Sunday, 9 August 2026

पर्यटन निश्चिन्तता

 

हमने जो शब्दावली चुनी है, ‘पर्यटन निश्चिन्तता’ इसे अंग्रेज़ी में टुरिज़म श्योरिटी (tourism surety) कहते

हैं। यह इक्कीसवीं सदी का शब्द है। यह ‘टुरिज़म सेफ़्टी’ और ‘टुरिज़म सिक्यूरिटी’ को समाहित किए एक

विस्तृत अर्थवाली शब्दावली है। ‘सेफ़्टी’ शब्द का सम्बन्ध क्षति पहुँचाने वाली उन चुनौतियों से हिफ़ाज़त का

है जिनका कारण कोई भूल-चूक या ग़ैर-इरादतन हो। जैसे दुर्घटनावश होटल में आग लग जाय, मकान गिर

जाय, वाहन-दुर्घटना, प्राकृतिक-आपदाएँ आदि।

‘सिक्यूरिटी’ का अर्थ उन चुनौतियों से बचाव है जो पूर्णत: इरादतन पैदा की जाती है। जैसे चोरी-डकैती,

छीना-झपटी, आतंकवादी घटनाएँ, आन्तरिक अशान्ति, आपराधिक घटनाएँ आदि। इन शब्दावलियों के

आलोक में यदि हम पर्यटन-उद्योग के संकट की समीक्षा करें तो सम्भवतः हमारी दृष्टि ज़्यादा वैज्ञानिक और

विश्लेषण के स्तर पर ज़्यादा प्रखर हो। पहले हम पर्यटन की दशा और दिशा पर भी थोड़ी नज़र फेर लें।

पर्यटन का अर्थ अपनी जगह से किसी सार्थक उद्देश्य के साथ बाहर जाना है। यह एक सकारात्मक विस्थापन

है। इसकी सकारात्मकता की शक्ति का अन्दाज़ा आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि भारत में आर्यों को

बाहरी बताने वाले मुलर का ‘आर्य-अतिक्रमण-सिद्धान्त’ जब वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त निष्कर्षों की

कसौटी पर भहराने लगा तो इतिहासकारों ने इसे ‘आर्य-पर्यटन-सिद्धान्त’ कहना शुरू कर दिया। अब तो

बात यहाँ तक आ गयी कि आर्यों की मूल-भूमि भारत है जहाँ से पर्यटन के सिलसिले में वे दुनियों के बाक़ी

हिस्सों में छा गए। बात जो भी हो, इस पर्यटन के क्रम में पर्यटकों को कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा

इसका वृतान्त आदि काल से आधुनिक काल तक फैला हुआ है। चाहे मेगस्थनीज़ हो, ह्वेनसांग हों, अल

बरुनी हों, फाहयान हों, कोलम्बस हों, अमेरीगो हों, आदि शंकराचार्य हों, तुलसी हों, कबीर हों, राहुल

सांकृत्यायन हों, केदारनाथ के दर्शनार्थी हों, प्रयागराज के कुम्भ के स्नानार्थी हों या चिकित्सा-पर्यटन एवं

अध्ययन-पर्यटन पर निकलने वाले यात्री हों – सबकी यात्राएँ जोखिम से भरी रही हैं और उनकी चुनौतियाँ

समयुगीन विसंगतियों को उजागर करते रही हैं, भले ही उनकी प्रवृति और प्रकृति समान हो या अलग-

अलग। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता पूरी तरह से ये यात्राएँ महफ़ूज़ नहीं रहीं।

पर्यटन मानव जाति का एक सामाजिक और सांस्कृतिक उद्यम है। विकास के सोपान पर बढ़ते क़दम और

उत्तरोत्तर तकनीकी विकास ने इस सम्पूर्ण संसार को एक ‘वैश्विक-ग्राम’ अर्थात ग्लोबल-विलेज में तब्दील

कर दिया है। उन्नत संचार एवं यातायात साधनों से भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सांस्कृतिक दूरी भी अब

सिमट गयी है। इसलिए पर्यटन के उद्देश्य और इसके आयतन में भी दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ोतरी होती

जा रही है। अब घूमने-फिरने और देश-दुनिया देखने के अलावे लोग मेडिकल-टुरिज़म, व्यावसायिक-टुरिज़म

और एजुकेशन-टुरिज़म पर तक निकलने लगे हैं। यदि हम भारत की ही बात करें तो घरेलू पर्यटन के आकार

में आशातीत वृद्धि हुयी है। पड़ोसी देशों से अध्ययन के लिए छात्र और चिकित्सा के उद्देश्य से रोगियों की

संख्या बढ़ने लगी है जो भारत में अपने रहने के दौरान यहाँ के प्रमुख स्थलों चाहे वे ऐतिहासिक हों या

धार्मिक, के भ्रमण में रुचि दिखाने लगे हैं। घरेलू पर्यटन के साथ अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन में भी अपने देश के लोग

रुचि दिखाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक निश्चिन्त पर्यटन तभी कहा जाएगा जब अपने घर से निकला

पर्यटक अपनी सुरक्षित यात्रा कर पूरी तरह से महफ़ूज़ अपने घर लौट आए।

आज के समय में पर्यटक की सुरक्षा के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ मुँह बायें खड़ी हैं। पर्यटन-केंद्र वाले देश

की आन्तरिक-अशान्ति, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक-असन्तोष, उस पर बाहरी सैन्य-आक्रमण,

महामारी, प्राकृतिक आपदा जैसे अनेक कारक हैं जिससे आज का पर्यटक जूझ रहा है। किसी देश की

आन्तरिक-अशान्ति में वहाँ की क़ानून-व्यवस्था, भीड़ नियन्त्रण के समुचित प्रबन्धन का अभाव, हिंसक

आन्दोलन, स्थानीय स्तर पर चोरी, डकैती, छीना-झपटी, पर्यटकों पर हमला, यातायात की दुर्व्यवस्था,

पर्यटकों के ठहरने के असुरक्षित स्थान आदि शामिल है। प्रयाग राज में कुम्भ मेले में भगदड़ की घटना की

याद आगे के प्रबन्धकों के लिए आँख खोलने वाली घटना है। अभी हाल में ही मालवीय नगर के एक होटल में

लगी आग की भीषण दुर्घटना में दर्जनों विदेशी और देशी पर्यटक झुलस कर मर गए। नक्सलवाद के कारण


झारखण्ड, बिहार, छतीसगढ, मध्य-प्रदेश, आँध्रप्रदेश आदि राज्यों के पर्यटन उद्योग ने दम तोड़ दिया था।

यही हालत आतंकवाद को लेकर जम्मू-कश्मीर और खलिस्तान आन्दोलन के दौरान पंजाब की थी।

‘ऑपरेशन-सिन्दूर’ की पृष्ठभूमि में कश्मीर में पर्यटकों पर हुए आतंकवादी हमले सर्वदा चुनौती बने रहेंगे।

पर्यटकों की भी अपनी आर्थिक हैसियत के हिसाब से अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। निम्न-आय का पर्यटक अपने

कन्धे पर झोला टाँगे अपनी जेब के हिसाब से ही सुविधाओं का उपभोग करने को लाचार है। स्थानीय स्तर

की सुरक्षा सम्बन्धी कठिनाइयों का सबसे अधिक प्रहार उसे ही झेलना पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी के

समय पर्यटकों का फँस जाना अभी हम नहीं भूल पाए हैं। अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी

हमले ने तो अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन की रीढ़ ही तोड़ दी। पिछले दस बरसों में बाली, इज़रायल, केन्या, लॉस-

एंजल्स ,मेसिको, मोरक्को, पेरू, ईरान और सउदी अरब के देशों के पर्यटन केन्द्र को तबाह कर के रख दिया।

आतंकवाद के निशाने पर न केवल पर्यटक बल्कि पर्यटन केन्द्र की दुर्लभ दर्शनीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक

धरोहरें भी रहीं। तालिबान आतंकवादियों ने बामियान घाटी में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को तोड़

डाला था।

सुरक्षा की इन चुनौतियों को अलग-अलग उनकी प्रकृति के स्तर पर सक्षमता से निबटे जाने की आवश्यकता

है। इसके निदान का स्वरूप स्थानीय स्तर से लेकर, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों के

स्वरूप के आधार पर एकीकृत प्रयास एवं पारस्परिक सहयोग में निहित है। पारम्परिक मीडिया, समाचार-

तन्त्र एवं सोशल मीडिया से भी एक सकारात्मक भूमिका की अपेक्षा है। पर्यटकों के अन्दर सुरक्षा का

विश्वास-भाव ही पर्यटन उद्योग में जान डाल सकता है। निश्चिन्त पर्यटक, समृद्ध पर्यटन।

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