हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही है। यहाँ परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष नहीं, अपितु समीक्षा का विधान रहा है। शास्त्रार्थ के बिंदु विचारधारा नहीं विचार रहे हैं। मतभेद होते रहे हैं, किंतु मनभेद किंचित नहीं। दर्शनों की धारा में विचार आस्तिक और नास्तिक होते रहे लेकिन भारतीय जनमानस ने सभी विचारकों को ऋषि और ऋषि-तुल्य-सा ही सम्मान दिया चाहे वे गौतम हों, कणाद हों, कपिल हों, पतंजलि हो, जैमिनि हों, बादरायण हों, बुद्ध हों, महावीर हों या फिर चार्वाक हों! यहाँ के चिंतन और अनुशीलन में दर्शन की सम्यक्, संयोजक और उद्दीपक धार बही है। वह किसी पंथ या वाद की भँजक और तोड़क विचारधारा नहीं रही। इस परंपरा को रेखांकित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता आज के दिनों में महसूस हो रही है, जब बौद्धिक विमर्श वाले विषयों पर भी विचारधारा के नाम पर भावनाओं की शमशीर चमकने लगी है।
बात हम हाल के उद्घोषित साहित्य अकादमी पुरस्कार और उस पर मची चीं-चीं-पों-पों पर कर रहे हैं। सोशल मीडिया का विज्ञानदीप्त पटल तथाकथित विवेचनात्मक व्याख्यानों और सारगर्भित टिप्पणियों से पट गया है। पुरस्कार का मूल्याँकन विचार के वितान को त्यागकर विचारधारा की कीचड़ में रेंगने लगा है। पूरी तरह से संकीर्ण राजनीतिक रँग में रँगी दो कट्टरपंथी विचारधाराओं की धमक से देश का वातावरण आक्रांत है। एक ओर, सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचार का अरुण केतन थामे दक्षिणपंथी विचारधारा, अभी केंद्र की सरकार सहित अनेक राज्यों में इसी विचार से प्रभावित सियासी धारा बह रही है। दूसरी ओर तथाकथित सेक्युलर झंडे के नीचे बहती समाजवादी वामपंथी या फिर तथाकथित केंद्राभिगामी विचारधारा। स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर क़रीब साठ-सत्तर सालों तक देश की सियासत पर इसी पंथ का राज चला है। आज विपक्ष बनकर इसी धार पर यह पंथ अपनी नाव खे रहा रहा है।
दक्षिणपंथी इस पुरस्कार की आलोचना इस आधार पर कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने इस पुरस्कार के मार्फ़त देश के साहित्य को वामपंथियों के हाथों गिरवी रख दिया है। उनकी दृष्टि में न केवल एक वामी महिला लेखक को यह पुरस्कार परोस दिया गया है बल्कि पुरस्कार निर्धारण करने वाली निर्णायक समिति अर्थात जुरी पर भी सरकार ने वामपंथी साहित्यकारों का क़ब्ज़ा करवा दिया है। वामपंथी चुप्पी साधे हुए हैं। सबसे मज़े की बात और उससे भी बढ़कर विडंबना तो यह है कि ये वामपंथी इस सरकार को अछूत मानने से नहीं चूकते। अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुजरा है, जब इन्हीं वामपंथियों ने इस सरकार के विरोध में अपने साहित्यिक पुरस्कार और अलंकरण वापस कर दिए थे। इस पुरस्कार-वापसी आंदोलन के तमाशबीनों के लिए आज यह संतोष और थोड़ा मनोरंजन का भी विषय है कि अब ये वामपंथी अपने विचारों की उछृंखलता को छोड़ सरकार के साहित्य अकादमी में न केवल जुरी की सदस्यता को स्वीकार रहे हैं, प्रत्युत अकादमी के पुरस्कारों को बड़े गर्व से स्वीकार भी कर रहे हैं। उधर इस बिंदु पर सरकार की भी तारीफ़ करनी होगी कि इसने बड़ी गरिमा से अपने विरोधी तेवर को पुरस्कृत किए जाने के निर्णय का अनुमोदन कर सच्चे अर्थों में न केवल अपने सनातनी संस्कार के संरक्षक होने की उद्घोषणा को पुष्ट किया है बल्कि भारत की इस सनातन परंपरा को गौरवान्वित भी किया है कि हम अपने विरोधियों के विचार को भी आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।
आज भारत की न्यायपालिका को भारत की कार्यपालिका के इस आचरण से सबक़ लेने की घड़ी भी है। पिछले दिनों पाठ्यक्रम में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शामिल किए जाने के मामले में अपनी तथ्यपूर्ण आलोचना से बिफ़री न्यायपालिका को आज अपनी कार्यपालिका के इस व्यवहार को देखना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्कार से परिपूर्ण सरकार के इस सभ्य आचरण के आलोक में अपने न्याय दर्शन का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निर्धारण करना चाहिए। भारत सरकार का यह अकादमिक व्यवहार न केवल लोकतांत्रिक और सुसंस्कृत, प्रत्युत वैज्ञानिक भी रहा है। विज्ञान में दो असमान ध्रुवों में भी आकर्षण होता है।
वाद और पंथ की इस राजनीति ने साहित्य का सबसे बड़ा अहित किया है। दक्षिणपंथियों को वामपंथियों का छद्म सेकूलरिज़म रास नहीं आता, तो वाम पंथियों को दक्षिणपंथियों की राष्ट्रीयता फूटी आँखों नहीं सुहाती। जीते जी इलाहाबाद के दिनों में ‘जब किसी की घनघोर निंदा करनी होती तो उसे सी आई ए का एजेंट घोषित कर देते’। आज उसे ‘भक्त’ या ‘सिकुलर’ घोषित कर देते हैं। इधर वैश्विक पटल पर भी राष्ट्रीय भावनाएँ उबाल पर हैं। वजहों की पड़ताल किए बग़ैर यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि विचारधारा का यह मतभेद मनभेद में बदलता जा रहा है। साहित्य का इस प्रवृति की जद में आना नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है। साहित्य समाज को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। वहाँ प्राथमिकता विचारों की होनी चाहिए, विचारधारा की नहीं। आलोचनाओं की आवाज़ में जोड़ने का जोग होना चाहिए तोड़ने का दंभ नहीं। समीक्षाओं में सामंजस्य का सुर होना चाहिए, संघर्ष की गर्जना नहीं।
१९५९ का साहित्य अकादमी पुरस्कार राष्ट्रीय भावनाओं की ओज से ऊर्जस्वित राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर को उनकी गंभीर शोध और चिंतन से परिपूर्ण गद्य कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को दी गयी थी। प्रखर राष्ट्रवादी दिनकर ने तब के वामपंथी रुझान वाले अपने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की समय पड़ने पर आलोचनाओं में अपने शब्द तुणिर के घातक बाण छोड़ने में कोई परहेज़ नहीं किया था। जुमले में कहते हैं कि एक बार संसद की सीढ़ियों पर चढ़ते समय लड़खड़ाते नेहरू को बलिष्ठ दिनकर ने गिरने से बचा लिया। नेहरू के धन्यवाद ज्ञापन पर दिनकर ने चुटकी ली थी, ‘जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे सँभाल लेता है।‘ बताते चलें कि दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका नेहरू ने लिखी। अभी हाल में एक पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘समय के प्रश्न’। इसके लेखक हैं समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर और इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है दक्षिणपंथी चिंतक राम बहादुर राय ने। भारतीय परंपरा में आज के ये संतोषजनक बिंदु हैं।
बताते चलें कि बंगाल रॉयल सोसायटी ने एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक न्यास के गठन का प्रस्ताव दिया जिसमें देश के साहित्य, दृश्य कला और नृत्य, नाटक एवं संगीत को प्रोत्साहित एवं सँवर्धित करने के लिए यथोचित निकायों की स्थापना की बात कही गयी। इस प्रस्ताव को १९४४ में सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर दी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत इसी प्रस्ताव के आलोक में साहित्य अकादमी, ललितकला अकादमी और संगीत एवं नाटक अकादमी की स्थापना हुई। साहित्य अकादमी के गठन का प्रस्ताव १५ दिसंबर १९५२ को हुआ। इसकी औपचारिक शुरुआत १२ मार्च १९५४ को तत्कालीन उपराष्ट्रपति प्रख्यात दार्शनिक राधाकृष्णन द्वारा इसके विधिवत उद्घाटन के साथ हुई। राधाकृष्णन इसके पहले उपाध्यक्ष बने और प्रधानमंत्री नेहरू पहले अध्यक्ष। श्री कृष्ण कृपलानी इसके पहले सचिव थे। हिंदी भाषा के लिए पहला पुरस्कार १९५५ में माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी काव्य कृति ‘हिम तरंगिणी’ के लिए मिला। तब से अबतक हिंदी भाषा में क़रीब पच्चीस उपन्यासकारों, छब्बीस काव्य-रचनाकारों सहित दर्शन, इतिहास, संस्कृति, विवेचना और आलोचना के क़रीब सात रचनाकारों को उनकी बेहद गंभीर कृतियों के लिए अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। इसमें वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, दिनकर, डॉक्टर नागेन्द्र, नामवर सिंह और हजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखे विद्वान हैं। अकादमी पुरस्कारों का अधिकांश अत्यंत प्रतिष्ठित और निर्विवाद साहित्यकारों को गया है। हालाँकि जयशंकर प्रसाद, मुक्तिबोध, नागार्जुन, विद्यानिवास मिश्र, फणीश्वर नाथ रेणु जैसे अनेक कालजयी साहित्यकारों की झोली में यह पुरस्कार नहीं जा पाया। प्रश्न पुरस्कारों का नहीं है। पुरस्कार नहीं मिलने से ‘कामायनी’ छोटी रचना नहीं हो जाती और ना ही पुरस्कार मिल जाने से ‘रेत समाधि’ साहित्य में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का उत्कर्ष बिंदु बन जाता!
२०२५ का साहित्य अकादमी पुरस्कार वरिष्ठ हिंदी लेखिका ममता कालिया जी को दिए जाने की घोषणा हुई है। उनको यह पुरस्कार उनकी गद्य कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ पर दिया गया है। यह एक संस्मरण रचना है। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर संवेदना से पगी बड़ी सार्थक बातें लिखी हैं – ‘शहर- पुड़िया में बाँधकर नहीं ला सकते साथ; तो क्या!’ लेकिन ममता जी ने बड़ी शिद्दत से अपनी स्मृति के कोर में सँजोए अपने इलाहाबाद के दिनों को अपनी मोहक किस्सागोई कला में पाठकों के सामने इस पुस्तक में परोस दिया है। यह सही है कि ‘युवावस्था में आदमी प्रेम करता है, प्रेम लिखता नहीं’ लेकिन अपनी युवावस्था में इन पंक्तियों:-
‘प्यार शब्द घिसते-घिसते चपटा हो गया है
अब हमारी समझ में
सहवास आता है’
की धमक के साथ अपने साहित्यिक सफ़र का आग़ाज़ करने वाली लेखिका लगता है अपनी यात्रा के वानप्रस्थ में अब अपना प्रेम लिखने लगी है। जो भी हो, लेखिका ने बड़ी सजीवता से कथात्मक शैली में अपनी यादों को जिस सजीवता से सहेजा है, उससे समकालीन साहित्य की दुनिया बाहर झाँकती दिखती है। इसलिए २०२१ में लिखी गयी यह पुस्तक यह वरन एक संस्मरण मात्र न होकर समयुगीन साहित्यिक दस्तावेज़ भी है। तब के इलाहाबाद की धरती पर साहित्य की धारा का संवेग कितना प्रबल था, उसकी आहटें इस पुस्तक के शब्द-शब्द में सुनायी देती हैं। तब ‘संवाद के बजाय विवाद और विमर्श के बजाय अमर्श से काम चलाने का संस्कार अभी नहीं आया था’। साहित्य संवाद की भाषा थी। ममताजी बताती हैं कि ‘भैरव जी ने अश्क़ जी पर एक पूरा उपन्यास लिख डाला - ‘अंतिम अध्याय’। वर्षों बाद अश्क़ जी ने अपनी पुस्तक ‘चेहरे अनेक’ में उनको जवाब दिया।‘ एक अन्य प्रकरण का उल्लेख करते लेखिका सुनाती हैं कि विजयदेव नारायण शाही ने पंत जी को कह दिया कि ‘न, मैंने लोकायतन पढ़ी है, न पढ़ूँगा।‘ पंतजी ने नम्रता से जवाब दिया, ‘आप न पढ़ें, आनेवाली पीढ़ियाँ मुझे पढ़ेंगी।‘ ममता कालिया ने इलाहाबाद के साहित्यिक मिज़ाज की अल्हड़ता और उसकी उर्वरा धरा में बहती हिंदी कहानियों के विकास की धारा का अत्यंत रोचक बतकही शैली में बयान किया है। हालाँकि उनके द्वारा अपनी किताब में वर्णित मार्कण्डेय काटजू से संबंधित एक साहित्यिक समारोह में उपजे विवाद पर कुछ समकालीन और स्वयं को इस समारोह का दर्शक घोषित करने वाले लेखकों ने कटु आलोचना करते हुए इसे झूठ का पुलिंदा बतलाया है। कुछ आलोचकों ने इस बात पर भी ममताजी को कोसा है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में कुछ ऐसे व्यक्तित्वों पर कीचड़ उछाला है जो अपनी सफ़ाई देने के लिए अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस आलोचना में दक्षिणपंथी भारतीय संस्कार बनाम वामपंथी बड़बोलेपन की कुरूपता का संघर्ष दिखायी देता है।
इस पुस्तक में आपको कोई विषय गांभीर्य, किसी चिंतन की गुढ़ता, कोई साहित्यिक दर्शन या कोई रस मीमांसा भले खुलता न दिखे लेकिन यह पाठकों को दादी माँ की कहानियों की तरह बाँधता ज़रूर है। स्वाभाविक है, कि दादी माँ की कहानियों की तरह यहाँ भी आपको अतिशयोक्ति, छद्म दंभ, मन लुभावन लोरी और बतरस का बतासा जगह- जगह मिलेगा। लेखिका ने चूँकि अपनी नज़रों से इलाहाबाद को देखा है, इसलिए समूचे कथ्य में आत्मनिष्ठता का भाव है। एक जगह लेखिका का साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह/दुराग्रह ईमानदारी से चाहे/अनचाहे टपकता-सा दिखायी देता है। मुस्लिम बहुल मुहल्ले में तनाव के वक़्त एक मुस्लिम दंगाई द्वारा बिजली/फ़ोन की लाइन काटे जाने का दृश्य लेखिका को अंदर से दहला देता है और सुरक्षित मुहल्ले में उनके जाने के क्रम में उनके अंदर का भय एक दुस्वप्न की भाँति पाठकों को स्पष्ट दिखायी देता है : - ‘रानी मंडी ऐसा अल्पसंख्यक मुहल्ला था जो अमन चैन में तो घोंसले की तरह सुरक्षित था लेकिन हिंसा का एक भी वाक़या होने पर सुलग उठाता था। मैं खिड़की……….. ……काट दिए। अपने ही घर से………………।‘
रही बात मंगलवार और बुधवार को नान-वेज खाने वाले प्रकरण की तो इस पर उठने वाले सवालों या आलोचनाओं में कोई दम नहीं है। यह आज के भारतीय जीवन का सच है जिसे कोई भी ईमानदार आदमी झुठला नहीं सकता चाहे वह दाम हो या वाम! न ही यह प्रकरण किसी की आस्था पर कोई प्रहार करता है। इसलिये हमें इस पुरस्कार के जुरी सदस्यों – आदरणीय अरुण कमल जी, अनामिका और अरविंदाक्षन के विवेक का सम्मान करते हुए ‘आलोचना में कटखनापन से परहेज़ करना चाहिए’। किसी पंथ के चश्मे को पहनकर इस पुस्तक को मिले ‘पुरस्कार की अहमियत को नकारना बौड़मपना ही होगा’। यह भी कहना असंगत और तर्कहीन होगा कि ‘कभी-कभी पुरस्कारों की घोषणा किताबों की गोदाम को दीमक-चूहों से बचा लेती है’। इसलिए ‘भले ही रूचियाँ आपस में रगड़ खाएँ, मगर सब एक दूसरे को पढ़ें और संवाद गतिशील रहे।‘
ममता कालिया को “ ‘जीते जी’ इलाहाबाद” की बधाई!!!

No comments:
Post a Comment