Friday, 19 February 2021

अँधेरा बो रहा है!

 दिखाने को तो बस एक ही दिखाता

सारा संसार डबल जी रहा है।


नुमाइश ही भर है, लाजो सरम की,

भीतर-ही-भीतर गैरत पी रहा है।


खंजर जिगर पर पीछे से लगाकर,

जख्म अंदर और बाहर सी रहा है।


रुखसार पर है  हंसी का ही पहरा,

आस्तीन में पोसे वो साँप ढो रहा है।


लबों को कर लबरेज मीठी बोली से,

मैल है अंदर और बाहर धो रहा है।


वस्ल-ए-मुहब्बत, जिस्मानी जहर जो,

उजाले में वो, अंधेरा बो रहा है।


Saturday, 30 January 2021

गुणवत्ता - लघुकथा

 राजा तो दोनों ही थे। दोनों जनता से चुनकर भी  आए थे। पहले ने अपने मित्रों के साथ गठबंधन कर सरकार बनायी। 'मित्रों' की गुणवत्ता इतनी बढ़िया थी कि उसे दुश्मनों की कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

 और दूसरा! अपने दमख़म पर। उसके चारों ओर  केवल दुश्मन ही दुश्मन। किंतु, दुश्मनों की 'गुणवत्ता' इतनी उत्कृष्ट कि अब उसे किसी मित्र की कोई आवश्यकता नहीं! एकला चलो !

Tuesday, 26 January 2021

मेरी लघुकथा

 भइया! हम बेजुबान किसान मज़दूर, गरीब-गुरबा और बिना टेक्टर वाले जरूर हैं, लेकिन दलाल, दंगाई और देशद्रोही नहीं!!!!

हम तो कोरोना में हज़ार माइल पैदले अपने गांव चले आये, हमार बेटी बीमार बाप को साइकिल पर बइठा के गुड़गांव से दरभंगा पहुंचा दी। लेकिन न किसी ने हमें टेक्टर पर बईठाया, न ही हमने किसी के आगे हाथ पसारा।

जय जवान, जय किसान।

Thursday, 21 January 2021

'संवेदन-शीलता की नामर्दी'!

 भारत में कोरोना के टीके पर मचा अनावश्यक विवाद भारत के समाज शास्त्र के एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत तो कहीं नहीं करता है! ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी टीके नहीं लगे? पहले से अधिकांश टीके छोटे बच्चों और महिलाओं को ही लगते आ रहे हैं। किन्तु, अबकी बार यह वयस्क मर्दों को भी लगने वाला है। इसीलिए तो अबतक महिलाओ और बच्चों के टीके पर चुप रहने वाला 'मर्द' समाज अबकी बार अत्यंत संवेदनशील हो गया है। क्या कहेंगे इसे- 'मर्दों की संवेदनशीलता' या 'संवेदन-शीलता की नामर्दी'!

Wednesday, 16 December 2020

किसान आंदोलन, सत्याग्रह और 'चंपारन मीट हाउस'

 कल किसी से फ़ोन पर बात हो रही थी। एक पता बताने के क्रम में उन्होंने कहा कि इंदिरापुरम में 'चंपारन मीट हाउस' के पड़ोस में अमुक स्थान है। मैंने चौंककर पूछा, "क्या कहा,  चंपारन मीट हाउस, यहाँ भी!" उन्होंने पलटकर जवाब दिया, "क्यों, क्या हुआ? 'चंपारन मीट हाउस' का चेन तो इंदिरापुरम  ही क्यों, नोएडा से लेकर दिल्ली तक में हैं।चंपारन बिहार का एक ज़िला है।वहाँ के मीट बनाने की तकनीक और वहाँ के मसालों पर बने मीट बड़े लोकप्रिय हैं और मीट के ये दुकान चंपारन की पहचान हैं।' 

ख़ैर, हमारी बात ख़त्म हो गयी और मेरे मन में विचारों का एक द्वंद्व शुरू हो गया। सामने टीवी पर ऐंकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर किसान आंदोलन की आँखों देखी  बयान कर रही  थी। आंदोलनकारी  किसानों की लम्बी-लम्बी एसयुवी गाड़ियों की दूसरी पंक्ति शनै:-शनै: हाई-वे के बाई-लेन पर उतरकर  जाम करने की दिशा में आगे बढ़ रही थी कि पुलिस ने उन्हें रोक दिया था। अन्नदाताओं की लम्बोदर सीडान गाड़ियों की पहली  पंक्ति ने  हाई-वे पहले से ही जाम कर रखा था।  अनाज, दूध, अंडा, सब्ज़ी सबकुछ का परिवहन ठप हो गया था। लाखों की सब्ज़ियाँ सड़ रही थी। ग़रीब किसानों के पेट पर हर दिन लात पड़  रही थी। 'चंपारन की पहचान अब मीट की दुकान पर'  और 'किसान आंदोलन  हाई-वे पर ' - दोनों अब एक कड़ी में जुड़कर मुझे अतीत में घसीट ले गए...................

"सन १९१६-१७ का ज़माना था। चंपारन के बेहाल  किसानों की सिसक लखनऊ  में कांग्रेस के मंच पर किसानों के नेता राजकुमार शुक्ल की बोली में फफक पड़ी थी। किसी ने नहीं सुनी । हार-पाछकर शुक्लजी ने गांधीजी के पाँव पकड़ लिए थे। चंपारन का वह  अनपढ़ और अनगढ़ किसान गांधी को अपने  प्रभाव-पाश में बाँधकर कलकत्ता, पटना और मुज़फ़्फ़रपुर के रास्ते चंपारन लेकर आया। गांधी ने इस देश की धरती पर अपनी गांधीगिरी का पहला प्रयोग किया।  इस आंदोलन से उस समय के सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस को सटने  नहीं दिया। सत्याग्रह का ब्रहमास्त्र भारत की धरती पर पहली बार छोड़ा। इस आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम में चंपारन में जगह-जगह गांधी ने बुनियादी विद्यालय खोले। कृपालानी पढ़ाने गए। महिलाओं को पढ़ाने कस्तूरबा गयीं। स्वच्छता अभियान की शुरुआत हुई। क़ौमी एकता पर बल दिया गया । यह आंदोलन पूरी तरह से एक सामाजिक क्रांति का सूत्रधार बना। गांधी ने किसी भी तरह की टकराहट  से परहेज़ किया और प्रशासन को हर तरह की सुविधा  आंदोलनकारियों ने दी। आंदोलन सफल रहा । चंपारन से गांधी महात्मा बनकर लौटे। चंपारन की पहचान सत्याग्रह की ज़मीन के रूप में बन गयी। तब से चंपारन को सत्याग्रह वाला चंपारन कहने सुनने की आदत लग गयी  थी।"

आज १०० साल बाद कितना कुछ बदल गया। सत्याग्रही किसान आंदोलन से लेकर आज के दमघोंटू किसान आंदोलन । और सत्याग्रह तथा अहिंसा की पहचान वाला राजकुमार शुक्ल तथा महात्मा गांधी का चंपारन अब "चंपारन मीट हाउस" वाला चंपारन!