गलथेथरई
Saturday, 10 October 2026
भौचक्का-सा (लघु कथा)
Saturday, 5 September 2026
‘शिक्षक दिवस’ या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’
आज शिक्षक दिवस के पुनीत अवसर पर हमारे मन में हमारे दो राष्ट्रपति सजीव हो उठते हैं। एक तो राधाकृष्णन और दूसरे अब्दुल कलाम। पहले ने अपनी जन्मतिथि को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया, तो दूसरे ने अपने जीवन की अन्तिम साँस भी शिक्षक की भूमिका निबाहते हुए ही ली। ज्ञातव्य है कि एक कक्षा में पढ़ाते समय ही कलाम साहब का देहावसान हो गया था। पता नहीं भारत के भविष्य को ऐसे महिमामय महापुरुष और भारत के सत्ता शिखर को ऐसे सुखद संयोग फिर कभी नसीब हो या न हो! परन्तु यह बात तो तय है जो जीवन के कुरुक्षेत्र में योग का अमृत बाँचते हुए आध्यात्मिक गुरु योगेश्वर श्री कृष्ण ने किंकर्त्तव्यविमुढ और आत्मिक उलझनों में उलझे अवसन्न अर्जुन को ये शाश्वत वचन सुनाए थे कि ‘कर्म के बीज का नाश नहीं होता’। भारत की यह माटी ऐसे पुनीत ज्ञान-कर्मों, प्रवचनों और परम्पराओं के बीज से पटी है कि ज्ञानवाचक महान गुरुओं की यह महान श्रिंखला शायद ही कभी लुप्त हो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार से प्रकाश में जाने की उत्कण्ठा ही हमारे ज्ञान दर्शन का मूल रहा है। ‘गु’ का अर्थ तमस अर्थात अज्ञान का अन्धकार होता है। ‘रु’ का अर्थ निवारण करने वाला होता है। अत: गुरु का शाब्दिक अर्थ अन्धकार से निजात दिलाने वाला होता है। अर्थात जो असत्य से सत्य की ओर ले जाए। ‘शिश’ धातु से व्युत्पन्न ‘शिष्य’ शब्द का अर्थ भी सीखना होता है। इसलिए हमारी ज्ञान परम्परा में शिष्य ज्ञान का साधक होता है जिसके जीवन का लक्ष्य अज्ञानता के तिमिर का उच्छेदन कर आत्मज्ञान और विवेक के आलोक से दीप्त होना है।
वैदिक काल की गुरुकुल व्यवस्था एक स्वायत्त व्यवस्था होती थी जिसका सबकुछ कुलपति के अधीन होता था। इस पर राज्य का कोई नियन्त्रण नहीं होता था, बल्कि गुरु राजमहल के लिए विशेष श्रद्धा के पात्र होते थे। यह स्व-वित्तपोषी भी होता था। छात्र भिक्षाटन कर आश्रम की व्यवस्था चलाते थे। गाँव- समाज से भी लोग गुरुकुल को सहयोग देते थे। राज्य भी सहयोग कर दिया करता। किन्तु गुरुकुल पर बाहर का कोई प्रशासनिक नियन्त्रण नहीं रहता। यह पूर्ण रूप से आवासीय व्यवस्था थी जहाँ गुरु की छत्रछाया में बिना किसी भेदभाव के छात्र अपने अध्ययन में लीन होते थे। यहाँ जीवन की समस्त विधाओं का पाठ पढ़ाया जाता। गुरु अपने आसन पर बैठकर छात्रों को पाठ पढ़ाते और उनके समीप नीचे बैठे छात्र श्रुति परम्परा में उन पाठों को आत्मसात करते। इसे उपनिषद कहते हैं। गुरु शिष्य को साहचर्य भाव से देखते:
‘स: नौ अवतु, स: नौ भुनक्तु स: वीर्यं करवावहै।
तेजस्वी नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै’।
गुरु का स्थान भी अत्यन्त पूजनीय होता – ‘गुरुम सर्वदा पूज्यम श्रद्धया समन्वित:’। मान्यता है कि शिव आदि गुरु हैं। उनके सात शिष्य – अत्रि, भृगु, गौतम, वशिष्ट, अंगिरा, मरिचि और पुलह – सप्तर्षि नाम से जाने जाते हैं। इन सातों गुरुओं के आश्रम से नि:सृत विचार पद्धति (school of thought) एक शाश्वत परम्परा के रूप में आगे बही। कालान्तर में अन्य गुरुओं और गुरुकुल परम्पराओं का विकास होते रहा तथा समाज में ज्ञान की बहुमुखी धाराएँ प्रस्फुटित होती रहीं। प्रसिद्ध गुरु-शिष्यों की बात करें तो महर्षि धौम्य – आरूणी, आरूणी -सत्यकेतु, वशिष्ट/विश्वामित्र – राम, वाल्मीकि – लव कुश, सन्दीपनी -कृष्ण, परशुराम – कर्ण, द्रोण – अर्जुन, गौतम -जाबालि, वृहस्पति – देवता, शुक्राचार्य – दानव आदि प्रमुख रहे। बाद में आलार कलाम – गौतम बुद्ध, चाणक्य – चन्द्रगुप्त, आदि शंकराचार्य – ( पद्मपाद, मण्डन मिश्र, हस्तामलक, तोटक), रामानन्द –( अनन्तानन्द, कबीर, सुखानन्द , धना, सेन, सुरसुरानन्द, पद्मावती, नरहरि, पीपा, भावानन्द, धरहरी, रैदास), बाबा नरहरि – तुलसीदास, मत्स्येन्द्रनाथ – गोरखनाथ, रामदास समर्थ – शिवाजी, तोतापुरी महाराज – रामकृष्ण परमहंस, रामकृष्ण परमहंस – स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विरजानन्द – स्वामी दयानन्द, गुरु गोविंद सिंह – ( बन्दा सिंह बहादुर, दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकाम सिंह, हिम्मत सिंह, साहिब सिंह) जैसे गुरु -शिष्यों ने ज्ञान परम्परा की इस गरिमा को बनाए रखा। योग, भक्ति, अध्यात्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, ज्योतिष, वेदांग, चिकित्साशास्त्र, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद, तन्त्र-साधना, रसायनशास्त्र, वैमानिकी, गणित, धातुशास्त्र, कृषि, वनस्पति, मौसम और नीतिशास्त्र जैसे ज्ञान का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं था जो इन महान गुरुओं की परिधि के परे हो। जीवन का रहस्य, आत्म- अन्वेषण, परमात्म परिचय और मोक्ष की प्राप्ति समस्त ज्ञान के उद्देश्यों की परिणती थी। गुरुओं के द्वारा दिए इस ज्ञान दर्शन से आलोकित शिष्य और समस्त समाज की दृष्टि में गुरु का स्थान सर्वोच्च था –
गुरुर्ब्रह्मा, गुरु: विष्णु, गुरु देव महेश्वर,
गुरुदेव साक्षात पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:।
गुरु नानक ने तो गुरु के स्थान को ईश्वर से भी ऊँचा बताया –
गुरु गोबिन्द दोउ खड़े, काकों लागे पाय,
बलिहारी गुरुदेव की गोबिन्द दियो बताय।
कबीर ने कहा –
गुरु कुम्हार शिष्य घट है, गढि गढि काढ़ै खोट,
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।
अर्थात गुरु अपने शिष्य को वैसे ही गढ़ता है जैसे एक कुम्हार अपने मिट्टी के घड़े को। अन्दर से अपने हाथों का सहारा देकर बाहर से हल्की चोट देता है ताकि वह शिष्य रूपी घड़ा अपनी आकृति ग्रहण कर सके। इसलिए भारतीय परम्परा में सबसे बड़ा दाता गुरु को ही माना गया है –
‘गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान,
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।
लोक मानस के महाकवि तुलसी तो गुरु की महिमा शिव और ब्रह्मा से भी ऊपर मानते हैं –
गुरु बिन भव निधि तरई न कोई,
जौ बिरंचि संकर सम होई।
यह परम्परा थी कि राजा या सम्राट जब कभी किसी गुरुकुल या विश्वविद्यालय में जाते तो प्रवेश द्वार पर ही अपना राजमुकुट और अपने अंगरक्षक छोड़ जाते। गुरु के आश्रम में प्रवेश करने पर गुरु अपने ऊँचे आसान पर बैठते और राजा नीचे ज़मीन पर। बौद्ध विहार भी शिक्षा के केन्द्र बने रहे। तक्षशिला, नालन्दा, ओदन्तपुरी, विक्रमशिला जैसे शिक्षा संस्थान अपने विद्वान गुरुओं की गरिमा के साथ छात्रों के विद्या अर्जन के प्रमुख केन्द्र बने रहे। इनकी संरचना भी पारम्परिक गुरुकुलों की तर्ज़ पर ही कमोवेश क़ायम रही और विश्व के कोने-कोने से छात्र यहाँ अध्ययन हेतु आते रहे।
मुग़लों के आगमन के बाद से स्थिति में परिवर्तन दिखना शुरू हो गया। तब शिक्षा को राजकाज की भाषा फ़ारसी से जोड़ा जाने लगा और मदरसों एवं मकतबों की स्थापना होने लगी जिसे राज्य का अनुदान मिलना शुरू हो गया और धीरे-धीरे शिक्षा संस्थानों की यात्रा राजाश्रयी या सरकारीकरण की ओर उन्मुख होने लगी। अंग्रेज़ों के आने के बाद शिक्षा की अवधारणा ही बदल गयी। अंग्रेज़ों को अपना राज चलाने के लिए भारी मात्रा में किरानियों की ज़रूरत पड़ी और उन्होंने उसी हिसाब से शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। यहाँ से भारतीय शिक्षा तथा शिक्षकों के चाल और चरित्र पर ब्रिटिश नीति के व्यापक परिवर्तन का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हो गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हम अंग्रेज़ी पद्धति पर ही आधुनिक शिक्षा के मॉडल का अनुसरण करते रहे।
आज स्थिति यह है कि मेकौले के पदचिह्नों पर चलती शिक्षा-व्यवस्था ने हमारे प्रशासन में नीचे से ऊपर तक किरानी भर दिए। लिपिक से सचिव तक। गुरु की स्थिति ‘शिक्षण-कर्मचारी’ की हो गयी। ये ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अपने कार्य निष्पादन में ‘शिक्षणेत्तर किरानियों’ के नियन्त्रण में आ गए। शिक्षा संस्थान या तो पूरी तरह से राज्य के नियन्त्रण में आ गए या पूरी तरह निजी नियन्त्रण में। सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कर्मचारियों के मुख्य कार्य में खाना बनवाना, चुनाव की मतदाता सूची तैयार करना और जनसंख्या कर्मचारी के रूप में लोगों की गिनती करना है। व्यावसायिकता, समाज की गिरती नैतिकता, शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा के प्रतिशत का काम हो जाना, राजनीति से अच्छे लोगों का बहिर्गमन और समाज के निकृष्टतम तत्वों से इसका भर जाना, अर्थतन्त्र की समाजतन्त्र पर गहरी पकड़, मेकौले की सन्तति, किरानियों, का भ्रष्टाचार के उत्तुंगतम शिखर का अतिक्रमण कर लेना, जीवन के मूल्यों की परिभाषा का बदल जाना, नयी पीढ़ी का अपने मौलिक संस्कार और गौरवमयी परम्परा से कट जाना, शिक्षा का एक उद्योग-धन्धा का रूप ले लेना, जगह- जगह शिक्षा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह दुकानों का खुल जाना, घोर असभ्य, अशिक्षित, काला अक्षर भैंस बराबर और शैक्षणिक कुसंस्कारों के प्रतिनिधियों का शिक्षा मन्त्री तक बन जाना … ऐसे ढेरों कारण आज के दिन में उपस्थित हैं, जिसने समाज की सबसे गौरवमयी संस्था, ‘गुरु’, को एक कमज़ोर ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अर्थात ‘शिक्षक’ के रूप में बना दिया है।
हरिशंकर परसाई ने एक जगह लिखा है कि दिवस हमेशा से कमज़ोरों का या लुप्त होती जा रही चीज़ों का ही मनाया जाता है। इसीलिए हमारे यहाँ डॉक्टर दिवस, इंजीनियर दिवस, शिक्षक दिवस आदि मनाया जाता है। ये सभी समाज के निर्माण और उत्थान की रीढ़ हैं, लेकिन आज की व्यवस्था के प्रशासनिक ढाँचे में बेचारे सबसे लाचार और कमज़ोर हैं। आपने कभी थानेदार दिवस, किरानी साहेब दिवस, बड़ा बाबु दिवस या मन्त्री दिवस नहीं सुना होगा। जब भी कोई नया तबक़ा इन कमज़ोरों की सूची में शामिल होगा, उसका दिवस मनाया जाएगा। हम आभारी हैं राधाकृष्णन के, जिन्होंने उन्नीस सौ बासठ में ही शिक्षकों के भविष्य को भाँप लिया था और अपने जन्मदिन को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया था। राधाकृष्णन इस सनातन परंपरा के उद्भट विद्वान दार्शनिक थे। उनकी और कलाम दोनों की शिक्षा किसी विदेशी संस्थान में नहीं हुई थी। वे विशुद्ध भारतीय मिट्टी और भारतीय संस्कार की उपज थे। फ़िलहाल उनकी स्मृति ही आज के शिक्षकों और इस देश के लिए गर्व की अनुभूति का एकमात्र कारण प्रतीत होता है। अब इसे ‘शिक्षक दिवस’ कहें या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’!
‘शिक्षक दिवस’ की बधाई और एक नए भविष्य की आशा की शुभकामनाएँ!
Sunday, 9 August 2026
पर्यटन निश्चिन्तता
हमने जो शब्दावली चुनी है, ‘पर्यटन निश्चिन्तता’ इसे अंग्रेज़ी में टुरिज़म श्योरिटी (tourism surety) कहते
हैं। यह इक्कीसवीं सदी का शब्द है। यह ‘टुरिज़म सेफ़्टी’ और ‘टुरिज़म सिक्यूरिटी’ को समाहित किए एक
विस्तृत अर्थवाली शब्दावली है। ‘सेफ़्टी’ शब्द का सम्बन्ध क्षति पहुँचाने वाली उन चुनौतियों से हिफ़ाज़त का
है जिनका कारण कोई भूल-चूक या ग़ैर-इरादतन हो। जैसे दुर्घटनावश होटल में आग लग जाय, मकान गिर
जाय, वाहन-दुर्घटना, प्राकृतिक-आपदाएँ आदि।
‘सिक्यूरिटी’ का अर्थ उन चुनौतियों से बचाव है जो पूर्णत: इरादतन पैदा की जाती है। जैसे चोरी-डकैती,
छीना-झपटी, आतंकवादी घटनाएँ, आन्तरिक अशान्ति, आपराधिक घटनाएँ आदि। इन शब्दावलियों के
आलोक में यदि हम पर्यटन-उद्योग के संकट की समीक्षा करें तो सम्भवतः हमारी दृष्टि ज़्यादा वैज्ञानिक और
विश्लेषण के स्तर पर ज़्यादा प्रखर हो। पहले हम पर्यटन की दशा और दिशा पर भी थोड़ी नज़र फेर लें।
पर्यटन का अर्थ अपनी जगह से किसी सार्थक उद्देश्य के साथ बाहर जाना है। यह एक सकारात्मक विस्थापन
है। इसकी सकारात्मकता की शक्ति का अन्दाज़ा आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि भारत में आर्यों को
बाहरी बताने वाले मुलर का ‘आर्य-अतिक्रमण-सिद्धान्त’ जब वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त निष्कर्षों की
कसौटी पर भहराने लगा तो इतिहासकारों ने इसे ‘आर्य-पर्यटन-सिद्धान्त’ कहना शुरू कर दिया। अब तो
बात यहाँ तक आ गयी कि आर्यों की मूल-भूमि भारत है जहाँ से पर्यटन के सिलसिले में वे दुनियों के बाक़ी
हिस्सों में छा गए। बात जो भी हो, इस पर्यटन के क्रम में पर्यटकों को कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा
इसका वृतान्त आदि काल से आधुनिक काल तक फैला हुआ है। चाहे मेगस्थनीज़ हो, ह्वेनसांग हों, अल
बरुनी हों, फाहयान हों, कोलम्बस हों, अमेरीगो हों, आदि शंकराचार्य हों, तुलसी हों, कबीर हों, राहुल
सांकृत्यायन हों, केदारनाथ के दर्शनार्थी हों, प्रयागराज के कुम्भ के स्नानार्थी हों या चिकित्सा-पर्यटन एवं
अध्ययन-पर्यटन पर निकलने वाले यात्री हों – सबकी यात्राएँ जोखिम से भरी रही हैं और उनकी चुनौतियाँ
समयुगीन विसंगतियों को उजागर करते रही हैं, भले ही उनकी प्रवृति और प्रकृति समान हो या अलग-
अलग। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता पूरी तरह से ये यात्राएँ महफ़ूज़ नहीं रहीं।
पर्यटन मानव जाति का एक सामाजिक और सांस्कृतिक उद्यम है। विकास के सोपान पर बढ़ते क़दम और
उत्तरोत्तर तकनीकी विकास ने इस सम्पूर्ण संसार को एक ‘वैश्विक-ग्राम’ अर्थात ग्लोबल-विलेज में तब्दील
कर दिया है। उन्नत संचार एवं यातायात साधनों से भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सांस्कृतिक दूरी भी अब
सिमट गयी है। इसलिए पर्यटन के उद्देश्य और इसके आयतन में भी दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ोतरी होती
जा रही है। अब घूमने-फिरने और देश-दुनिया देखने के अलावे लोग मेडिकल-टुरिज़म, व्यावसायिक-टुरिज़म
और एजुकेशन-टुरिज़म पर तक निकलने लगे हैं। यदि हम भारत की ही बात करें तो घरेलू पर्यटन के आकार
में आशातीत वृद्धि हुयी है। पड़ोसी देशों से अध्ययन के लिए छात्र और चिकित्सा के उद्देश्य से रोगियों की
संख्या बढ़ने लगी है जो भारत में अपने रहने के दौरान यहाँ के प्रमुख स्थलों चाहे वे ऐतिहासिक हों या
धार्मिक, के भ्रमण में रुचि दिखाने लगे हैं। घरेलू पर्यटन के साथ अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन में भी अपने देश के लोग
रुचि दिखाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक निश्चिन्त पर्यटन तभी कहा जाएगा जब अपने घर से निकला
पर्यटक अपनी सुरक्षित यात्रा कर पूरी तरह से महफ़ूज़ अपने घर लौट आए।
आज के समय में पर्यटक की सुरक्षा के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ मुँह बायें खड़ी हैं। पर्यटन-केंद्र वाले देश
की आन्तरिक-अशान्ति, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक-असन्तोष, उस पर बाहरी सैन्य-आक्रमण,
महामारी, प्राकृतिक आपदा जैसे अनेक कारक हैं जिससे आज का पर्यटक जूझ रहा है। किसी देश की
आन्तरिक-अशान्ति में वहाँ की क़ानून-व्यवस्था, भीड़ नियन्त्रण के समुचित प्रबन्धन का अभाव, हिंसक
आन्दोलन, स्थानीय स्तर पर चोरी, डकैती, छीना-झपटी, पर्यटकों पर हमला, यातायात की दुर्व्यवस्था,
पर्यटकों के ठहरने के असुरक्षित स्थान आदि शामिल है। प्रयाग राज में कुम्भ मेले में भगदड़ की घटना की
याद आगे के प्रबन्धकों के लिए आँख खोलने वाली घटना है। अभी हाल में ही मालवीय नगर के एक होटल में
लगी आग की भीषण दुर्घटना में दर्जनों विदेशी और देशी पर्यटक झुलस कर मर गए। नक्सलवाद के कारण
झारखण्ड, बिहार, छतीसगढ, मध्य-प्रदेश, आँध्रप्रदेश आदि राज्यों के पर्यटन उद्योग ने दम तोड़ दिया था।
यही हालत आतंकवाद को लेकर जम्मू-कश्मीर और खलिस्तान आन्दोलन के दौरान पंजाब की थी।
‘ऑपरेशन-सिन्दूर’ की पृष्ठभूमि में कश्मीर में पर्यटकों पर हुए आतंकवादी हमले सर्वदा चुनौती बने रहेंगे।
पर्यटकों की भी अपनी आर्थिक हैसियत के हिसाब से अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। निम्न-आय का पर्यटक अपने
कन्धे पर झोला टाँगे अपनी जेब के हिसाब से ही सुविधाओं का उपभोग करने को लाचार है। स्थानीय स्तर
की सुरक्षा सम्बन्धी कठिनाइयों का सबसे अधिक प्रहार उसे ही झेलना पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी के
समय पर्यटकों का फँस जाना अभी हम नहीं भूल पाए हैं। अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी
हमले ने तो अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन की रीढ़ ही तोड़ दी। पिछले दस बरसों में बाली, इज़रायल, केन्या, लॉस-
एंजल्स ,मेसिको, मोरक्को, पेरू, ईरान और सउदी अरब के देशों के पर्यटन केन्द्र को तबाह कर के रख दिया।
आतंकवाद के निशाने पर न केवल पर्यटक बल्कि पर्यटन केन्द्र की दुर्लभ दर्शनीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक
धरोहरें भी रहीं। तालिबान आतंकवादियों ने बामियान घाटी में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को तोड़
डाला था।
सुरक्षा की इन चुनौतियों को अलग-अलग उनकी प्रकृति के स्तर पर सक्षमता से निबटे जाने की आवश्यकता
है। इसके निदान का स्वरूप स्थानीय स्तर से लेकर, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों के
स्वरूप के आधार पर एकीकृत प्रयास एवं पारस्परिक सहयोग में निहित है। पारम्परिक मीडिया, समाचार-
तन्त्र एवं सोशल मीडिया से भी एक सकारात्मक भूमिका की अपेक्षा है। पर्यटकों के अन्दर सुरक्षा का
विश्वास-भाव ही पर्यटन उद्योग में जान डाल सकता है। निश्चिन्त पर्यटक, समृद्ध पर्यटन।
Wednesday, 22 July 2026
कुछ बोलो जंतर मंतर
नहीं ठहरता काल तनिक,
तुमसे जादा कौन जाने।
कितने आए कितने गए,
लंगड़े, बहरे काने।
ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर,
आ गए आलमगीर।
रुन्ड-मुन्ड चीखे दारा का,
हाय! हिंद की पीर।
सिसकी फिरती सरस्वती
साधक हुए अधीर।
कुछ बेचारे फाँसी लटके,
हो गए गति वे वीर।
करे खगोल की खड़ी गिनती क्या,
अंतरिक्ष में तारों की।
जरा देख दुर्गत गोदी की ,
भारत वंश चीत्कारों की।
इंद्रप्रस्थ के धर्म महल में
पांडव खाए हंटर।
नहीं सुहाती चुप्पी तेरी,
कुछ बोलो जंतर मंतर।
#जन्तरमन्तर
#jantarmantar
Thursday, 4 June 2026
ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया!
अनजाने ॐकारा भरती,
गिरती-पड़ती हर की पौड़ी।
‘यू टू वर’ नीट धुरफ़ंथी,
नहीं सुहाती फूटी कौड़ी।
कबडी, कबडी, कबडी करती,
चौथे खम्भे तक जा दौड़ी।
बेनक़ाब गोदी भई मीडिया,
नौड़ी, दो कौड़ी की छौड़ी।
हक़- हकूक के हाल पर हरदम,
हकलाती, इठलाती तुतली।
ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन!
राज महल नाचे कठपुतली।
हिंदू-मुस्लिम पुड़िया लेकर,
भानुमती ये खोले पिटारा।
आगे नाथ और पीछे पगहा,
गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।
हाय! कितनी बदल गयी यह,
संवादों की अपनी दुनिया।
कल से आते- आते ‘आज तक’,
ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया!


