Tuesday, 24 March 2026

बधाई जीते जी इलाहाबाद!


 




हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही है। यहाँ परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष नहीं, अपितु समीक्षा का विधान रहा है। शास्त्रार्थ के बिंदु विचारधारा नहीं विचार रहे हैं। मतभेद होते रहे हैं, किंतु मनभेद किंचित नहीं। दर्शनों की धारा में विचार आस्तिक और नास्तिक होते रहे लेकिन भारतीय जनमानस ने सभी विचारकों को ऋषि और ऋषि-तुल्य-सा ही सम्मान दिया चाहे वे गौतम हों, कणाद हों, कपिल हों, पतंजलि हो, जैमिनि हों, बादरायण हों, बुद्ध हों, महावीर हों या फिर चार्वाक हों! यहाँ के चिंतन और अनुशीलन में दर्शन की सम्यक्, संयोजक और उद्दीपक धार बही है। वह किसी पंथ या वाद की भँजक और तोड़क विचारधारा नहीं रही। इस परंपरा को रेखांकित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता आज के दिनों में महसूस हो रही है, जब बौद्धिक विमर्श वाले विषयों पर भी विचारधारा के नाम पर भावनाओं की शमशीर चमकने लगी है।

बात हम हाल के उद्घोषित साहित्य अकादमी पुरस्कार और उस पर मची चीं-चीं-पों-पों पर कर रहे हैं। सोशल मीडिया का विज्ञानदीप्त पटल तथाकथित विवेचनात्मक व्याख्यानों और सारगर्भित टिप्पणियों से पट गया है। पुरस्कार का मूल्याँकन विचार के वितान को त्यागकर विचारधारा की कीचड़ में रेंगने लगा है। पूरी तरह से संकीर्ण राजनीतिक रँग में रँगी दो कट्टरपंथी विचारधाराओं की धमक से देश का वातावरण आक्रांत है। एक ओर, सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचार का अरुण केतन थामे दक्षिणपंथी विचारधारा, अभी केंद्र की सरकार सहित अनेक राज्यों में इसी विचार से प्रभावित सियासी धारा बह रही है। दूसरी ओर तथाकथित सेक्युलर झंडे के नीचे बहती समाजवादी वामपंथी या फिर तथाकथित केंद्राभिगामी विचारधारा। स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर क़रीब साठ-सत्तर सालों तक देश की सियासत पर इसी पंथ का राज चला है। आज विपक्ष बनकर इसी धार पर यह पंथ अपनी नाव खे रहा रहा है। 

दक्षिणपंथी इस पुरस्कार की आलोचना इस आधार पर कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने इस पुरस्कार के मार्फ़त देश के साहित्य को वामपंथियों के हाथों गिरवी रख दिया है। उनकी दृष्टि में न केवल एक वामी महिला लेखक को यह पुरस्कार परोस दिया गया है बल्कि पुरस्कार निर्धारण करने वाली निर्णायक समिति अर्थात जुरी पर भी सरकार ने वामपंथी साहित्यकारों का क़ब्ज़ा करवा दिया है। वामपंथी चुप्पी साधे हुए हैं। सबसे मज़े की बात और उससे भी बढ़कर विडंबना तो यह है कि ये वामपंथी इस सरकार को अछूत मानने से नहीं चूकते। अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुजरा है, जब इन्हीं वामपंथियों ने इस सरकार के विरोध में अपने साहित्यिक पुरस्कार और अलंकरण वापस कर दिए थे। इस पुरस्कार-वापसी आंदोलन के तमाशबीनों के लिए आज यह संतोष और थोड़ा मनोरंजन का भी विषय है कि अब ये वामपंथी अपने विचारों की उछृंखलता को छोड़ सरकार के साहित्य अकादमी में न केवल जुरी की सदस्यता को स्वीकार रहे हैं, प्रत्युत अकादमी के पुरस्कारों को बड़े गर्व से स्वीकार भी कर रहे हैं। उधर इस बिंदु पर सरकार की भी तारीफ़ करनी होगी कि इसने बड़ी गरिमा से अपने विरोधी तेवर को पुरस्कृत किए जाने के निर्णय का अनुमोदन कर सच्चे अर्थों में न केवल अपने सनातनी संस्कार के संरक्षक होने की उद्घोषणा को पुष्ट किया है बल्कि भारत की इस सनातन परंपरा को गौरवान्वित भी किया है कि हम अपने विरोधियों के विचार को भी आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।

 आज भारत की न्यायपालिका को भारत की कार्यपालिका के इस आचरण से सबक़ लेने की घड़ी भी है। पिछले दिनों पाठ्यक्रम में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शामिल किए जाने के मामले में अपनी तथ्यपूर्ण आलोचना से बिफ़री न्यायपालिका को आज अपनी कार्यपालिका के इस व्यवहार को देखना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्कार से परिपूर्ण सरकार के इस सभ्य आचरण के आलोक में अपने न्याय दर्शन का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निर्धारण करना चाहिए। भारत सरकार का यह अकादमिक व्यवहार न केवल लोकतांत्रिक और सुसंस्कृत, प्रत्युत वैज्ञानिक भी रहा है। विज्ञान में दो असमान ध्रुवों में भी आकर्षण होता है।

   
वाद और पंथ की इस राजनीति ने साहित्य का सबसे बड़ा अहित किया है। दक्षिणपंथियों को वामपंथियों का छद्म सेकूलरिज़म रास नहीं आता, तो वाम पंथियों को दक्षिणपंथियों की राष्ट्रीयता फूटी आँखों नहीं सुहाती।  जीते जी इलाहाबाद के दिनों में ‘जब किसी की घनघोर निंदा करनी होती तो उसे सी आई ए का एजेंट घोषित कर देते’।  आज उसे ‘भक्त’ या ‘सिकुलर’ घोषित कर देते हैं। इधर वैश्विक पटल पर भी राष्ट्रीय भावनाएँ उबाल पर हैं। वजहों की पड़ताल किए बग़ैर यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि विचारधारा का यह मतभेद मनभेद में बदलता जा रहा है। साहित्य का इस प्रवृति की जद में आना नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है। साहित्य समाज को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। वहाँ प्राथमिकता विचारों की होनी चाहिए, विचारधारा की नहीं। आलोचनाओं की आवाज़ में जोड़ने का जोग होना चाहिए तोड़ने का दंभ नहीं। समीक्षाओं में सामंजस्य का सुर होना चाहिए, संघर्ष की गर्जना नहीं।

१९५९ का साहित्य अकादमी पुरस्कार राष्ट्रीय भावनाओं की ओज से ऊर्जस्वित राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर को उनकी गंभीर शोध और चिंतन से परिपूर्ण गद्य कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को दी गयी थी। प्रखर राष्ट्रवादी दिनकर ने तब के वामपंथी रुझान वाले अपने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की समय पड़ने पर आलोचनाओं में अपने शब्द तुणिर के घातक बाण छोड़ने में कोई परहेज़ नहीं किया था। जुमले में कहते हैं कि एक बार संसद की सीढ़ियों पर चढ़ते समय लड़खड़ाते नेहरू को बलिष्ठ दिनकर ने गिरने से बचा लिया। नेहरू  के धन्यवाद ज्ञापन पर दिनकर ने चुटकी ली थी, ‘जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे सँभाल लेता है।‘ बताते चलें कि दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका नेहरू ने लिखी। अभी हाल में एक पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘समय के प्रश्न’। इसके लेखक हैं समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर और इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है दक्षिणपंथी चिंतक राम बहादुर राय ने। भारतीय परंपरा में आज के ये संतोषजनक बिंदु हैं। 

बताते चलें कि बंगाल रॉयल सोसायटी ने एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक न्यास के गठन का प्रस्ताव दिया जिसमें देश के साहित्य, दृश्य कला और नृत्य, नाटक एवं संगीत को प्रोत्साहित एवं सँवर्धित करने के लिए यथोचित निकायों की स्थापना की बात कही गयी। इस प्रस्ताव को १९४४ में सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर दी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत इसी प्रस्ताव के आलोक में साहित्य अकादमी, ललितकला अकादमी और संगीत एवं नाटक अकादमी की स्थापना हुई। साहित्य अकादमी के गठन का प्रस्ताव १५ दिसंबर १९५२ को हुआ। इसकी औपचारिक शुरुआत १२ मार्च १९५४ को तत्कालीन उपराष्ट्रपति प्रख्यात दार्शनिक राधाकृष्णन द्वारा इसके विधिवत उद्घाटन के साथ हुई। राधाकृष्णन इसके पहले उपाध्यक्ष बने और प्रधानमंत्री नेहरू पहले अध्यक्ष। श्री कृष्ण कृपलानी इसके पहले सचिव थे। हिंदी भाषा के लिए पहला पुरस्कार १९५५ में माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी काव्य कृति ‘हिम तरंगिणी’ के लिए मिला। तब से अबतक हिंदी भाषा में क़रीब पच्चीस उपन्यासकारों, छब्बीस काव्य-रचनाकारों सहित दर्शन, इतिहास, संस्कृति, विवेचना और आलोचना के क़रीब सात  रचनाकारों को उनकी बेहद गंभीर कृतियों के लिए अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। इसमें वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, दिनकर, डॉक्टर नागेन्द्र, नामवर सिंह और हजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखे विद्वान हैं। अकादमी पुरस्कारों का अधिकांश अत्यंत प्रतिष्ठित और निर्विवाद साहित्यकारों को गया है। हालाँकि जयशंकर प्रसाद, मुक्तिबोध, नागार्जुन, विद्यानिवास मिश्र, फणीश्वर नाथ रेणु जैसे अनेक कालजयी साहित्यकारों की झोली में यह पुरस्कार नहीं जा पाया। प्रश्न पुरस्कारों का नहीं है। पुरस्कार नहीं मिलने से ‘कामायनी’ छोटी रचना नहीं हो जाती और ना ही पुरस्कार मिल जाने से ‘रेत समाधि’ साहित्य में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का उत्कर्ष बिंदु बन जाता!

२०२५ का साहित्य अकादमी पुरस्कार वरिष्ठ हिंदी लेखिका ममता कालिया जी को दिए जाने की घोषणा हुई है। उनको यह पुरस्कार उनकी गद्य कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ पर दिया गया है। यह एक संस्मरण रचना है। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर संवेदना से पगी बड़ी सार्थक बातें लिखी हैं – ‘शहर- पुड़िया में बाँधकर नहीं ला सकते साथ; तो क्या!’ लेकिन ममता जी ने बड़ी  शिद्दत से अपनी स्मृति के कोर में सँजोए अपने इलाहाबाद के दिनों को अपनी मोहक किस्सागोई कला में पाठकों के सामने इस पुस्तक में परोस दिया है। यह सही है कि ‘युवावस्था में आदमी प्रेम करता है, प्रेम लिखता नहीं’ लेकिन अपनी युवावस्था में इन पंक्तियों:-
‘प्यार शब्द घिसते-घिसते चपटा हो गया है
अब हमारी समझ में 
सहवास आता है’ 

की धमक के साथ अपने साहित्यिक सफ़र का आग़ाज़ करने वाली लेखिका लगता है अपनी यात्रा के वानप्रस्थ में अब अपना प्रेम लिखने लगी है। जो भी हो, लेखिका ने बड़ी सजीवता से कथात्मक शैली में अपनी यादों को जिस सजीवता से सहेजा है, उससे समकालीन साहित्य की दुनिया बाहर झाँकती दिखती है। इसलिए २०२१ में लिखी गयी यह पुस्तक यह वरन एक संस्मरण मात्र न होकर समयुगीन साहित्यिक दस्तावेज़ भी है। तब के इलाहाबाद की धरती पर साहित्य की धारा का संवेग  कितना प्रबल था, उसकी आहटें इस पुस्तक के शब्द-शब्द में सुनायी देती हैं। तब ‘संवाद के बजाय विवाद और विमर्श के बजाय अमर्श से काम चलाने का संस्कार अभी नहीं आया था’। साहित्य संवाद की भाषा थी। ममताजी बताती हैं कि ‘भैरव जी ने अश्क़ जी पर एक पूरा उपन्यास लिख डाला - ‘अंतिम अध्याय’। वर्षों बाद अश्क़ जी ने अपनी पुस्तक ‘चेहरे अनेक’ में उनको जवाब दिया।‘ एक अन्य प्रकरण का उल्लेख करते लेखिका सुनाती हैं कि विजयदेव नारायण शाही ने पंत जी को कह दिया कि ‘न, मैंने लोकायतन पढ़ी है, न पढ़ूँगा।‘ पंतजी  ने नम्रता से जवाब दिया, ‘आप न पढ़ें, आनेवाली पीढ़ियाँ मुझे पढ़ेंगी।‘ ममता कालिया ने इलाहाबाद के साहित्यिक मिज़ाज की अल्हड़ता और उसकी उर्वरा धरा में बहती हिंदी कहानियों के विकास की धारा का अत्यंत रोचक बतकही शैली में बयान किया है। हालाँकि उनके द्वारा अपनी किताब में वर्णित मार्कण्डेय काटजू से संबंधित एक साहित्यिक समारोह में उपजे विवाद पर कुछ समकालीन और स्वयं को इस समारोह का दर्शक घोषित करने वाले लेखकों ने कटु आलोचना करते हुए इसे झूठ का पुलिंदा बतलाया है। कुछ आलोचकों ने इस बात पर भी ममताजी को कोसा है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में कुछ ऐसे व्यक्तित्वों पर कीचड़ उछाला है जो अपनी सफ़ाई देने के लिए अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस आलोचना में दक्षिणपंथी भारतीय संस्कार बनाम वामपंथी बड़बोलेपन की कुरूपता का संघर्ष दिखायी देता है।

 इस पुस्तक में आपको कोई विषय गांभीर्य, किसी चिंतन की गुढ़ता, कोई साहित्यिक दर्शन या कोई रस मीमांसा भले खुलता न दिखे लेकिन यह पाठकों को दादी माँ की कहानियों की तरह बाँधता ज़रूर है। स्वाभाविक है, कि दादी माँ की कहानियों की तरह यहाँ भी आपको अतिशयोक्ति,  छद्म दंभ, मन लुभावन लोरी और बतरस का बतासा जगह- जगह मिलेगा। लेखिका ने चूँकि  अपनी नज़रों से इलाहाबाद को देखा है, इसलिए समूचे कथ्य में आत्मनिष्ठता का भाव है।  एक जगह लेखिका का साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह/दुराग्रह ईमानदारी से चाहे/अनचाहे टपकता-सा दिखायी देता है। मुस्लिम बहुल मुहल्ले में तनाव के वक़्त एक मुस्लिम दंगाई द्वारा बिजली/फ़ोन की लाइन काटे जाने का दृश्य लेखिका को अंदर से दहला देता है और सुरक्षित मुहल्ले में उनके जाने के क्रम में उनके अंदर का भय एक दुस्वप्न की भाँति पाठकों को स्पष्ट दिखायी देता है : - ‘रानी मंडी ऐसा अल्पसंख्यक मुहल्ला था जो अमन चैन में तो घोंसले की तरह सुरक्षित था लेकिन हिंसा का एक भी वाक़या होने पर सुलग उठाता था। मैं खिड़की………..    ……काट दिए। अपने ही घर से………………।‘

रही बात मंगलवार और बुधवार को नान-वेज खाने वाले प्रकरण की तो इस पर उठने वाले सवालों या आलोचनाओं में कोई दम नहीं है। यह आज के भारतीय जीवन का सच है जिसे कोई भी ईमानदार आदमी झुठला नहीं सकता चाहे वह दाम हो या वाम! न ही यह प्रकरण किसी की आस्था पर कोई प्रहार करता है। इसलिये हमें इस पुरस्कार के जुरी सदस्यों – आदरणीय अरुण कमल जी, अनामिका और अरविंदाक्षन के विवेक का सम्मान करते हुए ‘आलोचना में कटखनापन से परहेज़ करना चाहिए’। किसी पंथ के चश्मे को पहनकर इस पुस्तक को मिले ‘पुरस्कार की अहमियत को नकारना बौड़मपना ही होगा’। यह भी कहना असंगत और तर्कहीन  होगा कि ‘कभी-कभी पुरस्कारों की घोषणा किताबों की गोदाम को दीमक-चूहों से बचा लेती है’। इसलिए ‘भले ही रूचियाँ आपस में रगड़ खाएँ, मगर सब एक दूसरे को पढ़ें और संवाद गतिशील रहे।‘
ममता कालिया को “ ‘जीते जी’ इलाहाबाद” की बधाई!!!          

Friday, 27 February 2026

सरपंच सच


अश्वत्थामा शापित है जीने को। इस भारतखण्ड में। सपनों में। टुकड़ों-टुकड़ों में।एक के बाद एक चित्र सरकता है। 

……..राजा गुरुकुल आए हैं। राजमुकुट मुख्य द्वार पर उतारकर रख दिया है। उपानह भी उतर गए हैं।अँगरक्षक वहीं रुक गए हैं।कुटीर में गुरु अपने ऊँचे आसान पर विराज रहे हैं। सामने फर्श पर राजा साष्टाँग मुद्रा में हाथ जोड़े।………

काल क्वांटम की कला में गतिमान है।प्रकाश से भी तेज।अगला दृश्य -

…….मास्टर को सरपंच साहेब हड़का रहे हैं, अवमानना के आरोप में! गलती से मास्टर ने सही लिख दिया है। सरपंच बैठा है ऊँचे इजलास पर। मास्टर नीचे  थरथर काँप रहा है। डर के मारे खड़ा। ……

अश्वत्थामा बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।

राजा  जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते। कौन सच । वह सच। या यह सच! 

जनक को ढकेलकर अश्वत्थामा महर्षि के चरण पकड़ लेता  है। हाँ, महर्षि कौन सच? मास्टर या सरपंच!

अष्टावक्र का आर्ष अट्टहास  गूँजता है - दोनों सच। वत्स, दोनों सच। पहले मास्टर सच। और अब सरपंच सच !

Friday, 20 February 2026

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ।

 चले गए दिन गार्गी के वे,

और मिथिला की राजसभा!

वाचाकनवी ने शिथिल किया,

जब याज्ञवल्क्य की ज्ञान प्रभा।


समय एक सा नहीं है रहता,

कुदरत की है कहर ये भारी।

हाय बिहारी, हाय बिहारी,

तेरी तो गई किस्मत मारी!


हाय, फिसड्डी नौकरशाही,

और सड़क छाप का मंतरी!

अपराधी की गोद में बैठा

नाका -  नाका आला संतरी!


मिनट भर बस लेट हुई थी,

परीक्षा केंद्र की खबर है ताजा।

चढ़ गई बेटी सूली पर

अंधेर नगरी चौपट राजा।


नक्कारखाने में सब मिलकर

आओ, आओ तूती बजाओ।

राजमहल के राज दरिंदो!

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ।






Tuesday, 27 January 2026

नई सरकार, वही सम्राट

 जम्हूरी, जलालत ललाट,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

जो नैतिकता को काट- काट,

और मर्यादा छांट- छांट।


इज्जत आबरू चाट- चाट,

नराधमों में बांट- बांट।

हिंजड़े हाकिम को साट- साट,

इंसाफ की लगी हाट।


हक हुकूक की बंदरबांट

साबूत न कोई बचा पाट।

मानवता की खड़ी खाट

हैवानियत के ठाट- बाट।


बेटी का बाप हांफ- हांफ

बदहवास, घर घाट- घाट।

बेटी बचाओ, बेटी बचाओ,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

--- विश्वमोहन

#बिहारनिर्भया

Wednesday, 29 October 2025

जाति का सच : रोज़ी-रोटी-बेटी या राजनीति!


लोकतंत्र की जन्मस्थली बिहार में अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गयी है। अब यह जातितंत्र में बदल गया है। यह जाति का, जाति के लिए और जाति के द्वारा तंत्र बन गया है। जाति ने भी अपना स्वरुप बदल लिया है। पहले जाति का संबंध रोज़ी, रोटी और बेटी से था। मतलब जाति की पहचान पहले रोज़ी से थी। जाति का आर्थिक कलेवर उस जाति का अपना रोज़गार था। सच पूछें तो जाति की अवधारणा के पीछे का सच उस जाति का पारंपरिक रोज़गार ही था। औद्योगिक क्रांति से लेकर सूचना क्रांति तक आते-आते रोज़गार का जातिगत बंधन लुप्तप्राय हो गया और इस मोबाइल युग में तो रोज़गार और व्यवसाय भी जाति के बंधन से मुक्त होकर पूरी तरह मोबाइल हो गए। कहने का तात्पर्य यह है कि अब किसी भी जाति का व्यक्ति कोई भी रोज़गार कर लेता है और अब जाति अपनी परंपरागत रोज़ी की पहचान किंचित नहीं रही। किसी भी व्यवसाय की आज कोई जाति नहीं है। अगर जाति है तो सिर्फ़ एक व्यवसायी की, और वह है – राजनीतिक नेता!

पहले लोग अपनी जाति की ही रोटी स्वीकार करते थे। अगर कोई अजनबी किसी गाँव में जाता था तो वह अपनी जाति का ही घर खोजता था, जहाँ की वह रोटी खा सके। लोग खाना देने और लेने के पहले जाति की सूचना अवश्य ले लेते थे। आज यह भेद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। किसी भी होटल, ढाबे, रेस्टौरेंट, भोज, पार्टी या किसी भी खाने पीने के आयोजन में जाति की कोई भनक भी नहीं मिलती। कुल मिलाकर रोटी ने भी जाति से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया है। रोटी की जुगाड़ में अब जाति हाशिए पर चली गयी है।

अब रही बात बेटी की तो पहले बेटी भी अपनी जाति में ही ब्याही जाती थी। सच कहें तो जाति का सबसे प्रबल आग्रह यदि किसी सामाजिक संस्था में था तो वह विवाह की संस्था ही थी। इस मामले में समाज अत्यंत रूढ़ था। ऐसा नहीं है कि यह रूढ़िवादिता अब समूल नष्ट हो गयी है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस साइबर और सूचना क्रांति के प्रहार ने इस रूढ़िवादिता की चूलें हिला दी हैं। और, इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित कोई प्रदेश हाल के समय में रहा है तो वह बिहार है। एक प्रमुख कारण इसका बिहार के सबसे बड़े सक्रिय अंश का बिहार से बाहर पलायन कर जाना, चाहे वह मेहनतकश मज़दूर हों, अच्छी शिक्षा की तलाश में बिहार छोड़ गए प्रतिभाशाली छात्रों की जमात हो या अच्छी नौकरी की तलाश में योग्य बिहारी नवयुवक और नवयुवतियाँ! हर क्षेत्र का बिहारी ‘क्रीमी लेयर’ बिहार छोड़कर बाहर चला गया और उसने बिहारी समाज की रूढ़िवादिता का परित्याग कर आधुनिक मूल्यों को अपना लिया। इसकी सबसे बड़ी मार बिहारी समाज में विवाह-सम्बन्धों की जातिगत रूढ़िवादिता और दहेज की कुप्रथा पर पड़ी। बहुत अधिक मात्रा में दहेजमुक्त और अंतर्जातीय विवाह बिहारी नवयुवकों और नवयुवतियों ने की और जाति बेचारी हाथ मलती रह गयी। यह प्रक्रिया अभी जारी है और इसकी गति के और अधिक त्वरित होने की संभावना भी अत्यंत बलवती है। 

अब तेज़ी से बदलते युग में जाति ने इन तीनों से क़रीब-क़रीब अपना नाता तोड़ लिया है। रोज़ी और रोटी अब जाति के बंधन से मुक्त हो गयी हैं। वैवाहिक संबंधों में भी अंतर्जातीयता अपनी जड़ें जमाती चली जा रही है। जाति के स्वरुप के इस सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के पीछे बिहार के पिछड़ेपन और उससे प्रसूत विस्थापन की बड़ी अहम भूमिका है। बिहारी समाज का एक बड़ा अंश अब बिहार छोड़कर बाहर आ गया है। अपनी आजीविका और शिक्षा के संघर्ष में इस तबके ने अपने जातिगत पूर्वाग्रहों की लगभग तिलांजलि दे दी है।

रोज़ी, रोटी और बेटी को छोड़ती जाति अब मात्र राजनीतिक पाखंड बनकर रह गयी है। इस तथ्य को यदि किसी ने बड़ी शिद्दत से महसूस किया है तो रोज़ी-रोटी और पढ़ाई-लिखाई के अवसरों की तलाश में बिहार से पलायन कर गयी वह एक बड़ी बिहारी जनसंख्या है। इस तलाश में दर-दर भटकती बिहारी जनता ने अब अपनी अस्मिता भी तलाश ली है। राष्ट्र्कवि दिनकर की इस संतति ने अब भलीभाँति इन पंक्तियों के मर्म को आत्मसात कर लिया है कि :

“जाति जाति रटते जिनकी पूँजी केवल पाखंड

मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड।“

ठीक इसके उलट, बिहार में पीछे छूट गए लोगों के बीच के लम्पट, अपराधी, अशिक्षित और भ्रष्ट असामाजिक तत्वों ने अपना आशियाना राजनीति में ढूँढ लिया है। आप बिहार के राजनीतिक भू मंडल पर तनिक एक बार अपनी दृष्टि फेर कर देख लें। आपको आज की बिहारी राजनीतिक जमात के अधिकांश में शायद ही उस प्रजाति का कोई अंश भी नज़र आए जिसका प्रतिनिधित्व बाबू कुँवर सिंह, राजकुमार शुक्ल, खुदीराम बोस, शहजानंद सरस्वती, सच्चिदानंद सिन्हा, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, श्री कृष्ण सिंह या ऐसे और अनेक नाम जो यहाँ छूट रहे हैं, करते थे। राजनीतिक नेताओं का अधिकांश आज काले धन कमाए बिचौलिए, दलाल, भू-माफ़िया, ठेकेदार, अपराधी और भ्रष्टाचार में आकंठ निमग्न सरीखों से ही भरा हुआ है। इनकी न कोई सांस्कारिक  पृष्ठभूमि, न कोई समाज सेवा की तपोभूमि, न कोई वैचारिक दृष्टि और न ही कोई राजनीतिक सोच। राजनीतिक वातावरण इतना विषाक्त हो गया है कि कोई भी शरीफ़, शिक्षित, अमन-चैन पसंद और गंभीर व्यक्ति राजनीति में  जाने की सोच नहीं सकता। जाहिल, अनपढ़, असभ्य और  कुसंस्कृत भ्रष्टाचारियों की यह क़ौम ही अब धीरे-धीरे बिहार की राजनीति की पहचान बनती जा रही है। स्वस्थ सोच और वैचारिक दृष्टिकोण के नितांत अभाव वाले ऐसे सड़क छाप नेताओं को अपनी भीड़ बनाने और बढ़ाने का अब एक ही ठौर है – जाति! जाति के नाम पर जनता को गोलबंद कर अब ये अपनी दुकान चला रहे हैं। दुर्भाग्यवश, इनको पनाह देनेवाले राजनीतिक दल भी कुसंस्कार के कीचक में आकंठ डूब चुके हैं। जाति तंत्र के पोषक और पथ प्रदर्शक यहीं राजनीतिक दल बन गए हैं। इस अवसर पर ज़रा जानकी वल्लभ शास्त्रीजी की बातों को याद कर लें :

“कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है,

लज्जा लजाती जिसकी कृति से धृति उपदेशक वह है”

समाज को जाति में बाँटकर ये राजनीतिक दल अपनी जीत का समीकरण तय करते हैं। जाति के नेता उस जमात के अपराधी, भ्रष्ट धन-कुबेर और बाहुबली होते हैं। छल-बल और पैसे के जोड़ पर जाति को गोलबंद किया जाता है। दूसरी जातियों का भय दिखाकर भी जातीय एकता को पुष्ट किया जाता है। जाति के नाम पर समाज को बाँटने वाले इन सड़क छाप नेताओं का जाति का सारा वितंडा चुनाव और राजनीति तक ही सीमित है। आज के इस ज़माने में जहाँ भाई को भाई नहीं पूछ रहा है और बेटे की अवहेलना से दंशित बाप वृद्धाश्रम की ख़ाक छानने पर विवश हो रहा है, वहाँ भला जाति के नाम पर कोई किस सदाव्रत की उम्मीद कर सकता है? जनता अपनी ग़रीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और मजबूरी के चलते जाति की कड़ाह में तले जाने को अभिशप्त है। इस जातिगत दुर्भाव से जहाँ एक ओर समाज में वैमनस्य, ईर्ष्या, अस्वस्थ स्पर्धा और फूट के कारण सामाजिक समरसता समाप्त होती जा रही है, वहीं प्रतिभाएँ भी दम तोड़ रही हैं। कई प्रतिभाशाली युवक जातीय नेताओं के चक्कर में बर्बाद हो रहे हैं। जातिगत दुराग्रहों की दुर्नीति में प्रतिभा छटपटा रही है। हालाँकि इन तमाम विसंगतियों में यह भी स्पष्ट है कि अपने पुत्र/पुत्री की अच्छी शिक्षा या अपने परिवार के स्वास्थ्य के मामले में राज्य के बुरी तरह असफल हो जाने के कारण मजबूर जनता सेवा की गुणवत्ता की तलाश में अपना सब कुछ खोने को विवश है। जाति के नाम पर चुने गये अशिक्षित जाहिल मुखिया द्वारा गाँव के विद्यालय की निगरानी करने और लम्पट विधायक के राज्य की स्वास्थ्य सेवा का प्रभारी मंत्री बनाने के दृष्टांत भी सामने आ रहे हैं। जाति तंत्र लूट तंत्र में परिणत होता जा रहा है।

चुनाव क्षेत्रों का विश्लेषण वहाँ की आम समस्या के आधार पर नहीं बल्कि जातीय समीकरण के आधार पर किया जा रहा है। चुनाव में उम्मीदवारों का चयन भी उनकी योग्यता और क्षेत्र की समस्यायों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर कम और उनकी जाति के आधार पर ज़्यादा किया जा रहा है। क्षेत्र की बदहाली और उससे जूझने वाले जूझारू नेताओं की तलाश में अब किसी राजनीतिक दल की कोई रुचि शेष नहीं रही है। सता के मुकुट को पहनना ही अब राजनीतिक दलों का मुख्य ध्येय है। दिनकर की पंक्तियाँ इन नेताओं का सही चरित्र चित्रण है:-

“ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले,

शर्माते है नहीं जगत में जाति पूछने वाले।“

आजतक जाति की किसी दुकान पर बिहार में यह देखने को नहीं मिला कि कोई जातीय संगठन अपने ग़रीब प्रतिभाशाली बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए अपना कोई संस्थागत सहयोग कार्यक्रम चला रहा हो, अपनी जाति के ग़रीब-बुरवा के इलाज में कोई सहयोग राशि बाँट रहा हो, अपनी जाति की ग़रीब बेटियों के विवाह में अपना कोई योगदान दे रहा हो, या जाति के नाम पर दहेज छोड़वा दिया हो। उलटे इन दहेज लोलुपों पर नयी पीढ़ी ने अंतर्जातीय विवाह का ज़ोरदार तमाचा अवश्य जड़ा है।

अगर बिहार की जनता अब भी नहीं चेती तो वह अपनी मूर्खता और चेतना शून्यता का भारी मूल्य चुकाने को मजबूर होगी। अब तो आशा नयी पीढ़ी से ही है। पुरानी पीढ़ी बुरी तरह लकवा ग्रस्त हो गयी है और उससे कुछ भी आशा करना पत्थर से सिर फोड़ना है। पिछली शताब्दी का अंतिम दशक बिहार के इतिहास का काला पन्ना रहा है। राज्य की अधिकांश जनता को अपने राज्य की विसंगतियों का आखेट बनकर राज्य छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। अप्रवासी बने इन बिहारियों को भारी बेइज़्ज़ती के माहौल में कठिन संघर्ष करना पड़ा। आज अपने मेहनत के बल पर इन्होंने अपनी और अपने राज्य की एक मेहनतकश जूझारू छवि बनायी है। इस संघर्ष में इन्होंने अपने आश्रय-स्थल समाज को भी न केवल समझा-बुझा है, बल्कि उसके सापेक्ष अपने राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भी आकलन किया है। इस आकलन ने इन्हें ‘क्या खोया और क्या पाना है’ की अंतर्दृष्टि दी है। 

इसलिए यह सही समय है जब राज्य की जनता अब जागे और जाति के नाम पर वोट माँगने वाले इन जाहिल नेताओं का राजनीतिक बहिष्कार करे और जाति से ऊपर उठकर सही और योग्य उमीदवारों को चुने। राज्य प्रदत्त व्यवस्था चाहे वह शिक्षा हो या स्वास्थ्य उसकी सबसे बड़ी उपभोक्ता राज्य की ग़रीब जनता ही है। इसलिए इस तबके के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है और उसका पुनीत दायित्व है कि चुनाव में जात को लात मारकर वह समाज की व्यवस्था बिगाड़ने वाले नेताओं को उनकी औक़ात ज़रूर दिखावे। ऐसे समय में समझदार राजनीतिक चेतना वाले राज्य के प्रबुद्ध जनों से भी एक नयी राजनीतिक संस्कृति की अपेक्षा है। वह न एक ओर, उम्मीदवारों के प्रचार में जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर माटी और मानुष के विकास की ज़रूरत को समझे, बल्कि जनता को भी शिक्षित और जागरूक करे, ताकि लोकतंत्र को जातितंत्र में बदलने से रोका जाय। विकास की इकाई व्यक्ति हो, न कि जाति। ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयास की ओर बिहार की माटी बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है और ऐसे किसी भी जननायक के लिए वह बहुत उज्जवल भविष्य संजोये हुए है।