Wednesday, 6 November 2019

खकिया-कलुआ भाई-भाई!

बाप रे!
सहनशीलता चरम सीमा पर है,
सभी सह रहे हैं, एक दूजे को।
सहिष्णुता में ही बदलता है रंग,
देख खरबूजा, खरबूजे को।
खाकी के कालेपन में ,
कल्लू भी खकिया गया है।
सहनशीलता के चक्कर मे
कानून भी सठिया गया है।
बीच चौक पर ,
कल्लू सीटी बजा रहा है।
और खाकी, सी सी टी वी का,
'एंगल' सजा रहा है।
कलुआ चालान काट रहा है।
खकिया गीता बाँट रहा है।।
'नारद' शनि बन गए हैं।
और शनि! सूरज बन ,
बाप-से तन गए हैं।
सुना है, जांच होगी।
न झूठ होगी, न साँच होगी।।
पंचों की पंचाट होगी।
न्याय की बंदरबाँट होगी।।
चैन के रैन-बसेरे होंगे।
सुलह के सबेरे होंगे।।
कुछ 'तेरे' कुछ 'मेरे' होंगे।
चोर-चोर मौसेरे होंगे।।
जनता की फिर होगी कुटाई,
खकिया-कलुआ भाई-भाई!
संस्कृति का ' शील'  हरण होगा।
सहिष्णुता की सभ्यता का वरण होगा।।
जब  से सभ्यता के इस नवोद्घोष में,
आबालवृद्ध सब  नव-सहिष्णु हुए हैं।
 विचारों के क्षीर सागर में हम,
जागे-से लगते विष्णु हुए हैं।

Saturday, 31 August 2019

मंदी

यकीन करें
आते ही 'तेजी'
जुट जाऊंगा
फिर से
समाज को
सिंचित करने
पूंजी से।
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अभी तो
वक़्त है
बहाने का
अविरल धारा
बुद्धि की।
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छा गयी है
जो ये 'मंदी'
बन गया हूँ मैं।
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फिर, 'समाजवादी'!
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Thursday, 18 July 2019

कालजयी कवि!!!

माना भूखे हो तुम!
गरीब हो!
फटेहाल हो!
बीमारी से जर्जर हो!
लील भी लेगी,
ये भूख!
ये गरीबी!
ये बीमारी!
सब मिल के तुमको।

किन्तु!
आखिर लिखूंगा,
तो
मैं ही!
दिल  दहलानेवाली,
धाकड़ करुण- कविता!
तुम्हारी भूख पर!
तुम्हारी गरीबी पर!
तुम्हारी बीमारी पर!

पृष्ठभूमि में होगी!
तुम्हारी मौत की
मर्मान्तक तस्वीर!
मुखपृष्ठ पर और साथ में ,
माल्यार्पण करते
गिद्ध, चील।
और भाषण की
भौंक-से भोंकते
कुत्ते।

पाऊंगा ज्ञानपीठ!
चढ़कर तुम्हारी ही पीठ।
छिछियाते-छौने,
छिछोरे तुम्हारे,
पढ़ेंगे यह कविता।
अपनी पाठ्यपुस्तक में,
जहरीले 'मिड डे मिल' वाले
सरकारी प्राइमरी स्कूल की।
शिक्षा के अधिकार के तहत!

यूँ ही मरते रहोगे,
तुम गरीब, हर काल में!
लहलहाती रहेगी फसल,
कविता की हमारी!
और टंके रहेंगे
देदीप्यमान नक्षत्र-से!
साहित्य-सम्मेलन की छत में,
मुझ सरीखे, प्रगतिशील!
कालजयी कवि!

Thursday, 27 June 2019

कुटिल कौम! कैसी फितरत!!



धुकधुक सी धौंकनी धरणी की,
धधक-धधककर धिपती है।
हांफ-हांफकर हवा लहकती,
धरती की छाती लीपती है।

प्राण-वायु निष्प्राण जान-सी,
मारे- मारे फिरती है।
वसुधा के वल्कल-वक्ष पर,
किरण आग-सी गिरती है।

पेड़ों की सूखी टहनी का,
डाल-डाल मुरझाता है।
और फुनगी का पात-पात,
मरघट मातम सुर गाता है।

कंधे पर जुआ बैलों के,
बिन जोते जल जाता है।
धंसा फाल लोहे का हल के,
खेतों में गल जाता है।

 लू की लकलक लपटों में,
काल तरंगे घूमती है।
श्मशान में शिशुओं को,
'चमकी' से चाट चट चूमती है।

पत्रकार के पाखंडो से,
आई सी यू सहम जाता है।
मृगछौनों के मौत का मातम,
नहीं रहम कोई खाता है।

सियासत की सड़ी सड़कों पर,
गिद्ध-चील मंडराते है।
बच्चों की लाशों को ज़ुल्मी,
नोच-नोचकर खाते हैं।

जब-जब हबस हैवानियत की,
मुर्दों में मदमाती है।
रक्त राजनीति से रंजित,
माटी यह सरमाती है।

प्रदूषण है पग-पग पर,
प्रशासन हो या कुदरत!
गरीब-गुरबा ही मरते है,
कुटिल कौम!कैसी फितरत!!








Saturday, 27 April 2019

इन्साफ का इन्कलाब।

विचित्र विडंबना है भाई
' बेसिक - स्ट्रक्चर ' गड़बड़ाई।
फैल गई
अब बात
घर घर।
हुए 'केशवानंद भारती'
पसीने से
तर - ब - तर।

तुला न्याय की
डोल गई।
कलई अपनी
खोल गई।
"मुजरिम ही हो भला
मुंसिफ!"
कचहरी ही, ये पोल
खोल गई।

देवी न्याय की
दिग दिगंत,
पीट गई
' विशाखा ' ढोल।
खुद के
नक्कारखाने में,
भले
तूती सी बोल।

ई- टेंडर ने
कर दिया,
टेंडर फिक्सिंग
गोल।
'बेंच-फिक्सिंग'
रह गया
बिन तोल के
मोल।

मांग रही
अवाम अब,
इन्साफ का
हिसाब।
धो दें, जनाब,
अंदरुनी
आजादी का
खिजाब।

फरेब का
उतार दें,
हुज़ूर
ये हिजाब।
कीजिए
इन्साफ का,
बुलंद
इन्कलाब।