा जाएगा जब अपने घर से निकला

पर्यटक अपनी सुरक्षित यात्रा कर पूरी तरह से महफ़ूज़ अपने घर लौट आए।

आज के समय में पर्यटक की सुरक्षा के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ मुँह बायें खड़ी हैं। पर्यटन-केंद्र वाले देश

की आन्तरिक-अशान्ति, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक-असन्तोष, उस पर बाहरी सैन्य-आक्रमण,

महामारी, प्राकृतिक आपदा जैसे अनेक कारक हैं जिससे आज का पर्यटक जूझ रहा है। किसी देश की

आन्तरिक-अशान्ति में वहाँ की क़ानून-व्यवस्था, भीड़ नियन्त्रण के समुचित प्रबन्धन का अभाव, हिंसक

आन्दोलन, स्थानीय स्तर पर चोरी, डकैती, छीना-झपटी, पर्यटकों पर हमला, यातायात की दुर्व्यवस्था,

पर्यटकों के ठहरने के असुरक्षित स्थान आदि शामिल है। प्रयाग राज में कुम्भ मेले में भगदड़ की घटना की

याद आगे के प्रबन्धकों के लिए आँख खोलने वाली घटना है। अभी हाल में ही मालवीय नगर के एक होटल में

लगी आग की भीषण दुर्घटना में दर्जनों विदेशी और देशी पर्यटक झुलस कर मर गए। नक्सलवाद के कारण


झारखण्ड, बिहार, छतीसगढ, मध्य-प्रदेश, आँध्रप्रदेश आदि राज्यों के पर्यटन उद्योग ने दम तोड़ दिया था।

यही हालत आतंकवाद को लेकर जम्मू-कश्मीर और खलिस्तान आन्दोलन के दौरान पंजाब की थी।

‘ऑपरेशन-सिन्दूर’ की पृष्ठभूमि में कश्मीर में पर्यटकों पर हुए आतंकवादी हमले सर्वदा चुनौती बने रहेंगे।

पर्यटकों की भी अपनी आर्थिक हैसियत के हिसाब से अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। निम्न-आय का पर्यटक अपने

कन्धे पर झोला टाँगे अपनी जेब के हिसाब से ही सुविधाओं का उपभोग करने को लाचार है। स्थानीय स्तर

की सुरक्षा सम्बन्धी कठिनाइयों का सबसे अधिक प्रहार उसे ही झेलना पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी के

समय पर्यटकों का फँस जाना अभी हम नहीं भूल पाए हैं। अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी

हमले ने तो अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन की रीढ़ ही तोड़ दी। पिछले दस बरसों में बाली, इज़रायल, केन्या, लॉस-

एंजल्स ,मेसिको, मोरक्को, पेरू, ईरान और सउदी अरब के देशों के पर्यटन केन्द्र को तबाह कर के रख दिया।

आतंकवाद के निशाने पर न केवल पर्यटक बल्कि पर्यटन केन्द्र की दुर्लभ दर्शनीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक

धरोहरें भी रहीं। तालिबान आतंकवादियों ने बामियान घाटी में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को तोड़

डाला था।

सुरक्षा की इन चुनौतियों को अलग-अलग उनकी प्रकृति के स्तर पर सक्षमता से निबटे जाने की आवश्यकता

है। इसके निदान का स्वरूप स्थानीय स्तर से लेकर, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों के

स्वरूप के आधार पर एकीकृत प्रयास एवं पारस्परिक सहयोग में निहित है। पारम्परिक मीडिया, समाचार-

तन्त्र एवं सोशल मीडिया से भी एक सकारात्मक भूमिका की अपेक्षा है। पर्यटकों के अन्दर सुरक्षा का

विश्वास-भाव ही पर्यटन उद्योग में जान डाल सकता है। निश्चिन्त पर्यटक, समृद्ध पर्यटन।

Wednesday, 22 July 2026

कुछ बोलो जंतर मंतर


 

नहीं ठहरता काल तनिक,

तुमसे जादा कौन जाने।

कितने आए कितने गए,

लंगड़े, बहरे काने।


ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर,

आ गए आलमगीर।

रुन्ड-मुन्ड चीखे दारा का,

हाय! हिंद की पीर।


सिसकी फिरती सरस्वती

साधक हुए अधीर।

कुछ बेचारे फाँसी लटके,

हो गए गति वे वीर।


करे खगोल की खड़ी गिनती क्या,

अंतरिक्ष में तारों की।

जरा देख दुर्गत गोदी की ,

भारत वंश चीत्कारों की।


इंद्रप्रस्थ के धर्म महल में

पांडव खाए हंटर।

नहीं सुहाती चुप्पी तेरी,

कुछ बोलो जंतर मंतर।


#जन्तरमन्तर 

#jantarmantar


Thursday, 4 June 2026

ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया!

अनजाने ॐकारा भरती,

गिरती-पड़ती हर की पौड़ी।

‘यू टू वर’ नीट धुरफ़ंथी,

नहीं सुहाती फूटी कौड़ी।

 

कबडी, कबडी, कबडी करती,

चौथे खम्भे तक जा दौड़ी।

बेनक़ाब गोदी भई मीडिया,

नौड़ी, दो कौड़ी की छौड़ी।


हक़- हकूक के हाल पर हरदम,

हकलाती, इठलाती तुतली।

ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन! 

राज महल नाचे कठपुतली। 


हिंदू-मुस्लिम  पुड़िया लेकर,

भानुमती  ये खोले पिटारा।

आगे नाथ और पीछे पगहा,

गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।


हाय! कितनी बदल गयी यह,

संवादों की अपनी  दुनिया।

कल से आते- आते ‘आज तक’,

ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया! 


Tuesday, 5 May 2026

कलम पर पहरा!

 क्या कहा कवि?

कविता कह नहीं पा रहा!

अन्दर का खदबदाता इंकलाब

भीतर ही घुटता अटका ठहरा है।

कारण,

मुल्क का आम जन बहरा है।

हो गई पंगु, पन्नों पर लेखनी,

संशय का तम गहरा है।

साफ साफ कह न! सच बोल!

कि स्याही सूख रही,

क्योंकि

कलम पर पहरा है।

Tuesday, 24 March 2026

बधाई जीते जी इलाहाबाद!


 




हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही है। यहाँ परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष नहीं, अपितु समीक्षा का विधान रहा है। शास्त्रार्थ के बिंदु विचारधारा नहीं विचार रहे हैं। मतभेद होते रहे हैं, किंतु मनभेद किंचित नहीं। दर्शनों की धारा में विचार आस्तिक और नास्तिक होते रहे लेकिन भारतीय जनमानस ने सभी विचारकों को ऋषि और ऋषि-तुल्य-सा ही सम्मान दिया चाहे वे गौतम हों, कणाद हों, कपिल हों, पतंजलि हो, जैमिनि हों, बादरायण हों, बुद्ध हों, महावीर हों या फिर चार्वाक हों! यहाँ के चिंतन और अनुशीलन में दर्शन की सम्यक्, संयोजक और उद्दीपक धार बही है। वह किसी पंथ या वाद की भँजक और तोड़क विचारधारा नहीं रही। इस परंपरा को रेखांकित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता आज के दिनों में महसूस हो रही है, जब बौद्धिक विमर्श वाले विषयों पर भी विचारधारा के नाम पर भावनाओं की शमशीर चमकने लगी है।

बात हम हाल के उद्घोषित साहित्य अकादमी पुरस्कार और उस पर मची चीं-चीं-पों-पों पर कर रहे हैं। सोशल मीडिया का विज्ञानदीप्त पटल तथाकथित विवेचनात्मक व्याख्यानों और सारगर्भित टिप्पणियों से पट गया है। पुरस्कार का मूल्याँकन विचार के वितान को त्यागकर विचारधारा की कीचड़ में रेंगने लगा है। पूरी तरह से संकीर्ण राजनीतिक रँग में रँगी दो कट्टरपंथी विचारधाराओं की धमक से देश का वातावरण आक्रांत है। एक ओर, सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचार का अरुण केतन थामे दक्षिणपंथी विचारधारा, अभी केंद्र की सरकार सहित अनेक राज्यों में इसी विचार से प्रभावित सियासी धारा बह रही है। दूसरी ओर तथाकथित सेक्युलर झंडे के नीचे बहती समाजवादी वामपंथी या फिर तथाकथित केंद्राभिगामी विचारधारा। स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर क़रीब साठ-सत्तर सालों तक देश की सियासत पर इसी पंथ का राज चला है। आज विपक्ष बनकर इसी धार पर यह पंथ अपनी नाव खे रहा रहा है। 

दक्षिणपंथी इस पुरस्कार की आलोचना इस आधार पर कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने इस पुरस्कार के मार्फ़त देश के साहित्य को वामपंथियों के हाथों गिरवी रख दिया है। उनकी दृष्टि में न केवल एक वामी महिला लेखक को यह पुरस्कार परोस दिया गया है बल्कि पुरस्कार निर्धारण करने वाली निर्णायक समिति अर्थात जुरी पर भी सरकार ने वामपंथी साहित्यकारों का क़ब्ज़ा करवा दिया है। वामपंथी चुप्पी साधे हुए हैं। सबसे मज़े की बात और उससे भी बढ़कर विडंबना तो यह है कि ये वामपंथी इस सरकार को अछूत मानने से नहीं चूकते। अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुजरा है, जब इन्हीं वामपंथियों ने इस सरकार के विरोध में अपने साहित्यिक पुरस्कार और अलंकरण वापस कर दिए थे। इस पुरस्कार-वापसी आंदोलन के तमाशबीनों के लिए आज यह संतोष और थोड़ा मनोरंजन का भी विषय है कि अब ये वामपंथी अपने विचारों की उछृंखलता को छोड़ सरकार के साहित्य अकादमी में न केवल जुरी की सदस्यता को स्वीकार रहे हैं, प्रत्युत अकादमी के पुरस्कारों को बड़े गर्व से स्वीकार भी कर रहे हैं। उधर इस बिंदु पर सरकार की भी तारीफ़ करनी होगी कि इसने बड़ी गरिमा से अपने विरोधी तेवर को पुरस्कृत किए जाने के निर्णय का अनुमोदन कर सच्चे अर्थों में न केवल अपने सनातनी संस्कार के संरक्षक होने की उद्घोषणा को पुष्ट किया है बल्कि भारत की इस सनातन परंपरा को गौरवान्वित भी किया है कि हम अपने विरोधियों के विचार को भी आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।

 आज भारत की न्यायपालिका को भारत की कार्यपालिका के इस आचरण से सबक़ लेने की घड़ी भी है। पिछले दिनों पाठ्यक्रम में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शामिल किए जाने के मामले में अपनी तथ्यपूर्ण आलोचना से बिफ़री न्यायपालिका को आज अपनी कार्यपालिका के इस व्यवहार को देखना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्कार से परिपूर्ण सरकार के इस सभ्य आचरण के आलोक में अपने न्याय दर्शन का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निर्धारण करना चाहिए। भारत सरकार का यह अकादमिक व्यवहार न केवल लोकतांत्रिक और सुसंस्कृत, प्रत्युत वैज्ञानिक भी रहा है। विज्ञान में दो असमान ध्रुवों में भी आकर्षण होता है।

   
वाद और पंथ की इस राजनीति ने साहित्य का सबसे बड़ा अहित किया है। दक्षिणपंथियों को वामपंथियों का छद्म सेकूलरिज़म रास नहीं आता, तो वाम पंथियों को दक्षिणपंथियों की राष्ट्रीयता फूटी आँखों नहीं सुहाती।  जीते जी इलाहाबाद के दिनों में ‘जब किसी की घनघोर निंदा करनी होती तो उसे सी आई ए का एजेंट घोषित कर देते’।  आज उसे ‘भक्त’ या ‘सिकुलर’ घोषित कर देते हैं। इधर वैश्विक पटल पर भी राष्ट्रीय भावनाएँ उबाल पर हैं। वजहों की पड़ताल किए बग़ैर यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि विचारधारा का यह मतभेद मनभेद में बदलता जा रहा है। साहित्य का इस प्रवृति की जद में आना नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है। साहित्य समाज को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। वहाँ प्राथमिकता विचारों की होनी चाहिए, विचारधारा की नहीं। आलोचनाओं की आवाज़ में जोड़ने का जोग होना चाहिए तोड़ने का दंभ नहीं। समीक्षाओं में सामंजस्य का सुर होना चाहिए, संघर्ष की गर्जना नहीं।

१९५९ का साहित्य अकादमी पुरस्कार राष्ट्रीय भावनाओं की ओज से ऊर्जस्वित राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर को उनकी गंभीर शोध और चिंतन से परिपूर्ण गद्य कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को दी गयी थी। प्रखर राष्ट्रवादी दिनकर ने तब के वामपंथी रुझान वाले अपने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की समय पड़ने पर आलोचनाओं में अपने शब्द तुणिर के घातक बाण छोड़ने में कोई परहेज़ नहीं किया था। जुमले में कहते हैं कि एक बार संसद की सीढ़ियों पर चढ़ते समय लड़खड़ाते नेहरू को बलिष्ठ दिनकर ने गिरने से बचा लिया। नेहरू  के धन्यवाद ज्ञापन पर दिनकर ने चुटकी ली थी, ‘जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे सँभाल लेता है।‘ बताते चलें कि दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका नेहरू ने लिखी। अभी हाल में एक पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘समय के प्रश्न’। इसके लेखक हैं समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर और इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है दक्षिणपंथी चिंतक राम बहादुर राय ने। भारतीय परंपरा में आज के ये संतोषजनक बिंदु हैं। 

बताते चलें कि बंगाल रॉयल सोसायटी ने एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक न्यास के गठन का प्रस्ताव दिया जिसमें देश के साहित्य, दृश्य कला और नृत्य, नाटक एवं संगीत को प्रोत्साहित एवं सँवर्धित करने के लिए यथोचित निकायों की स्थापना की बात कही गयी। इस प्रस्ताव को १९४४ में सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर दी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत इसी प्रस्ताव के आलोक में साहित्य अकादमी, ललितकला अकादमी और संगीत एवं नाटक अकादमी की स्थापना हुई। साहित्य अकादमी के गठन का प्रस्ताव १५ दिसंबर १९५२ को हुआ। इसकी औपचारिक शुरुआत १२ मार्च १९५४ को तत्कालीन उपराष्ट्रपति प्रख्यात दार्शनिक राधाकृष्णन द्वारा इसके विधिवत उद्घाटन के साथ हुई। राधाकृष्णन इसके पहले उपाध्यक्ष बने और प्रधानमंत्री नेहरू पहले अध्यक्ष। श्री कृष्ण कृपलानी इसके पहले सचिव थे। हिंदी भाषा के लिए पहला पुरस्कार १९५५ में माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी काव्य कृति ‘हिम तरंगिणी’ के लिए मिला। तब से अबतक हिंदी भाषा में क़रीब पच्चीस उपन्यासकारों, छब्बीस काव्य-रचनाकारों सहित दर्शन, इतिहास, संस्कृति, विवेचना और आलोचना के क़रीब सात  रचनाकारों को उनकी बेहद गंभीर कृतियों के लिए अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। इसमें वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, दिनकर, डॉक्टर नागेन्द्र, नामवर सिंह और हजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखे विद्वान हैं। अकादमी पुरस्कारों का अधिकांश अत्यंत प्रतिष्ठित और निर्विवाद साहित्यकारों को गया है। हालाँकि जयशंकर प्रसाद, मुक्तिबोध, नागार्जुन, विद्यानिवास मिश्र, फणीश्वर नाथ रेणु जैसे अनेक कालजयी साहित्यकारों की झोली में यह पुरस्कार नहीं जा पाया। प्रश्न पुरस्कारों का नहीं है। पुरस्कार नहीं मिलने से ‘कामायनी’ छोटी रचना नहीं हो जाती और ना ही पुरस्कार मिल जाने से ‘रेत समाधि’ साहित्य में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का उत्कर्ष बिंदु बन जाता!

२०२५ का साहित्य अकादमी पुरस्कार वरिष्ठ हिंदी लेखिका ममता कालिया जी को दिए जाने की घोषणा हुई है। उनको यह पुरस्कार उनकी गद्य कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ पर दिया गया है। यह एक संस्मरण रचना है। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर संवेदना से पगी बड़ी सार्थक बातें लिखी हैं – ‘शहर- पुड़िया में बाँधकर नहीं ला सकते साथ; तो क्या!’ लेकिन ममता जी ने बड़ी  शिद्दत से अपनी स्मृति के कोर में सँजोए अपने इलाहाबाद के दिनों को अपनी मोहक किस्सागोई कला में पाठकों के सामने इस पुस्तक में परोस दिया है। यह सही है कि ‘युवावस्था में आदमी प्रेम करता है, प्रेम लिखता नहीं’ लेकिन अपनी युवावस्था में इन पंक्तियों:-
‘प्यार शब्द घिसते-घिसते चपटा हो गया है
अब हमारी समझ में 
सहवास आता है’ 

की धमक के साथ अपने साहित्यिक सफ़र का आग़ाज़ करने वाली लेखिका लगता है अपनी यात्रा के वानप्रस्थ में अब अपना प्रेम लिखने लगी है। जो भी हो, लेखिका ने बड़ी सजीवता से कथात्मक शैली में अपनी यादों को जिस सजीवता से सहेजा है, उससे समकालीन साहित्य की दुनिया बाहर झाँकती दिखती है। इसलिए २०२१ में लिखी गयी यह पुस्तक यह वरन एक संस्मरण मात्र न होकर समयुगीन साहित्यिक दस्तावेज़ भी है। तब के इलाहाबाद की धरती पर साहित्य की धारा का संवेग  कितना प्रबल था, उसकी आहटें इस पुस्तक के शब्द-शब्द में सुनायी देती हैं। तब ‘संवाद के बजाय विवाद और विमर्श के बजाय अमर्श से काम चलाने का संस्कार अभी नहीं आया था’। साहित्य संवाद की भाषा थी। ममताजी बताती हैं कि ‘भैरव जी ने अश्क़ जी पर एक पूरा उपन्यास लिख डाला - ‘अंतिम अध्याय’। वर्षों बाद अश्क़ जी ने अपनी पुस्तक ‘चेहरे अनेक’ में उनको जवाब दिया।‘ एक अन्य प्रकरण का उल्लेख करते लेखिका सुनाती हैं कि विजयदेव नारायण शाही ने पंत जी को कह दिया कि ‘न, मैंने लोकायतन पढ़ी है, न पढ़ूँगा।‘ पंतजी  ने नम्रता से जवाब दिया, ‘आप न पढ़ें, आनेवाली पीढ़ियाँ मुझे पढ़ेंगी।‘ ममता कालिया ने इलाहाबाद के साहित्यिक मिज़ाज की अल्हड़ता और उसकी उर्वरा धरा में बहती हिंदी कहानियों के विकास की धारा का अत्यंत रोचक बतकही शैली में बयान किया है। हालाँकि उनके द्वारा अपनी किताब में वर्णित मार्कण्डेय काटजू से संबंधित एक साहित्यिक समारोह में उपजे विवाद पर कुछ समकालीन और स्वयं को इस समारोह का दर्शक घोषित करने वाले लेखकों ने कटु आलोचना करते हुए इसे झूठ का पुलिंदा बतलाया है। कुछ आलोचकों ने इस बात पर भी ममताजी को कोसा है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में कुछ ऐसे व्यक्तित्वों पर कीचड़ उछाला है जो अपनी सफ़ाई देने के लिए अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस आलोचना में दक्षिणपंथी भारतीय संस्कार बनाम वामपंथी बड़बोलेपन की कुरूपता का संघर्ष दिखायी देता है।

 इस पुस्तक में आपको कोई विषय गांभीर्य, किसी चिंतन की गुढ़ता, कोई साहित्यिक दर्शन या कोई रस मीमांसा भले खुलता न दिखे लेकिन यह पाठकों को दादी माँ की कहानियों की तरह बाँधता ज़रूर है। स्वाभाविक है, कि दादी माँ की कहानियों की तरह यहाँ भी आपको अतिशयोक्ति,  छद्म दंभ, मन लुभावन लोरी और बतरस का बतासा जगह- जगह मिलेगा। लेखिका ने चूँकि  अपनी नज़रों से इलाहाबाद को देखा है, इसलिए समूचे कथ्य में आत्मनिष्ठता का भाव है।  एक जगह लेखिका का साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह/दुराग्रह ईमानदारी से चाहे/अनचाहे टपकता-सा दिखायी देता है। मुस्लिम बहुल मुहल्ले में तनाव के वक़्त एक मुस्लिम दंगाई द्वारा बिजली/फ़ोन की लाइन काटे जाने का दृश्य लेखिका को अंदर से दहला देता है और सुरक्षित मुहल्ले में उनके जाने के क्रम में उनके अंदर का भय एक दुस्वप्न की भाँति पाठकों को स्पष्ट दिखायी देता है : - ‘रानी मंडी ऐसा अल्पसंख्यक मुहल्ला था जो अमन चैन में तो घोंसले की तरह सुरक्षित था लेकिन हिंसा का एक भी वाक़या होने पर सुलग उठाता था। मैं खिड़की………..    ……काट दिए। अपने ही घर से………………।‘

रही बात मंगलवार और बुधवार को नान-वेज खाने वाले प्रकरण की तो इस पर उठने वाले सवालों या आलोचनाओं में कोई दम नहीं है। यह आज के भारतीय जीवन का सच है जिसे कोई भी ईमानदार आदमी झुठला नहीं सकता चाहे वह दाम हो या वाम! न ही यह प्रकरण किसी की आस्था पर कोई प्रहार करता है। इसलिये हमें इस पुरस्कार के जुरी सदस्यों – आदरणीय अरुण कमल जी, अनामिका और अरविंदाक्षन के विवेक का सम्मान करते हुए ‘आलोचना में कटखनापन से परहेज़ करना चाहिए’। किसी पंथ के चश्मे को पहनकर इस पुस्तक को मिले ‘पुरस्कार की अहमियत को नकारना बौड़मपना ही होगा’। यह भी कहना असंगत और तर्कहीन  होगा कि ‘कभी-कभी पुरस्कारों की घोषणा किताबों की गोदाम को दीमक-चूहों से बचा लेती है’। इसलिए ‘भले ही रूचियाँ आपस में रगड़ खाएँ, मगर सब एक दूसरे को पढ़ें और संवाद गतिशील रहे।‘
ममता कालिया को “ ‘जीते जी’ इलाहाबाद” की बधाई!!!          

Friday, 27 February 2026

सरपंच सच


अश्वत्थामा शापित है जीने को। इस भारतखण्ड में। सपनों में। टुकड़ों-टुकड़ों में।एक के बाद एक चित्र सरकता है। 

……..राजा गुरुकुल आए हैं। राजमुकुट मुख्य द्वार पर उतारकर रख दिया है। उपानह भी उतर गए हैं।अँगरक्षक वहीं रुक गए हैं।कुटीर में गुरु अपने ऊँचे आसान पर विराज रहे हैं। सामने फर्श पर राजा साष्टाँग मुद्रा में हाथ जोड़े।………

काल क्वांटम की कला में गतिमान है।प्रकाश से भी तेज।अगला दृश्य -

…….मास्टर को सरपंच साहेब हड़का रहे हैं, अवमानना के आरोप में! गलती से मास्टर ने सही लिख दिया है। सरपंच बैठा है ऊँचे इजलास पर। मास्टर नीचे  थरथर काँप रहा है। डर के मारे खड़ा। ……

अश्वत्थामा बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।

राजा  जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते। कौन सच । वह सच। या यह सच! 

जनक को ढकेलकर अश्वत्थामा महर्षि के चरण पकड़ लेता  है। हाँ, महर्षि कौन सच? मास्टर या सरपंच!

अष्टावक्र का आर्ष अट्टहास  गूँजता है - दोनों सच। वत्स, दोनों सच। पहले मास्टर सच। और अब सरपंच सच !

Friday, 20 February 2026

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ।

 चले गए दिन गार्गी के वे,

और मिथिला की राजसभा!

वाचाकनवी ने शिथिल किया,

जब याज्ञवल्क्य की ज्ञान प्रभा।


समय एक सा नहीं है रहता,

कुदरत की है कहर ये भारी।

हाय बिहारी, हाय बिहारी,

तेरी तो गई किस्मत मारी!


हाय, फिसड्डी नौकरशाही,

और सड़क छाप का मंतरी!

अपराधी की गोद में बैठा

नाका -  नाका आला संतरी!


मिनट भर बस लेट हुई थी,

परीक्षा केंद्र की खबर है ताजा।

चढ़ गई बेटी सूली पर

अंधेर नगरी चौपट राजा।


नक्कारखाने में सब मिलकर

आओ, आओ तूती बजाओ।

राजमहल के राज दरिंदो!

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ।






Tuesday, 27 January 2026

नई सरकार, वही सम्राट

 जम्हूरी, जलालत ललाट,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

जो नैतिकता को काट- काट,

और मर्यादा छांट- छांट।


इज्जत आबरू चाट- चाट,

नराधमों में बांट- बांट।

हिंजड़े हाकिम को साट- साट,

इंसाफ की लगी हाट।


हक हुकूक की बंदरबांट

साबूत न कोई बचा पाट।

मानवता की खड़ी खाट

हैवानियत के ठाट- बाट।


बेटी का बाप हांफ- हांफ

बदहवास, घर घाट- घाट।

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

--- विश्वमोहन

#बिहारनिर्भया

Wednesday, 29 October 2025

जाति का सच : रोज़ी-रोटी-बेटी या राजनीति!


लोकतंत्र की जन्मस्थली बिहार में अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गयी है। अब यह जातितंत्र में बदल गया है। यह जाति का, जाति के लिए और जाति के द्वारा तंत्र बन गया है। जाति ने भी अपना स्वरुप बदल लिया है। पहले जाति का संबंध रोज़ी, रोटी और बेटी से था। मतलब जाति की पहचान पहले रोज़ी से थी। जाति का आर्थिक कलेवर उस जाति का अपना रोज़गार था। सच पूछें तो जाति की अवधारणा के पीछे का सच उस जाति का पारंपरिक रोज़गार ही था। औद्योगिक क्रांति से लेकर सूचना क्रांति तक आते-आते रोज़गार का जातिगत बंधन लुप्तप्राय हो गया और इस मोबाइल युग में तो रोज़गार और व्यवसाय भी जाति के बंधन से मुक्त होकर पूरी तरह मोबाइल हो गए। कहने का तात्पर्य यह है कि अब किसी भी जाति का व्यक्ति कोई भी रोज़गार कर लेता है और अब जाति अपनी परंपरागत रोज़ी की पहचान किंचित नहीं रही। किसी भी व्यवसाय की आज कोई जाति नहीं है। अगर जाति है तो सिर्फ़ एक व्यवसायी की, और वह है – राजनीतिक नेता!

पहले लोग अपनी जाति की ही रोटी स्वीकार करते थे। अगर कोई अजनबी किसी गाँव में जाता था तो वह अपनी जाति का ही घर खोजता था, जहाँ की वह रोटी खा सके। लोग खाना देने और लेने के पहले जाति की सूचना अवश्य ले लेते थे। आज यह भेद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। किसी भी होटल, ढाबे, रेस्टौरेंट, भोज, पार्टी या किसी भी खाने पीने के आयोजन में जाति की कोई भनक भी नहीं मिलती। कुल मिलाकर रोटी ने भी जाति से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया है। रोटी की जुगाड़ में अब जाति हाशिए पर चली गयी है।

अब रही बात बेटी की तो पहले बेटी भी अपनी जाति में ही ब्याही जाती थी। सच कहें तो जाति का सबसे प्रबल आग्रह यदि किसी सामाजिक संस्था में था तो वह विवाह की संस्था ही थी। इस मामले में समाज अत्यंत रूढ़ था। ऐसा नहीं है कि यह रूढ़िवादिता अब समूल नष्ट हो गयी है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस साइबर और सूचना क्रांति के प्रहार ने इस रूढ़िवादिता की चूलें हिला दी हैं। और, इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित कोई प्रदेश हाल के समय में रहा है तो वह बिहार है। एक प्रमुख कारण इसका बिहार के सबसे बड़े सक्रिय अंश का बिहार से बाहर पलायन कर जाना, चाहे वह मेहनतकश मज़दूर हों, अच्छी शिक्षा की तलाश में बिहार छोड़ गए प्रतिभाशाली छात्रों की जमात हो या अच्छी नौकरी की तलाश में योग्य बिहारी नवयुवक और नवयुवतियाँ! हर क्षेत्र का बिहारी ‘क्रीमी लेयर’ बिहार छोड़कर बाहर चला गया और उसने बिहारी समाज की रूढ़िवादिता का परित्याग कर आधुनिक मूल्यों को अपना लिया। इसकी सबसे बड़ी मार बिहारी समाज में विवाह-सम्बन्धों की जातिगत रूढ़िवादिता और दहेज की कुप्रथा पर पड़ी। बहुत अधिक मात्रा में दहेजमुक्त और अंतर्जातीय विवाह बिहारी नवयुवकों और नवयुवतियों ने की और जाति बेचारी हाथ मलती रह गयी। यह प्रक्रिया अभी जारी है और इसकी गति के और अधिक त्वरित होने की संभावना भी अत्यंत बलवती है। 

अब तेज़ी से बदलते युग में जाति ने इन तीनों से क़रीब-क़रीब अपना नाता तोड़ लिया है। रोज़ी और रोटी अब जाति के बंधन से मुक्त हो गयी हैं। वैवाहिक संबंधों में भी अंतर्जातीयता अपनी जड़ें जमाती चली जा रही है। जाति के स्वरुप के इस सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के पीछे बिहार के पिछड़ेपन और उससे प्रसूत विस्थापन की बड़ी अहम भूमिका है। बिहारी समाज का एक बड़ा अंश अब बिहार छोड़कर बाहर आ गया है। अपनी आजीविका और शिक्षा के संघर्ष में इस तबके ने अपने जातिगत पूर्वाग्रहों की लगभग तिलांजलि दे दी है।

रोज़ी, रोटी और बेटी को छोड़ती जाति अब मात्र राजनीतिक पाखंड बनकर रह गयी है। इस तथ्य को यदि किसी ने बड़ी शिद्दत से महसूस किया है तो रोज़ी-रोटी और पढ़ाई-लिखाई के अवसरों की तलाश में बिहार से पलायन कर गयी वह एक बड़ी बिहारी जनसंख्या है। इस तलाश में दर-दर भटकती बिहारी जनता ने अब अपनी अस्मिता भी तलाश ली है। राष्ट्र्कवि दिनकर की इस संतति ने अब भलीभाँति इन पंक्तियों के मर्म को आत्मसात कर लिया है कि :

“जाति जाति रटते जिनकी पूँजी केवल पाखंड

मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड।“

ठीक इसके उलट, बिहार में पीछे छूट गए लोगों के बीच के लम्पट, अपराधी, अशिक्षित और भ्रष्ट असामाजिक तत्वों ने अपना आशियाना राजनीति में ढूँढ लिया है। आप बिहार के राजनीतिक भू मंडल पर तनिक एक बार अपनी दृष्टि फेर कर देख लें। आपको आज की बिहारी राजनीतिक जमात के अधिकांश में शायद ही उस प्रजाति का कोई अंश भी नज़र आए जिसका प्रतिनिधित्व बाबू कुँवर सिंह, राजकुमार शुक्ल, खुदीराम बोस, शहजानंद सरस्वती, सच्चिदानंद सिन्हा, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, श्री कृष्ण सिंह या ऐसे और अनेक नाम जो यहाँ छूट रहे हैं, करते थे। राजनीतिक नेताओं का अधिकांश आज काले धन कमाए बिचौलिए, दलाल, भू-माफ़िया, ठेकेदार, अपराधी और भ्रष्टाचार में आकंठ निमग्न सरीखों से ही भरा हुआ है। इनकी न कोई सांस्कारिक  पृष्ठभूमि, न कोई समाज सेवा की तपोभूमि, न कोई वैचारिक दृष्टि और न ही कोई राजनीतिक सोच। राजनीतिक वातावरण इतना विषाक्त हो गया है कि कोई भी शरीफ़, शिक्षित, अमन-चैन पसंद और गंभीर व्यक्ति राजनीति में  जाने की सोच नहीं सकता। जाहिल, अनपढ़, असभ्य और  कुसंस्कृत भ्रष्टाचारियों की यह क़ौम ही अब धीरे-धीरे बिहार की राजनीति की पहचान बनती जा रही है। स्वस्थ सोच और वैचारिक दृष्टिकोण के नितांत अभाव वाले ऐसे सड़क छाप नेताओं को अपनी भीड़ बनाने और बढ़ाने का अब एक ही ठौर है – जाति! जाति के नाम पर जनता को गोलबंद कर अब ये अपनी दुकान चला रहे हैं। दुर्भाग्यवश, इनको पनाह देनेवाले राजनीतिक दल भी कुसंस्कार के कीचक में आकंठ डूब चुके हैं। जाति तंत्र के पोषक और पथ प्रदर्शक यहीं राजनीतिक दल बन गए हैं। इस अवसर पर ज़रा जानकी वल्लभ शास्त्रीजी की बातों को याद कर लें :

“कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है,

लज्जा लजाती जिसकी कृति से धृति उपदेशक वह है”

समाज को जाति में बाँटकर ये राजनीतिक दल अपनी जीत का समीकरण तय करते हैं। जाति के नेता उस जमात के अपराधी, भ्रष्ट धन-कुबेर और बाहुबली होते हैं। छल-बल और पैसे के जोड़ पर जाति को गोलबंद किया जाता है। दूसरी जातियों का भय दिखाकर भी जातीय एकता को पुष्ट किया जाता है। जाति के नाम पर समाज को बाँटने वाले इन सड़क छाप नेताओं का जाति का सारा वितंडा चुनाव और राजनीति तक ही सीमित है। आज के इस ज़माने में जहाँ भाई को भाई नहीं पूछ रहा है और बेटे की अवहेलना से दंशित बाप वृद्धाश्रम की ख़ाक छानने पर विवश हो रहा है, वहाँ भला जाति के नाम पर कोई किस सदाव्रत की उम्मीद कर सकता है? जनता अपनी ग़रीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और मजबूरी के चलते जाति की कड़ाह में तले जाने को अभिशप्त है। इस जातिगत दुर्भाव से जहाँ एक ओर समाज में वैमनस्य, ईर्ष्या, अस्वस्थ स्पर्धा और फूट के कारण सामाजिक समरसता समाप्त होती जा रही है, वहीं प्रतिभाएँ भी दम तोड़ रही हैं। कई प्रतिभाशाली युवक जातीय नेताओं के चक्कर में बर्बाद हो रहे हैं। जातिगत दुराग्रहों की दुर्नीति में प्रतिभा छटपटा रही है। हालाँकि इन तमाम विसंगतियों में यह भी स्पष्ट है कि अपने पुत्र/पुत्री की अच्छी शिक्षा या अपने परिवार के स्वास्थ्य के मामले में राज्य के बुरी तरह असफल हो जाने के कारण मजबूर जनता सेवा की गुणवत्ता की तलाश में अपना सब कुछ खोने को विवश है। जाति के नाम पर चुने गये अशिक्षित जाहिल मुखिया द्वारा गाँव के विद्यालय की निगरानी करने और लम्पट विधायक के राज्य की स्वास्थ्य सेवा का प्रभारी मंत्री बनाने के दृष्टांत भी सामने आ रहे हैं। जाति तंत्र लूट तंत्र में परिणत होता जा रहा है।

चुनाव क्षेत्रों का विश्लेषण वहाँ की आम समस्या के आधार पर नहीं बल्कि जातीय समीकरण के आधार पर किया जा रहा है। चुनाव में उम्मीदवारों का चयन भी उनकी योग्यता और क्षेत्र की समस्यायों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर कम और उनकी जाति के आधार पर ज़्यादा किया जा रहा है। क्षेत्र की बदहाली और उससे जूझने वाले जूझारू नेताओं की तलाश में अब किसी राजनीतिक दल की कोई रुचि शेष नहीं रही है। सता के मुकुट को पहनना ही अब राजनीतिक दलों का मुख्य ध्येय है। दिनकर की पंक्तियाँ इन नेताओं का सही चरित्र चित्रण है:-

“ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले,

शर्माते है नहीं जगत में जाति पूछने वाले।“

आजतक जाति की किसी दुकान पर बिहार में यह देखने को नहीं मिला कि कोई जातीय संगठन अपने ग़रीब प्रतिभाशाली बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए अपना कोई संस्थागत सहयोग कार्यक्रम चला रहा हो, अपनी जाति के ग़रीब-बुरवा के इलाज में कोई सहयोग राशि बाँट रहा हो, अपनी जाति की ग़रीब बेटियों के विवाह में अपना कोई योगदान दे रहा हो, या जाति के नाम पर दहेज छोड़वा दिया हो। उलटे इन दहेज लोलुपों पर नयी पीढ़ी ने अंतर्जातीय विवाह का ज़ोरदार तमाचा अवश्य जड़ा है।

अगर बिहार की जनता अब भी नहीं चेती तो वह अपनी मूर्खता और चेतना शून्यता का भारी मूल्य चुकाने को मजबूर होगी। अब तो आशा नयी पीढ़ी से ही है। पुरानी पीढ़ी बुरी तरह लकवा ग्रस्त हो गयी है और उससे कुछ भी आशा करना पत्थर से सिर फोड़ना है। पिछली शताब्दी का अंतिम दशक बिहार के इतिहास का काला पन्ना रहा है। राज्य की अधिकांश जनता को अपने राज्य की विसंगतियों का आखेट बनकर राज्य छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। अप्रवासी बने इन बिहारियों को भारी बेइज़्ज़ती के माहौल में कठिन संघर्ष करना पड़ा। आज अपने मेहनत के बल पर इन्होंने अपनी और अपने राज्य की एक मेहनतकश जूझारू छवि बनायी है। इस संघर्ष में इन्होंने अपने आश्रय-स्थल समाज को भी न केवल समझा-बुझा है, बल्कि उसके सापेक्ष अपने राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भी आकलन किया है। इस आकलन ने इन्हें ‘क्या खोया और क्या पाना है’ की अंतर्दृष्टि दी है। 

इसलिए यह सही समय है जब राज्य की जनता अब जागे और जाति के नाम पर वोट माँगने वाले इन जाहिल नेताओं का राजनीतिक बहिष्कार करे और जाति से ऊपर उठकर सही और योग्य उमीदवारों को चुने। राज्य प्रदत्त व्यवस्था चाहे वह शिक्षा हो या स्वास्थ्य उसकी सबसे बड़ी उपभोक्ता राज्य की ग़रीब जनता ही है। इसलिए इस तबके के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है और उसका पुनीत दायित्व है कि चुनाव में जात को लात मारकर वह समाज की व्यवस्था बिगाड़ने वाले नेताओं को उनकी औक़ात ज़रूर दिखावे। ऐसे समय में समझदार राजनीतिक चेतना वाले राज्य के प्रबुद्ध जनों से भी एक नयी राजनीतिक संस्कृति की अपेक्षा है। वह न एक ओर, उम्मीदवारों के प्रचार में जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर माटी और मानुष के विकास की ज़रूरत को समझे, बल्कि जनता को भी शिक्षित और जागरूक करे, ताकि लोकतंत्र को जातितंत्र में बदलने से रोका जाय। विकास की इकाई व्यक्ति हो, न कि जाति। ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयास की ओर बिहार की माटी बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है और ऐसे किसी भी जननायक के लिए वह बहुत उज्जवल भविष्य संजोये हुए है। 



Wednesday, 24 September 2025

देवी - माहात्म्य


 


प्रसिद्ध भोजपुरी गायिका देवी पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में चर्चा का केंद्र बनी हुयी हैं। इसका कारण उनका आइ वी एफ की वैज्ञानिक तकनीक से माँ बनना है। साथ ही उनका यह मंतव्य भी प्रकट करना है कि विवाह की संस्था से उनका विश्वास उठ गया है किंतु  वह मातृत्व  का सुख-गौरव  पाने को लालायित थीं। इसीलिए माँ बनने के इस वैध, मान्य और प्रचलित वैज्ञानिक प्रणाली का उन्होंने चयन किया। यह एक निर्विवाद और समस्त प्रमाणों से परे एक शाश्वत तथ्य है कि मातृत्व इस समस्त प्राणी जगत की सर्वोतम  निधि है। जैविक स्तर पर यह एकमात्र संबंध है जो दृश्य और ज्ञात है।  इसके बाद ही तज्जन्य सहोदर संबधों का उदय हुआ। आत्मिक और भावनात्मक स्तर पर यह अलंघ्य है और इसके समांतर इस चराचर जगत में और कुछ भी नहीं है। यह ईशत्व से भी उत्तुंगतर है। महान सनातन परंपरा में अनुसूया माँ के समक्ष त्रिदेव भी नंगे नन्हें-मुन्ने हैं। यह महिमातीत है, निष्पाप है, निष्कलुष  है और पूजनीय है। नवरात्रि के महापर्व में समस्त आर्यावर्त माँ दुर्गा के नव रूपों की पूजा अर्चना करता रहा है। ये नव रूप  मातृत्व की बहुरंगी और सर्वतोमुखी ऊर्जा और चेतना की सार्वभौमिक और तात्विक अभिव्यक्ति हैं। मातृत्व की इस अनुपम आभा से अलंकृत होने वाली सुर-साधिका सरस्वती-सुता आदरणीय देवी को भी आत्मीय बधाई और जच्चा एवं बच्चा दोनों के सुखद एवं स्वस्थ भविष्य की शुभकामनाएँ।
किंतु इस सुखद समाचार का एक प्रतिकूल पहलू  रहा -  सोशल मीडिया में देवी की अतिरेकपूर्ण अभद्र आलोचना। आलोचना का संस्कार भारत की आत्मा है। विचार-विमर्श, शास्त्रार्थ और भावनाओं की अभिव्यक्ति हमारे रक्त में सनातन काल से प्रवाहित होते हुए हमारे आज के लोकतांत्रिक संविधान तक को ऊष्मा प्रदान करती है। किंतु आलोचना की संस्कृति का अतिक्रमण करते हुए कई लोग भाव, भाषा  और विचार के स्तर पर अपनी मर्यादाएँ लाँघ गए और समाज के उस विकृत चेहरे को छोड़ गए जो छद्म पौरुष के छल से छलित आज के समाज की वैचारिक नपुंसकता को सामने लाता है। ख़ैर, किसी ने इसे नैतिक मूल्यों पर कुठाराघात बताया। किसी ने सामाजिक मर्यादा के प्रतिकूल कहा। किसी को यह चिंता सता रही थी कि समाज में नवजात शिशु बिना पिता के कैसे पहचाना जाएगा। और किसी ने तो देवी के इस कृत्य के लिए उनके चरित्र पर ही सवाल उठा दिया।
सनद रहे कि इस तरह की ‘फ़ब्ती’ कसने वाले या ‘फ़तवे’ जारी करने वालों का अधिकांश  मध्यकालीन सोच-परस्त पुरुष समाज ही था। इनकी व्यंग्योक्तियों (इसे मैं आलोचना की श्रेणी में नहीं रखता) में मर्यादा, शालीनता और तथ्य का अंश अत्यल्प किंतु ‘मेल शौविनिज़्म’ की क्लीवता ज़्यादा थी। 
देवी भोजपुरी गीतों की सुमधुर और शालीन गायिका हैं। अपनी अश्लीलता से पहचाने  जानेवाले समयुगीन  भोजपुरी गीतों के इस दुर्भाग्यपूर्ण काल में  देवी के द्वारा गाए गीत शालीनता और सुसंस्कार के ताज़े झोंके और शुभ शकुन के समान हैं। हमारा भोजपुरिया समाज चोली, घाँघरा छाप अश्लीलता से आप्लावित गीतों को गाकर नैतिकता और मर्यादा का दिन-दहाड़े मर्दन करने वाले ‘गवैयों’ पर न केवल अपना  नामर्द मौन धारण कर लेता है, प्रत्युत उन्हें अपना जननायक  चुनकर विधायी संस्थाओं में पहुँचा आता है। अपनी मातृभाषा का शील हरण करने वाले इन छिछोरे खलनायकों को अपना महानायक  बनाते समय नैतिकता के इन ठेकेदारों को अपने समाज की शालीनता और मर्यादा के हरण की तब तनिक भी सुध नहीं रहती। लेकिन भोजपुरिया समाज की इस साफ़-सुथरी कलाकार के वैज्ञानिक और विधि-सम्मत  रीति से मातृत्व के गौरव ग्रहण करने में इसे नैतिक मूल्यों पर ग्रहण दिखायी देने लगता है। यह इस माटी में जनमी सनातन परंपरा की उन पूज्य कन्यायों को विस्मृत कर देना है जिनका मातृत्व भी कुछ ऐसी ही तकनीक के मिथकीय अलंकरण से सुशोभित है।आइ वी एफ तकनीक में माँ अपने शिशु को न केवल अपने गर्भ में वहन करती है, बल्कि उसके प्रसव अनुभव का सुख भी लेती हैं। हाँ, समाज के सामने यह नहीं आता कि उसने किसका तेज़ अपने गर्भ में निषेचित किया – वायु का, सूर्य का, धर्म का या किसी अन्य दिती/अदिति-पुत्र का! यहाँ तो खीर खाकर गर्भवती हुई महान माता से प्रसूत परम पूज्य मर्यादा पुरुषोत्तम की गौरव गाथा से आर्यावर्त गुंजित है। आप भले हीं मिथ के नाम पर इन घटनाओं का मखौल उड़ा लें, लेकिन यह निर्विवाद संभावनाओं से परे नहीं कि समकालीन समाज के किसी उन्नत विज्ञान का ही यह कौशल रहा हो। पार्वती पुत्र गणेश के जन्म की कथा से भला कौन अपरिचित होगा?
ऋग्वेद के दसवें मंडल में सूर्या सावित्री के परिणय संकार का वर्णन मिलता है। इसी के साथ इस भू-मंडल पर विवाह नामक संस्था का श्री गणेश हुआ माना जाता है। अपने विवाह के रस्मों की ऋचाएँ सूर्या सावित्री ने स्वयं रचा जो विवाह सूक्त में संकलित हैं। आज भी सनातनी विवाह संस्कारों में इन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। विवाह का प्रमुख उद्देश्य तदयुगीन समाज में अराजक स्त्री-पुरुष संबंधों को एक मर्यादित स्वरुप देने के साथ संतति की उत्पति और वंश परम्परा को स्थापित रखना था। पुरुषार्थ के प्रमुख अंग ‘काम’ के निर्वाह की मर्यादित संस्था के रूप में सामाजिक और धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति का आलम्ब विवाह बना। तबसे आज तक विवाह की यह संस्था भारत ही नहीं वरन वैश्विक समुदाय के अधिकांश की परिवार प्रणाली का अटूट स्तम्भ बनकर रही। एक नारी के द्वारा प्रारंभ की गयी इस व्यवस्था में नारियों का स्थान सदैव सम्मानीय रहा। उनका यह सम्मान वेदों से भी पूर्व की शैव और शाक्त परंपरा में मिलता है। रामायण और महाभारत के काल का नारी गौरव सर्वज्ञात है। पुरुष के दंभ को चुनौती देने वाली  पंच कन्याएँ  उस ज़माने की नारीवादी नायिकाओं के रूप में आज भी प्रातः स्मरणीय हैं। राजा जनक के दरबार में वाचक्नवी कुमारी गार्गी से शास्त्रार्थ में ऋषि याज्ञवल्क्य के पसीने छूट गए। लोपमुद्रा, अपाला जैसी ऋषिकाओं ने वेद की ऋचाएँ रचीं। समय के प्रवाह में समाज दहता रहा। धीरे धीरे छद्म पौरुष ने अपना विकृत चेहरा उठाना शुरू किया। विकृतियाँ घर बनाने लगीं। फिर भी विवाहेत्तर संबंधों से उत्पन्न शिशु मौलिक वैदिक परंपरा में उपेक्षा और उपहास का विषय कभी नहीं बना और आज के लोकतांत्रिक संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दी गयी व्यवस्थाओं में भी यही स्थिति विद्यमान है। 
‘अनेकता में एकता’ का सूत्र वाक्य ऋग्वेद में मिलता है। ‘एकं सत, विप्रा: बहुधा वदंति’। इस अमृत मंत्र के द्रष्टा थे – वैशाली के महर्षि मामतेय दीर्घतमा। ऋषि दीर्घतमा अपनी माँ ममता के नाम पर मामतेय नाम से जाने जाते थे। एक अन्य ऋषि  सत्यकाम जाबाल की कथा से भला कौन परिचित नहीं।बालक सत्यकाम  ज्ञान अर्जन हेतु गुरु गौतम के आश्रम में गए और गुरु से आश्रम में प्रवेश देने की याचना की। गुरु का गुरुत्तर प्रश्न चुनौती बनकर उभरा, ‘वत्स! तुम्हारे पिता का नाम क्या है। तुम्हारा गोत्र क्या है?’ बालक ने कहा, ‘माँ से पूछकर बताता हूँ’। माँ जाबाला  ऋषियों के आश्रम में दासी थी। माँ ने बालक को बताया, ‘पुत्र, हमें भी नहीं पता कि तुम्हारे पिता कौन हैं।‘ बालक सत्यकाम  दौड़ा-दौड़ा गुरु के पास पहुँचा और उन्हें सच-सच सारी बातें बता दी। गुरु बालक की निर्भिकता, सत्यवादिता और ज्ञान पिपासा से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्हें गले लगाया और अपने अश्राम में ले लिया। माँ के नाम पर अपना गोत्र धारण किए सत्यकाम जाबाल  महान ऋषि हुए और ऋग्वेद के सूक्तों की रचना में अपना योगदान दिया। इसलिए देवी की संतति के पिता का प्रश्न उठाने वाले शिखंडियों को पहले अपनी सनातन परंपरा में झाँकना चाहिए। संतति समाज की निधि है। वह किसी बाप के नाम का मुहताज नहीं। वह भी आज के समाज के किसी वैसे बाप का नहीं जो बचपन में उसे सदाचार और सत्य का पाठ  पढ़ाए, और जब बड़ा होकर बेटा नौकरी मिलने पर उसका आशीर्वाद लेने जाय तो उस बाप का पहला प्रश्न हो, ‘ऊपर की आमदनी कितनी है?’ संभवत: ऐसे बापों के चारित्रिक दोहरेपन के कारण ही नयी पीढ़ी ने उसमें अपना भरोसा खो दिया है और उससे कटती जा रही है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अविवाहित महिलाओं से जन्मे बच्चों के बारे में सिविल अपील संख्या 5003/2015 में यह व्यवस्था दी है :
“The conundrum is whether it is imperative for an unwed mother to specifically notify the putative father of the child whom she has given birth to of her petition for appointment as the guardian of her child. The common perception would be that three competing legal interests would arise, namely, of the mother and the father and the child. We think that it is only the last one which is conclusive, since the parents in actuality have only legal obligations. A child, as has been ubiquitously articulated in different legal forums, is not a chattel or a ball to be shuttled or shunted from one parent to the other……”

ऐसे भी हमारी सनातन संस्कृति  में एक संतान का परिचय अपनी माँ के नाम से दिए जाने के अनेकों उदाहरण विद्यमान है। कौन्तेय,राधेय, देवकीनन्दन, गांधारी पुत्र, गंगा पुत्र आदि आदि। इन समस्त उद्धरणों और पौराणिक प्रकरणों के आलोक में छद्म पुरुष मानसिकता से ग्रसित आलोचकों की अमर्यादित आलोचनाएँ न सिर्फ़ बेमानी हैं, प्रत्युत उनके द्वारा आसमान में थूकने के समान है।
हाँ, देवी के द्वारा विवाह की संस्था के प्रति व्यक्त अविश्वास पुरुष  के चरित्र पर ही ज़्यादा सवाल उठाते हैं।  आज जिस तरह से विवाह टूटते जा रहे हैं यह समाज के लिए नयी चुनौती बनकर उभरा है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसंस का एक सिद्धांत है  ‘Theory of functionalism’( प्रकार्यवाद का सिद्धांत)। इसके अनुसार समाज की या किसी भी व्यवस्था की कोई संस्था या इकाई तब तक ही जीवित रहती है जबतक वह अपने आदर्शों के मापदंड पर खरी उतरती है और अपनी स्थापना के उद्देश्यों  का पूर्णत: पालन करती है। अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि दोहरे मानदंड वाले आज के पुरुष प्रधान समाज में दहेज-हत्या और बलात्कार की सुरसा ने जो अपना मुख फैलाया है, यह बिलकुल स्वाभाविक है कि विवाह जैसी संस्थाओं को वह लीलती जा रही है। कुछ पुरुषों का यह भ्रम है कि समाज में स्त्रियों की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के उठते स्तर का विवाह की संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यदि ऐसा है तो फिर उन पिताओं से पूछिए जो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के इस महायज्ञ में अपने को आहूत कर रहे हैं। सच तो यह है कि छद्म पौरुष का नपुंसक और निकम्मा तत्व अपनी नाकाबिलियत और आशिक्षा के सामने सिर उठाते नारी वर्चस्व को पचा नहीं पा रहा है और उसकी कुंठा आलोचना के नाम पर असभ्य भाषा, और गंदी ज़ुबान में सोशल मेडिया पर बसा रही है। समाज में दहेज हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं पर इस पुरुष समाज का मुँह नहीं खुलता। आज तक हमने नहीं सुना कि इस तथाकथित पुरुष समाज ने ऐसे कुकृत्यों में शामिल किसी व्यक्ति और उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया हो या फिर सामाजिक दंड का कोई ऐसा विधान रचा हो कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृति करने का कोई साहस न कर सके और इन पर स्थायी रोक लग सके। इसी देश में जब एक अनव्याहा पुरुष (फ़िल्म निर्माता करण जौहर) सरोगेशी की तकनीक से दो बच्चों का बाप बनता है, तो इस नपुंसक समाज  के मुँह पर काठ मार जाता है। इसलिए देश की देवी बेटी के इस निर्भीक क़दम को किसी भी पैमाने पर असभ्य भाषा में की गयी आलोचनाओं से नहीं जोड़ा जा सकता है। समय और प्रकृति असभ्य वृत्तियों का स्वत: नाश कर देती हैं।
समाज में आलोचना के नाम पर पनप रही ऐसी कुत्सित प्रवृतियों और सामाजिक कुरीतियों पर लगाम कसना समाज का काम है। जब इन आसुरी वृत्तियों का अत्याचार सर चढ़कर बोलने लगता है तो व्यवस्था की प्रकृति अपने अंदर से ही समाधान की तलाश कर लेती है। अवतार की धारणा के पीछे भी यही सच है। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में भी देवी ने  अपने इसी महात्म्य  की उद्घोषणा की है:
“इत्थम यदा यदा बाधा  दानवोत्था भविष्यति,
तदा तदा अवतीर्य अहं करिष्यामि अरि संक्षयम।“ 


Wednesday, 23 July 2025

बिहार में आंदोलन, राजनीति और विकास




पुस्तक का नाम - बिहार में आंदोलन, राजनीति और विकास
लेखक - शिवदयाल
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन
बिहार के राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की भौतिकी और उसके रसायन की पड़ताल को अपना केंद्र बिंदु बनाती शिवदयाल जी की यह पुस्तक पाठकों को बिहार के इतिहास, भूगोल, समाज शास्त्र, बिहारी जीवन के सामाजिक मनोविज्ञान और सामाजिक आर्थिक चरित्र की तह में ले जाती है और उनके मस्तिष्क में पहले ‘सोचने’ का बीज डालकर फिर ‘समझने’ की छटपटाहट छोड़ जाती है। हमारी दृष्टि में पुस्तक की सबसे बड़ी सार्थकता यही है, क्योंकि ‘सोचने’ के अभाव में ‘समझना’ चिंतन की ओर नहीं, प्रत्युत दासता की ओर ले जाता है। इधर सोशल मीडिया के जमाने में सोचने की प्रक्रिया थम-सी गई लगती है। दिन पर दिन मूल्यहीन होती राजनीति और अयोग्य व अपराधी राजनीतिज्ञों के बहुमत के माहौल में तो राजनीति में सोचने और चिंतन करने की संस्कृति को भी लकवा ही मार गया है। समाज का बौद्धिक वर्ग भी अब राजनीतिक पंथों की चाकरी करता एक बुद्धि-जीवी गिरोह में तब्दील हो गया है।
किताब के पुरोवाक में १९१२ में निर्मित बिहार के २००० में विखंडन की चर्चा है। गौरतलब है कि झारखंड ने आंदोलन कर अपने को बिहार से अलग कर लिया। यह विभाजन के सामाजिक मनोविज्ञान के उलट है। आमतौर पर अविकसित और बीमार भाग अपने को अलग करने की माँग करता है। यहाँ विकसित और स्वस्थ औद्योगिक झारखण्ड ने अपने को अविकसित और बीमार बिहार से अलग कर लिया। खैर, इन्ही विडंबनाओं का नाम बिहार है। पहला अध्याय परंपरा के अनुकूल बिहार के वैभवशाली अतीत का स्वस्ति वाचन है जो एक बिहारी पाठक के सुकून का एकमात्र आलंब और आज के बिहारी नेताओं की निर्लज्जता की अभिव्यक्ति का अल्फ़ाज़ भी है। बिहारी राष्ट्रवाद के मिथक की चर्चा करते हुए लेखक की यह बात गौरतलब है कि ‘ वास्तव में बिहारी राष्ट्रीयता सचमुच मजबूत होती तो एक आदिवासी मुख्यमंत्री को मौक़ा देकर भी बिहार विभाजन को रोकने को कोशिश की जा सकती थी।’ असल में अपनी ऐतिहासिकता का आग्रह बिहार को कभी बिहारी बनने ही नहीं देगा।’बिहार ने अपनी पहचान को भारत की अस्मिता में विलयित करके रखा।बिहार से भारत ही नहीं दुनिया को देखने की परम्परा रही है।’
आज के संदर्भ में लेखक की यह बात बिल्कुल जायज है कि “कई बार ऐसा लगता है जैसे भारत इकतीस राज्यों का संघ नहीं बल्कि वास्तव में छह हज़ार जातियों का संघ है।” और यह जातीय भाव बिहार में इतना उग्र है कि यह किसी भी तरह के क्षेत्रीयतावाद या बिहारी राष्ट्रीयता की लता को पनपने ही नहीं देगा। जातिवाद की इस आग में यहाँ की राजनीति घी ढारती है। सच कहें तो बिहार में जाति रोजी, रोटी और बेटी से मुँह मोड़कर अब राजनीति की गोद में बैठ गई है। १९०१ के जनगणना कमिश्नर रिजले के जाति आधारित सर्वेक्षण के प्रस्ताव को संदेह की दृष्टि से देखा गया था।स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना १९५१ में जातीय गणना को निषिद्ध किया गया। २१ वीं सदी की जनगणना में अब जाति समा गई है। कुल मिलाकर तेजी से बदलते युवा बहुल समाज में जाति के टूटते बंधन को अब नेताओं ने फिर से बांधना शुरू कर दिया है। जाति के समाजशास्त्र के भविष्य को देखना अब बड़ा रोचक होगा।मंडल के जवाब में उठे कमंडल ने समाज का मंथन जरूर किया है।गठबंधन का रसायन बदल गया। एक ऐसा समय राजनीति में आया जब जो जितना छोटा होगा वह उतना शक्तिशाली! और, सत्ता की चाभी उसी के हाथ में। “छोटी इकाइयों में बाँटकर बड़ी लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जा सकती।”
सम्पूर्ण क्रांति और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की वैचारिकी को लेखक ने बड़ी गहरायी में उतरकर देखा है। शिवदयालजी सम्पूर्ण क्रांति के ठोस और वैचारिक आधार को ढूँढ तो लेते हैं, लेकिन इस मेहराब पर अपेक्षित इमारत के खड़े न हो पाने के कारणों को पूरी तरह नहीं बता पाते। भले ही उनके मन ने इसकी संभावनाओं को अभी भी जीवित रखा है। हाँ, जयप्रकाश नारायण के लिए ‘ राजनीति में महत्वपूर्ण न पाने की कुंठा वाले जयप्रकाश’ लिखने वाले इतिहास के नौसिखुए कलाकार प्रियंवद की उन्होंने काफ़ी तर्कपूर्ण ख़बर ली है। हालाकि, इतनी तल्ख़ी की कोई ज़रूरत नहीं थी क्योंकि परवर्ती घटनाओं ने ऐसे अनाड़ी कलाकारों के इतिहास लेखन को स्वतः अप्रासंगिक बना दिया है।
शिवदयालजी ने रामदेव मांझी और पाँचु मांझी की शहादत की यादों की छाया में बोधगया भूमि आंदोलन का सुंदर और सशक्त शब्द चित्र खींचा है। यह क्रांति प्रसूत चेतना का महापर्व था। लेकिन वह भी अब ढाक के तीन पात! ‘उस जमीन की मिल्कियत से भुइयाँ जैसी दलित जातियों का वैसा भावात्मक लगाव नहीं जैसा कि एक आम किसान का अपनी जमीन के प्रति होता है।।’ इस प्रश्न के सांस्कृतिक संदर्भ की पड़ताल में यह बात लेखक की तीक्ष्ण समाजशास्त्रीय दृष्टि से लुका नहीं पाती कि जातीय चेतना अभी भी सांस्कृतिक विलंबन ( cultural lag) का आखेट है।
‘विकल्प की तलाश जारी रखनी होगी ‘ अपने इस लेख में शिवदयाल जी ने बड़ी शिद्दत से समाजवाद के प्रखर प्रवक्ता किशन पटनायक को याद किया है। किसी वस्तु के पूर्णतः नष्टप्राय हो जाने के बाद उसकी गढ़ियायी और जीवंत छाया एक धरोहर के रूप में किसी चित्रकार की पेंटिंग में ही हो सकती है।शिवदयाल जी का खचित किशन पटनायक का यह शब्द चित्र समाजवाद की स्मृति की कुछ वैसी ही धरोहर है।
बिहार में राजनीति और विकास के बीच के द्वंद्व की चर्चा करते हुए लेखक इसके बहिवर्ती और अंतर्वती दोनों कारकों की पड़ताल करता है। लेखक का मानना है कि ‘ पिछड़े समाजों अथवा क्षेत्रों में विकास के लिए जिम्मेदार तत्वों में सत्ता संरचना और राजनीति की दिशा, शासन की नीतियाँ और कार्यक्रम, ब्यूरोक्रेसी, निष्पक्षता और विश्वसनीयता, उत्पादन संबंधों का स्वरूप, उत्पादन एवं वितरण तंत्र की सक्रियता और सबके ऊपर आमजन की इच्छा शक्ति शामिल है।’ बिहार की राजनीति ही बिहार के विकास का सबसे बड़ा रोड़ा है। बिहार की राजनीति और विकास एक दूसरे के विलोम बनकर आमने- सामने खड़े हैं। राजनीतिक इच्छा शक्ति का नितांत अभाव है। राजनीतिक नेतृत्व के पास विकास की दृष्टि का सर्वथा अभाव है।
दलतंत्र के इस दलदल में कुकुरमुत्ते की तरह उगने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की दशा और दिशा पर भी लेखक ने अपनी आँखें फेरी हैं। सिद्धांततः तो स्थानीय मुद्दों की अनदेखी ही निर्दलीय उम्मीदवारों के उदय का कारण होना चाहिए। लेकिन यहाँ मुद्दा स्थानीय हित नहीं बल्कि व्यक्तिगत अहं है।पैसा, जाति और ताक़त ही राजनीति के सबसे जरूरी आयाम हैं। अब तो राजनीतिक संरक्षण में एक नया भू - माफिया वर्ग भी मैदान में उतर आया है, जिसका अपराधियों और भ्रष्ट अधिकारियों के साथ फ़ेविकोल का जोड़ असली जमीन मालिकों पर भारी पड़ रहा है। बिहार में भूमि सुधार की असफलता पर तंज कसते हुए लेखक का यह विचार ध्यातव्य है कि “ मंडलवाद के उफान के दौर में एक समय ऐसा लगा था कि बिहार में सामंतवाद के दिन गिने - चुने हैं, लेकिन बाद में सामंतशाही को चुनौती देनेवाली जमातों ने ही सामंतों का एक नया वर्ग बना लिया। नवसामंतों का यह वर्ग अपने प्रतियोगियों (पूर्वकालीनों ) से भी ज़्यादा रूढ़ और नृशंस साबित हुआ, अपने यथास्थितिवादी आग्रहों में ये और भी संवेदनहीन निकले, चाहे वह जातीय आग्रहों का मामला हो या जमीन के मसले हों।”
शिक्षा व्यवस्था का तो बंटाधार हो गया है। प्राथमिक शिक्षा से गुणवत्ता गायब, माध्यमिक शिक्षा का कोई नामलेवा नहीं और उच्च शिक्षा पतन के गर्त में! बड़ी संख्या में राज्य से बच्चे मजबूरी में बाहर पढ़ने जा रहे हैं। लेखक की इस तहक़ीक़ात से यह बात भलीभांति समझ में आ जाती है कि यहाँ की शिक्षा व्यवस्था चलाने वाले अधिकारी और नेता स्वयं अपने बच्चों को बिहार में क्यों नहीं पढ़ाते।
विकासोन्मुखी गवर्नेंस पर भी लेखक ने अपनी वस्तुनिष्ठ दृष्टि फेरी है। एक ओर लेखक सड़क निर्माण और अन्य आधारभूत संरचनाओं के क्षेत्र में हो रही निरंतर प्रगति को रेखांकित करता है तो दूसरी ओर इसकी विसंगतियों और पर्यावरण और पर्यावास में हो रहे निरंतर क्षरण को आड़े हाथों भी लेता है। शिवदयाल जी ने शराबबंदी क़ानून के कार्यान्वयन के प्रमुख किरदारों की बेवक़ूफ़ी की भी बखूबी चर्चा की है। बिहार का प्रशासनिक तंत्र अपराध के राजनीतिकरण और राजनीति के अपराधीकरण के बीच जाके फँस गया है। जड़ता, ह्रास, संवेदनहीनता, कोताही जैसे लक्षणों वाली बीमारी ‘बिहार सिंड्रोम’ के बढ़ने का तो आलम ये है कि लेखक को चिंता है कि कहीं यह संक्रामक होकर अन्य राज्यों को भी अपने चपेट में न ले ले। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लेखक की यह चिंता बेवजह नहीं है।
लेखक ने कोरोना काल में मजदूरों के आव्रजन से उत्पन्न स्थिति पर गहरा विचार किया है। इसी की ओट में उन्होंने आव्रजन के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को भी खंगाल लिया है। लेखक इन अप्रवासी मज़दूरों के मन में उपजे भय के भाव पर करुणा से विगलित हो जाता है। ‘ एक मजूर की याद ‘ में मज़दूर जीवन की मार्मिक छवि अत्यंत करुण अल्फ़ाज़ों में छलक उठी है। जब करुणा के साथ भय भी उपजने लगे तो समझ लीजिए विनाश दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, या फिर किसी विप्लव, क्रांति या बदलाव की पूर्वपीठिका पक गई है।
लेकिन लेखक आशावादी है और उसकी यह आशावादिता उसे भारतीय मूल्य परंपरा से जोड़े रखती है। वह परिवर्तन की प्रक्रिया की वैज्ञानिक परंपरा के आलोक में समाज का अवलोकन कर रहा है।प्रकृति अपने वजूद की रखवाली का रास्ता ख़ुद तलाश लेती है। “ मानव जाति का इतिहास प्रकृति के साथ अनुकूलन का ही इतिहास नहीं है बल्कि प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने का इतिहास भी है।” पदार्थ हमेशा जड़वत पदार्थ ही नहीं बना रहता। वह अपने को ऊर्जा में रूपांततरित करने की थ्रेशहोल्ड चेतना ख़ुद तलाश लेता है। शिवदयाल जी की यह आशा इन पंक्तियों में व्यक्त होती हैं, “ लेकिन जहाँ से राजकाज की सीमा समाप्त होती है वहीं से जनता की पहलकदमी और उद्यमशीलता से निर्माण का काम प्रारंभ होता है। भ्रष्ट और अकर्मण्य राजव्यवस्था जनता के सामने कठिन से कठिनतर परिस्थितियाँ तो पैदा कर सकती है, लोगों की बेहतर जीवन जीने की आकांक्षा का दमन नहीं कर सकती। राजनीति लाख नचावे, समाज अपनी राह चलता है।” बिहारियों के अद्भुत जीवट का पर्दाफाश भी हैं ये पंक्तियां! यहाँ पर शिवदयाल जी ने बिहार और बिहारी के नब्ज को छू लिया है।
यह पुस्तक मुख्य रूप से शासन से जुड़े किरदारों, समाजशास्त्रियों और सबसे जरूरी आज के युवा वर्ग के लिए पठनीय और संग्रहणीय भी है। सोचने और समझने का भाव जगाने वाली इस पुस्तक के लिए शिवदयाल जी को हार्दिक बधाई !!!

 

Wednesday, 19 February 2025

कस्तूरबा के गाँधी





 कस्तूरबा के गांधी ( नाटक)

रचनाकार - प्रोफेसर रमा यादव

प्रकाशक - संजना बुक्स, डी 70/4, अंकुर एनक्लेव, करावल नगर, दिल्ली 110090

फोन 9650480219, 8860898399

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ज़िंदगी भी एक नाटक ही है। अंतर बस इतना रहता है कि किरदार के हाथ में इसकी पांडुलिपि नहीं होती यात्रा के आरंभ में। यात्रा का भविष्य बिलकुल अनजान होता है। पथ और पाथेय पथिक के साथ एक अराजक  डोर में बँधे होते हैं। कई किरदार मिलते बिछुड़ते हैं। समय, स्थान, परिस्थिति सभी कभी अपने स्वतंत्र प्रवाह में तो कभी एक दूसरे की बहाव में बहे चले जाते हैं। कुछ भी नियोजित नहीं होता। सब कुछ फ्रेश सब कुछ टटका! पूरी की पूरी यात्रा अपने हर क्षण की एक निरुद्देश्य एंट्रॉपी में गमन करती है। किंतु, जैसे ही यात्रा अपने इति श्री बिंदु पर अशेष होती है, यात्रा के किरदार को अपना ‘हिन्डसाईट’ कुछ और ही दिखता है।  मतलब, यात्रा के क्रम में ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर आगे की यात्रा  जितनी ही अनिश्चित, अपरिभाषित, अनियोजित, संदिग्ध, उद्भ्रांत और अनजाना दिख रही थी, यात्रा के अवसान बिंदु पर पहुँचकर पीछे ताकने पर वह समस्त यात्रा-पथ उतना ही निश्चित, सुपरिभाषित, सुनियोजित, स्पष्ट, नि:भ्रांत और मानो पहले से जानी-पहचानी राह के सफ़र  के रूप में दिखायी पड़ता है। गाड़ी के पार्श्व दर्पण के उलट अतीत के बिंब अपनी वास्तविक दूरी से नज़दीक दिखने  लगते हैं। दृष्टि की लौकिकता प्रखर हो जाती है और दृष्टिकोण अलौकिक। दृष्टि देह की देह पर होती है। परंतु, दृष्टिकोण आत्मा का होता है।दैहिक उद्यम का यह आंतरिक संवाद आत्मा के स्तर पर होने लगता है। एक ऐसी ही लौकिक गाथा के पारलौकिक संवाद की द्रष्टा हैं - नाट्य समूह ‘ शून्य’ की संस्थापक नाटककार रमा यादव और इनका मंत्र उचार गूंज रहा है इनकी नाट्य कृति ‘कस्तूरबा के गाँधी’ में। कस्तूरबा और गाँधी की आत्माओं की बातचीत के ये शब्द पार्श्व दीप्ति में आभासित हो रहे हैं। रमा जी  की इस नाट्य प्रस्तुति की पृष्ठभूमि भी बड़ी रोचक है।

“गाँधी पर बहस मुबाहिसे होते ही रहते हैं,……..ऐसा करते- करते  कब गाँधी मन में गहरे समा गये पता ही नहीं चला। …….उस समय जब मंच पर बापू को देखती तो मेरे मन के भीतर की ‘स्त्री’  बापू को ‘बा’ की नज़र से परखती। तभी जब टीकम ने कहा कि गाँधी पर नाटक लिखो जो अलग नज़रिए से हो। मैं सहज ही हाँ कर दी।…….. जब नाटक लिखने बैठी तो एकदम ‘बा’ मेरे मन में आ बैठीं…मैनें जैसे ही नाटक का पहला संवाद लिखा तो ‘बा’ भीतर से बोल उठीं।…. इस तरह से ‘ कस्तूरबा के गाँधी’ की रचना हुई।”

नाटककार के अंतस् में पैठी ‘बा’ की आत्मा का बापू की आत्मा के संग यह आलाप न केवल एक दंपति के मनोभावों का सहज उच्छ्वास है, प्रत्युत उसके भीतर से समसामयिक कालखंड का दीर्घ इतिहास झाँकता है।पति- पत्नी की इस टोका-टोकी और छेड़- छाड़ की मिठास अतीत की तिक्तता  को घुलाकर आत्मिक अभिसार के शाश्वत आसव का प्रसार कर रही है। भौतिक द्वैत आध्यात्मिक अद्वैत में समा जाता है।

‘रघुपति राघव राजा राम’ की सुरम्य धुन से धुलती एक छोटी सी कोठरी। चारपाई, चरखा, चौकी, कलम, दावात, कुछ काग़ज़-पतर और कोने में मिट्टी का घड़ा।कमर में इंगरसोल घड़ी लटकाये गाँधी कुछ लिखने में मशगूल।खद्दर की धोती में हाथ पोंछती और कुछ भुनभुनाती कस्तूरबा का बग़ल के कक्ष से सहसा प्रवेश।नाटक के श्री गणेश का यह सहज दृश्य इसके किरदारों के जीवन दर्शन की आभा से दर्शकों को आरंभ में ही प्रक्षालित कर देता है।

‘ सोचा क्यों न मैं भी तुम्हें आज गांधी कहकर पुकारूँ …’ कस्तूरबा की हँसी से उपजे ये वाक्य बातचीत की शुरुआत में ही अपने पति के साथ समानता के धरातल पर जुड़कर आत्मीयता के वातावरण के सृजन का स्वाभाविक पत्नीधर्मा प्रयास है।’कस्तूर तुम तो मेरे साथ रहोगी न यूँ ही हमेशा….’ इस वाक्य में मानो गाँधी की समस्त अंतर्भूत करुणा एक साथ छलक कर बाहर आ जाती है और बा की मन वीणा के सारे तार एक साथ झंकृत हो उठते हैं - ‘ तुमसे अलग थोड़ी ही हूँ … जिस दिन से तुम्हारे साथ आ गई तुम्हारी हो ली…. जहाँ ले चले चलती रही। मैंने न घर देखा न बार बस रात दिन तुम्हें देखा… ये जो तुम एकदम ज़िद्दी और झक्की।’ यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि यह वाक्य लिखते समय बा सचमुच रचनाकार के मन आँगन में उतर आयी हैं। रमा यादव स्वयं एक नारी हैं और नारी मन की पीड़ा को उन्होंने अपने शब्द चित्रों में एक कुशल चितेरे की तरह उतार दिया है। संभवतः यह संवाद लिखते समय उनके मन में उतर आयी बा के सामने उनका पूरा अतीत उतर आया होगा।

फिर बा के हाथों को थामकर जैसे बहुत कुछ एक साथ सोचते हुए बापू की भाव प्रवण स्वीकारोक्ति, ‘कुछ जगह तो ग़लतियाँ हुई हैं मुझसे….. कुछ जगह क्यों कई जगह पर ग़लतियाँ हुई हैं……’ दर्शकों को ऊहापोह में डाल देता है।वह यह सोचने को विवश हो जाता है कि बापू की इस गलती का इशारा विचारधारा की ओर है या व्यक्तिगत जीवन की ओर! 

गाँधी के हाथ से सूत के गोले को चरखे पर चढ़ाती कस्तूरबा सहज भाव में गुनगुनाने लगती हैं, चदरिया झीनी रे झीनी ….। इस आलाप में जहां एक ओर गाँधी की राजनीति में अध्यात्म तत्व की आहट सुनाई देती है, वहीं बा के अतीत की खट्टी मीठी स्मृतियों का राग भी गूँजता है। गाँधी का अध्यात्म व्यावहारिक था। यह यथार्थ पर टिका था, न कि किसी स्वप्निल आदर्श पर।वहीं कस्तूरबा पग पग पर इस आधात्मिकता की अग्नि में तप रहीं थी और पक रहीं थीं। बा की डबडबातीं आँखों में गाँधी के आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत की टीस तैर रही है।व्रती ने अपने निर्णय में सहचरी के मन का स्पर्श तक न किया! भारतीय संस्कार में सप्तपदी की शर्तों पर यह कुलिश वज्राघात है जिसमें किसी भी पतिव्रता का भहराकर गिर जाना स्वाभाविक है।वह सर्वथा सत्य के इस अनोखे उपासक की टोका-टोकी का अनवरत दंश सहती रही। फिर भी, बा ने वैवाहिक जीवन की डोर को थामे रखा।  इतिहास के समकालीन घटनाक्रम की स्मृतियों में विचरती बा नयनों की बोली में ही बापू को बहुत कुछ समझा जाती हैं। और निरुत्तर गाँधी सिर नीचा किए उसमें गड़े जा रहे हैं। बा के तर्कों से पराजित होने का संशय उनकी आँखों से झाँक रहा है। बा की आंतरिक दृढ़ता बापू के स्मरण में ‘कर्कश’ शब्द बनकर उभरती है। दूसरी ओर बा बापू को जिद्दी करार देती है। फिर, यह कहकर कि ‘यह ज़िद ही बापू की ताक़त थी’, पतिव्रता की पुष्ट परंपराओं के पालने में पलने वाली यह परिणीता अपने प्रियतम पर अपने अभिसार के मधुर भावों को न्योछावर कर देती है। भले ही पखाना साफ़ करने के बापू के फ़ैसले से बा ने ख़ुद को प्रताड़ित महसूस किया हो, किंतु आज के इस अलौकिक मुहूर्त में वह कृतज्ञ भाव से स्वीकार रही है कि गांधी के इस हठ ने गाँधी के साथ-साथ उसे भी तार दिया।


बापू के इस कथन में कि, ‘समझ नहीं आता  कि किस  तरह मनुष्य पर ये बुराइयाँ इतनी हावी हो जाती हैं…… क्यों वो आदमी होकर भी आदमी का दुश्मन हो जाता है ,,,,,क्यों एक जाति मैला ढोने का ही काम करती रहे …….हमारे ही गंदगी साफ़ करे और हम ही उसे अछूत नाम दे दें’,   नाटककार ने समूचे गांधी दर्शन को उड़ेल दिया है। रह रहकर बापू की बातों से बा पर उनकी ज़्यादतियों की यादों से उपजा अपराध भाव बरस पड़ता है, “ जिसने पग-पग पर साथ दिया, उसी की भावनाओं को न समझा।इसे अत्याचार नहीं तो क्या कहेंगे? ये हर कदम पर मेरा साथ देती चली गई ……” बापू का यह स्वगत संबोधन पाठक और दर्शक को करुणा की अजस्त्र धार में  छोड़ आता है। यहाँ गांधी का अपराध भाव हो या एक नारी रचनाकार के मन में अपने मरद की मर्दानगी से मर्माहत पत्नी की मनोव्यथा!, अभिव्यक्ति की सशक्तता ने दृश्य को अत्यंत संजीदा बना दिया है। बापू के अपराध भाव से स्पंदित बा अब उन्हें उनके मूल्यों के उदात्त गौरव का पुनर्स्मरण कराती है, ‘ मुझे याद है तुमने जो कहा था कि -“ यदि मेरे सामने ये सिद्ध हो जाये कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का एक आवश्यकता अंग है तो मैं अपने को ऐसे धर्म के प्रति विद्रोही घोषित कर दूँगा।” अर्वाचीन भारत की वर्तमान विद्रूपता पर बा की विभ्रांति बिलख पड़ती है, “ आज फिर ये सब लोग हाशिये पर आ गये हैं…. मज़दूरों का तो कोई ठौर ठिकाना-सा ही नहीं लगता। कई बार मन तड़प पड़ता है…….” संवेदना की व्यंजना इतनी सघन है मानों नाटककार में स्वयं कस्तूरबा समा गई हों!  

हाँ, लेकिन संवेदना और समर्पण की हहराती लहर में बा का यूँ बह जाना, “ ये भी नहीं कि मैं पुरानी मान्यताओं को मानती थी इसलिए तुम्हें परमेश्वर मान चुकी थी। मेरा अपना ख़ुद का  भी एक मस्तिष्क था …….मैं तुम्हारे साहस की क़ायल थी गांधी”, फेमिनिस्ट वीरांगनाओं के उत्साह पर पानी अवश्य देर सकती है। 

तीन अंकों में पसरे इस नाटक की बनावट और बुनावट अत्यंत सुगठित है। पुस्तक के संपादन में यत्र तत्र त्रुटियाँ आँखों में गड़ती  है। टंकण त्रुटियाँ भी हैं। काल दोष भी दिखता है। चंपारण सत्याग्रह का समय १९१७ की जगह १९२० वर्णित है। पुस्तकाकार में प्रस्तुत यह नाटक आज की एक अत्यावश्यक कृति है। प्रकाशक संजना बुक्स ने  अत्यंत सार्थक और आकर्षक मुखपृष्ठ के  साथ  इस पुस्तक को पाठकों के समक्ष परोसा है । अस्तु!









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