अनजाने ॐकारा भरती,
गिरती-पड़ती हर की पौड़ी।
‘यू टू वर’ नीट धुरफ़ंथी,
नहीं सुहाती फूटी कौड़ी।
कबडी, कबडी, कबडी करती,
चौथे खम्भे तक जा दौड़ी।
बेनक़ाब गोदी भई मीडिया,
नौड़ी, दो कौड़ी की छौड़ी।
हक़- हकूक के हाल पर हरदम,
हकलाती, इठलाती तुतली।
ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन, ता-धिन!
राज महल नाचे कठपुतली।
हिंदू-मुस्लिम पुड़िया लेकर,
भानुमती ये खोले पिटारा।
आगे नाथ और पीछे पगहा,
गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।
हाय! कितनी बदल गयी यह,
संवादों की अपने दुनिया।
कल से आते- आते ‘आज तक’,
ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया!