Saturday, 5 September 2026

‘शिक्षक दिवस’ या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’


आज शिक्षक दिवस के पुनीत  अवसर पर हमारे मन में हमारे दो राष्ट्रपति सजीव हो उठते हैं। एक तो राधाकृष्णन और दूसरे अब्दुल कलाम। पहले ने  अपनी  जन्मतिथि को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया, तो दूसरे ने अपने जीवन की अन्तिम साँस भी शिक्षक की भूमिका निबाहते हुए ही ली। ज्ञातव्य है कि एक कक्षा में पढ़ाते समय ही कलाम साहब का देहावसान हो गया था। पता नहीं भारत के भविष्य को ऐसे महिमामय महापुरुष और भारत के सत्ता शिखर को ऐसे सुखद संयोग फिर कभी नसीब हो या न हो! परन्तु यह  बात तो तय है जो जीवन के कुरुक्षेत्र में योग का अमृत बाँचते हुए आध्यात्मिक गुरु योगेश्वर श्री कृष्ण ने किंकर्त्तव्यविमुढ और आत्मिक उलझनों में उलझे अवसन्न अर्जुन को ये शाश्वत वचन सुनाए थे कि  ‘कर्म के बीज का नाश नहीं होता’। भारत की यह माटी ऐसे पुनीत ज्ञान-कर्मों, प्रवचनों और परम्पराओं के बीज से पटी है कि ज्ञानवाचक महान गुरुओं की यह महान श्रिंखला शायद ही कभी लुप्त हो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार  से प्रकाश में जाने की उत्कण्ठा  ही हमारे ज्ञान दर्शन का मूल रहा है।  ‘गु’ का अर्थ तमस अर्थात अज्ञान का अन्धकार  होता है। ‘रु’ का अर्थ निवारण करने वाला होता है। अत: गुरु का शाब्दिक अर्थ अन्धकार  से निजात दिलाने वाला होता है। अर्थात जो असत्य से सत्य की ओर ले जाए। ‘शिश’ धातु से व्युत्पन्न ‘शिष्य’ शब्द का अर्थ भी सीखना होता है। इसलिए हमारी ज्ञान परम्परा  में शिष्य ज्ञान का साधक होता है जिसके जीवन का लक्ष्य अज्ञानता के तिमिर का उच्छेदन  कर आत्मज्ञान और विवेक के आलोक से दीप्त होना है। 

वैदिक काल की गुरुकुल व्यवस्था एक स्वायत्त व्यवस्था होती थी जिसका सबकुछ कुलपति के अधीन होता था। इस पर राज्य का कोई नियन्त्रण नहीं होता था, बल्कि गुरु राजमहल के लिए विशेष श्रद्धा के पात्र होते थे। यह स्व-वित्तपोषी भी होता था। छात्र भिक्षाटन कर आश्रम की व्यवस्था चलाते थे। गाँव- समाज से भी लोग गुरुकुल को सहयोग देते थे। राज्य भी सहयोग कर दिया करता। किन्तु गुरुकुल पर बाहर का कोई प्रशासनिक नियन्त्रण नहीं रहता। यह पूर्ण रूप से आवासीय व्यवस्था थी जहाँ गुरु की छत्रछाया में बिना किसी भेदभाव के छात्र अपने अध्ययन में लीन होते थे। यहाँ जीवन की समस्त विधाओं का पाठ पढ़ाया जाता। गुरु अपने आसन पर बैठकर छात्रों को पाठ पढ़ाते और उनके समीप नीचे बैठे छात्र श्रुति परम्परा में उन पाठों को आत्मसात करते। इसे उपनिषद कहते हैं। गुरु शिष्य को साहचर्य भाव से देखते:

‘स: नौ अवतु, स: नौ भुनक्तु स: वीर्यं करवावहै।

तेजस्वी नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै’।

गुरु का स्थान भी अत्यन्त पूजनीय होता – ‘गुरुम सर्वदा पूज्यम श्रद्धया समन्वित:’। मान्यता है कि शिव आदि गुरु हैं। उनके सात शिष्य – अत्रि, भृगु, गौतम,  वशिष्ट, अंगिरा, मरिचि और पुल – सप्तर्षि नाम से जाने जाते हैं। इन सातों गुरुओं के आश्रम से नि:सृत  विचार पद्धति (school of thought) एक शाश्वत परम्परा के रूप में आगे बही। कालान्तर  में अन्य गुरुओं और गुरुकुल परम्पराओं का विकास होते रहा तथा समाज में ज्ञान की बहुमुखी धाराएँ प्रस्फुटित होती रहीं। प्रसिद्ध गुरु-शिष्यों की बात करें तो महर्षि धौम्य – आरूणी, आरूणी -सत्यकेतु, वशिष्ट/विश्वामित्र – राम, वाल्मीकि – लव कुश, सन्दीपनी -कृष्ण, परशुराम – कर्ण, द्रोण – अर्जुन, गौतम -जाबालि, वृहस्पति – देवता, शुक्राचार्य – दानव आदि प्रमुख रहे। बाद में आलार कलाम – गौतम बुद्ध, चाणक्य – चन्द्रगुप्त, आदि शंकराचार्य – ( पद्मपाद, मण्डन मिश्र, हस्तामलक, तोटक), रामानन्द  –( अनन्तानन्द, कबीर, सुखानन्द , धना, सेन, सुरसुरानन्द, पद्मावती, नरहरि, पीपा, भावानन्द, धरहरी, रैदास), बाबा नरहरि – तुलसीदास, मत्स्येन्द्रनाथ – गोरखनाथ, रामदास समर्थ – शिवाजी, तोतापुरी महाराज – रामकृष्ण परमहंस, रामकृष्ण परमहंस – स्वामी विवेकानन्द, स्वामी विरजानन्द  – स्वामी दयानन्द,  गुरु गोविंद सिंह – ( बन्दा सिंह बहादुर, दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकाम सिंह, हिम्मत सिंह, साहिब सिंह) जैसे गुरु -शिष्यों ने ज्ञान परम्परा की इस गरिमा को बनाए रखा।  योग, भक्ति, अध्यात्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, ज्योतिष, वेदांग, चिकित्साशास्त्र, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद, तन्त्र-साधना, रसायनशास्त्र, वैमानिकी, गणित, धातुशास्त्र, कृषि, वनस्पति, मौसम और नीतिशास्त्र जैसे ज्ञान का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं था जो इन महान गुरुओं की परिधि के परे हो।  जीवन का रहस्य, आत्म- अन्वेषण, परमात्म परिचय और मोक्ष की प्राप्ति समस्त ज्ञान के उद्देश्यों की परिणती थी। गुरुओं के द्वारा दिए इस ज्ञान दर्शन  से आलोकित शिष्य और समस्त समाज की दृष्टि में गुरु का स्थान सर्वोच्च था –

गुरुर्ब्रह्मा, गुरु: विष्णु, गुरु देव महेश्वर,

गुरुदेव साक्षात पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:।

गुरु नानक ने तो गुरु के स्थान को ईश्वर से भी ऊँचा बताया –

गुरु गोबिन्द दोउ खड़े, काकों लागे पाय,

बलिहारी गुरुदेव की गोबिन्द दियो बताय।

कबीर ने कहा –

गुरु कुम्हार शिष्य घट है, गढि गढि काढ़ै खोट,

अन्तर  हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।

अर्थात गुरु अपने शिष्य को वैसे ही गढ़ता है जैसे एक कुम्हार अपने मिट्टी के घड़े को। अन्दर से अपने हाथों का सहारा  देकर बाहर से हल्की  चोट देता है ताकि वह शिष्य रूपी घड़ा अपनी आकृति ग्रहण कर सके। इसलिए भारतीय परम्परा में सबसे बड़ा दाता गुरु को ही माना गया है –

‘गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान,

तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।

लोक मानस के महाकवि तुलसी तो गुरु की महिमा शिव और ब्रह्मा से भी ऊपर मानते हैं –

गुरु बिन भव निधि तरई न कोई,

जौ बिरंचि संकर सम होई।

यह परम्परा थी कि राजा या सम्राट जब कभी किसी गुरुकुल या विश्वविद्यालय में जाते तो प्रवेश द्वार पर ही  अपना राजमुकुट और अपने अंगरक्षक छोड़ जाते। गुरु के आश्रम  में प्रवेश करने पर गुरु अपने ऊँचे आसान पर बैठते और राजा नीचे ज़मीन पर। बौद्ध विहार भी शिक्षा के केन्द्र बने रहे। तक्षशिला, नालन्दा, ओदन्तपुरी, विक्रमशिला  जैसे शिक्षा संस्थान अपने विद्वान गुरुओं की गरिमा के साथ छात्रों के विद्या अर्जन के प्रमुख केन्द्र बने रहे। इनकी संरचना भी पारम्परिक गुरुकुलों की तर्ज़ पर ही कमोवेश क़ायम रही और विश्व के कोने-कोने से छात्र यहाँ अध्ययन हेतु आते रहे।

मुग़लों के आगमन के बाद से स्थिति में परिवर्तन दिखना शुरू हो गया। तब शिक्षा को राजकाज की भाषा फ़ारसी से जोड़ा जाने लगा और मदरसों एवं मकतबों की स्थापना होने लगी जिसे राज्य का अनुदान मिलना शुरू हो गया और धीरे-धीरे शिक्षा संस्थानों की यात्रा राजाश्रयी या सरकारीकरण की ओर उन्मुख होने लगी। अंग्रेज़ों के आने के बाद शिक्षा की अवधारणा ही बदल गयी। अंग्रेज़ों को अपना राज चलाने के लिए भारी मात्रा में किरानियों की ज़रूरत पड़ी और उन्होंने उसी हिसाब से शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। यहाँ से भारतीय शिक्षा तथा शिक्षकों के चाल और चरित्र पर  ब्रिटिश नीति के  व्यापक परिवर्तन का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हो गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हम अंग्रेज़ी पद्धति पर ही आधुनिक शिक्षा के मॉडल का अनुसरण करते रहे। 

आज स्थिति यह है कि मेकौले के पदचिह्नों पर चलती शिक्षा-व्यवस्था ने हमारे प्रशासन में नीचे से ऊपर तक किरानी भर दिए। लिपिक से सचिव तक।  गुरु की स्थिति  ‘शिक्षण-कर्मचारी’ की हो गयी। ये ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अपने कार्य निष्पादन में ‘शिक्षणेत्तर किरानियों’ के नियन्त्रण में आ गए। शिक्षा संस्थान या तो पूरी  तरह से राज्य के नियन्त्रण  में आ गए या पूरी तरह निजी नियन्त्रण में।  सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कर्मचारियों के मुख्य कार्य में खाना बनवाना, चुनाव की मतदाता सूची तैयार करना और जनसंख्या कर्मचारी के रूप में लोगों की गिनती करना है। व्यावसायिकता, समाज की गिरती नैतिकता, शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा के प्रतिशत का काम हो जाना, राजनीति से अच्छे लोगों का  बहिर्गमन और समाज के निकृष्टतम तत्वों से इसका भर जाना, अर्थतन्त्र की समाजतन्त्र पर गहरी पकड़, मेकौले की सन्तति, किरानियों, का भ्रष्टाचार के उत्तुंगतम शिखर का अतिक्रमण कर लेना, जीवन के मूल्यों की परिभाषा का बदल जाना, नयी पीढ़ी का अपने मौलिक संस्कार और गौरवमयी परम्परा से कट जाना, शिक्षा का एक उद्योग-धन्धा  का रूप ले लेना, जगह- जगह शिक्षा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह दुकानों का खुल जाना,  घोर असभ्य, अशिक्षित, काला अक्षर भैंस बराबर और शैक्षणिक कुसंस्कारों के प्रतिनिधियों का शिक्षा मन्त्री  तक  बन जाना … ऐसे ढेरों कारण आज के दिन में उपस्थित हैं, जिसने समाज की सबसे गौरवमयी संस्था, ‘गुरु’, को एक कमज़ोर ‘शिक्षण-कर्मचारी’ अर्थात ‘शिक्षक’ के रूप में बना दिया है।

हरिशंकर परसाई ने एक जगह लिखा है कि दिवस हमेशा से कमज़ोरों का या लुप्त होती जा रही चीज़ों का ही मनाया जाता है। इसीलिए हमारे यहाँ डॉक्टर दिवस, इंजीनियर दिवस, शिक्षक दिवस आदि मनाया जाता है। ये सभी समाज के निर्माण और उत्थान की रीढ़ हैं, लेकिन आज की व्यवस्था के  प्रशासनिक  ढाँचे में बेचारे सबसे लाचार और कमज़ोर हैं। आपने कभी थानेदार दिवस, किरानी साहेब दिवस, बड़ा बाबु दिवस या मन्त्री दिवस नहीं सुना होगा। जब भी कोई नया तबक़ा इन कमज़ोरों की सूची में शामिल होगा, उसका दिवस मनाया जाएगा। हम आभारी हैं राधाकृष्णन के, जिन्होंने उन्नीस सौ बासठ में ही शिक्षकों के भविष्य को भाँप लिया था और अपने जन्मदिन को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया था। राधाकृष्णन इस सनातन परंपरा के उद्भट विद्वान दार्शनिक थे। उनकी और कलाम दोनों की शिक्षा किसी विदेशी संस्थान में नहीं हुई थी। वे विशुद्ध भारतीय मिट्टी और भारतीय संस्कार की उपज थे।  फ़िलहाल उनकी स्मृति ही आज के शिक्षकों और इस देश के लिए गर्व की अनुभूति का एकमात्र कारण प्रतीत होता है। अब इसे  ‘शिक्षक दिवस’ कहें या ‘शिक्षण-कर्मचारी दिवस’!

‘शिक्षक दिवस’ की बधाई और एक नए भविष्य की आशा की शुभकामनाएँ!