Tuesday, 5 May 2026

कलम पर पहरा!

 क्या कहा कवि?

कविता कह नहीं पा रहा!

अन्दर का खदबदाता इंकलाब

भीतर ही घुटता अटका ठहरा है।

कारण,

मुल्क का आम जन बहरा है।

हो गई पंगु, पन्नों पर लेखनी,

संशय का तम गहरा है।

साफ साफ कह न! सच बोल!

कि स्याही सूख रही,

क्योंकि

कलम पर पहरा है।

No comments:

Post a Comment