Wednesday, 20 May 2020

‘लोकबंदी’ और ‘भौतिक-दूरी’



किसी भी क्षेत्र की भाषा उस क्षेत्र की संस्कृति की कोख से अपने शब्दों की सुगंध बटोरती है। वहाँ की लोक-परम्परा, जीवन शैली, आबोहवा, फ़सल, शाक-सब्ज़ी, फलाहार, लोकाचार, रीति-रिवाज, खान-पान, पर्व-त्योहार, नाच-गान, हँसी-मज़ाक़, हवा-पानी जैसे अगणित कारक हैं जो उस क्षेत्र की बोली और भाषा के लिए शब्दों का निर्माण करते हैं। इसलिए आपको हर भाषा में हर तरह के शब्द नहीं मिलेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी प्रबल संभावना है कि किसी भाषा में प्रचलित शब्द का पर्याय किसी दूसरे क्षेत्र की भाषा में नहीं भी मिले क्योंकि उस क्षेत्र की संस्कृति में उस शब्द की कोई उपादेयता या प्रासंगिकता ही न हो। जैसे-जैसे इस तरह की दूसरी संस्कृति के किसी नए तत्व का प्रवेश उसमें होता है तो साथ-साथ तदनुरूप दूसरी भाषा के शब्द भी प्रवेश कर जाते हैं। विदेशज शब्दों के प्रवेश की भी यहीं गाथा है। उदाहरण के तौर पर सनातन संस्कृति में विवाह-विच्छेद जैसी किसी संस्कृति के प्रचलन का कोई सुराग़ नहीं मिलता है। इसीलिए तलाक़ या डिवॉर्स का कोई समानार्थक शब्द हिंदी या संस्कृत में नहीं मिलता। द्रविड़ भाषाओं की मुझे जानकारी नहीं। फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि दक्षिण की भाषाओं में भी यह उपलब्ध नहीं ही होगा।
उसी तरह तकनीकी विकास के दौर में भी नयी-नयी इजाद होने वाली चीज़ों के नाम के बारे में भी यहीं प्रथा है कि उसका अविष्कार करने वाले क्षेत्र की भाषा  में उसके प्रचलित नाम को ही अमूमन उसका सार्वभौमिक नाम सभी भाषाओं में स्वीकार कर लिया जाता है और आज के सूचना क्रांति के युग में उन विदेशज शब्दों के आम जन के मुँह चढ़ जाने में तो कोई बड़ा वक़्त भी नहीं लगता है। इसीलिए विज्ञान के क्षेत्र में रासायनिक, जैविक और वानस्पतिक नामों के एक मानक ‘नोमेंक्लेचर’ की प्रणाली इजाद कर ली गयी है ताकि किसी तरह की कोई भ्रांति नहीं रहे। लेकिन मानविकी और समाज-शास्त्र में अपनी-अपनी भाषा में अनुवाद की स्वतंत्रता है। भलें ही, वह अनुदित समानार्थक शब्द आपकी पारिभाषिक शब्दावली में अपना स्थान बना ले, किंतु आम जन की ज़ुबान पर चढ़ने में उसे लम्बा वक़्त लग जाता है।
दूसरी ओर, क्षेत्रीय भाषाओं में स्थानीय बोलियाँ अपने अर्थों में वहाँ की जीवन-शैली से खाद-पानी लेकर पनपती और बढ़ती हैं तथा अपने उच्चारण मात्र से एक समग्र चित्र उपस्थित कर देती हैं। लोकोक्तियाँ और मुहावरे भी उसी शृंखला की अगली कड़ी हैं। यही कारण है कि सनातन परम्परा का ‘धर्म’ पश्चिमी देशों के ‘रिलीजन’ और भारत-भूमि का ‘सर्वधर्म समभाव’ यूरोपीय  ‘सेकूलरिज़्म’ के साथ अपना उचित तालमेल नहीं बिठा पाता। हमारा सनातनी ‘सम्प्रदाय’ भी आधुनिक संदर्भ में प्रयोग होने वाले ‘संप्रदायवाद’ का उत्स कदापि नहीं हो सकता!
नयी चुनौतियाँ और नये  परिवेश भी भाषा को नए शब्दों से लैश कर जाते हैं। जिस भूमि पर पहले-पहल ये चुनौतियाँ सिर उठाती है वहीं की भाषा नए शब्दों के इस अवसर को लोक लेती हैं और बाक़ी भाषाएँ या तो उनका अनुवाद अपनी भाषा में कर लेती हैं या फिर उसे ज्यों-का-त्यों अपना लेती हैं। मुझे याद है कि  जब सोवियत रूस में सुधारों का ज़माना आया तो दो शब्द बड़े प्रचलित हुए, ‘ग्लासनौस्ट’ और ‘पेरेस्त्रोईका’। हमने इसे हिंदी में ‘खुलापन’ और ‘पुनर्संरचना’ नाम दिया। उसी तरह ‘प्रोलैटरिएट’ को हमने ‘सर्वहारा’ कहा लेकिन ‘बुर्जुआ’ ‘बुर्जुआ’ ही रहा। लेकिन जब हमारे ग्रामीण इलाक़ों में चिलचिलाती धूप वाले मौसम में  ख़ाली पेट लीची खाने से बच्चों में अपनी ख़ास पहचान लिए एक जानमारु बीमारी आयी तो उसका नाम ‘चमकी’ रख दिया। अब ऐसी बीमारी विदेशों में भी लीची-बाग़ान लगाए जाने के बाद यदि हो तो पता नहीं वहाँ कौन सा नाम लेकर आएगी। ऐसे असंख्य उदाहरण हमारे सामने हैं।
अब ‘कोरोना’ का रोना मचा है तो दो शब्द मेरा ध्यान बरबस खींचते हैं। एक है ‘लॉक डाउन’ तथा दूसरा है ‘सोशल-डिस्टेंसिंग’। ‘लॉक डाउन’ को तो हम यथावत प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन ‘सोशल-डिस्टेंसिंग’ को ‘सामाजिक-दूरी’ में अनुवादित कर दिया है। अब हमारे यहाँ तो पहले कभी महामारी की ऐसी विकट आयातित स्थिति तो आयी नहीं कि ‘खेत खाए गदहा, मार खाए जुलहा’! हवाई जहाज़ पर सवार होकर भिन्न-भिन्न देहों के रास्ते कोरोना के वाइरस ने भारतीय शरीर में अपना घर बनाना शुरू किया है और हम उसकी गृह-श्रृंखला-निर्माण की निरंतरता को तोड़ने के लिए ‘लॉक डाउन’ में बंद होकर अपने घरों से निकलना बंद कर रहे हैं और आपस में ‘सोशल-डिस्टेंसिंग’ के मार्फ़त एक निश्चित भौतिक (जिसमें शारीरिक भी शामिल है) दूरी बनाकर एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से परहेज़ कर रहे हैं।  इससे पहले हम ‘लॉक डाउन’ को ‘फ़ैक्टरियों’ में तालेबंदी और मज़दूरों के हड़ताल पर चले जाने को बोलते थे, जो एक नकारात्मक भाव देता था। यहाँ तो बीमारी की छूत लगने-लगाने के भय से इस ‘लोक’(संसार) के समस्त ‘लोक’(प्राणियों) ने ही अपने को स्वेच्छा से बंद कर लिया है। यह एक ‘लोकतांत्रिक’ ‘लोकबंदी’ है। ‘लोकबंदी’ एक निहायत सकारात्मक क़दम है।
अब ‘सोशल-डिस्टेन्सिंग’ की बात कर लें। मनुष्य है ही मनुष्य केवल इसलिए कि वह स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिकता का अपना स्वभाव त्याजते ही वह जानवर की श्रेणी में आ जाता है। फिर सामाजिक दूरी बनाने की बात को यह दोपाया समाज अपनी भाषा में भला कैसे पचा सकता है? वह भी हमारा देश भारत! परिवार और समाज यहाँ की अटूट व्यवस्था में महज संस्थाएं ही नहीं बल्कि संस्कार है और किसी भी तरह की ‘पारिवारिक-दूरी’ या ‘सामाजिक- दूरी’ बनाए रखने की बात इसके वजूद की  मूलभूत अवधारणा के ही ख़िलाफ़ होगा। इसलिए बेहतर हो यदि हम इसे ‘सामाजिक-दूरी’ के बजाय ‘भौतिक-दूरी’ कहें और वैसा ही करें भी!
तो ‘लोकबंदी’ और ‘भौतिक-दूरी’ भाषा, भाव और कर्म में अपनाएँ ताकि  कोरोना पास भी फटकने न पाए!!!  

Sunday, 19 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र – ९ (अंतिम भाग) (Corona and the Sociology of India -9) (Concluding Part)


(भाग – ८ से आगे)

         


अब कुछ ख़ास बातों पर ग़ौर कर लें। पहली बात, तो यह है कि किसी भी समाजशास्त्रीय पड़ताल या विवेचना में किसी समाज विशेष का अवलोकन करने वाले शोधार्थी को, विशेषत: उस स्थिति में जब  वह  उसी समाज का सदस्य है तो, वस्तुनिष्ठ दृष्टि के संस्कारों से सम्पन्न होना वांछनीय है। ऐसा न होने पर इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वह ढेर सारे ऐसे आत्मनिष्ठ तत्वों के आग्रह का आखेट बन जाएगा जो उसे पूर्वाग्रही और ‘स्वजातीय उत्कृष्टता में विश्वास रखनेवाले’ आरोपों के घेरे में ले सकता है। हर शोधार्थी को सोचने  की अपनी दृष्टि (थॉट प्रॉसेस) और परखने के अपने मूल्य-मानक (वैल्यू-सिस्टम) होते हैं जो उसी समाज के उत्पाद हैं जिसने उसका पालन-पोषण किया है। इसलिए यह देखना भी ज़रूरी हो जाता है कि उसकी दृष्टि, मूल्य और मान्यताओं से उसकी पड़ताल या विवेचना कितनी प्रभावित होती है। इस विवेचना में वह कहीं अपने मूल्यों के अर्जुन के वर्तमान और भविष्य की रक्षा में किसी एकलव्य का अँगूठा तो नहीं काट दे रहा है। समाज के अवलोकन के प्रकारांतर में कहीं अपने दर्शन का दिग्दर्शन तो नहीं करा रहा है या फिर दूसरे की मान्यताओं को दबा तो नहीं रहा है।
                    कुशाग्र आर्थिक समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स अपने संघर्ष-सिद्धांतों में यह आरोप पहले ही गढ़ चुके हैं; और ईमानदारी से स्वीकारें तो उनमें  थोड़ी सच्चाई भी है, कि कोई भी शिक्षक अपने छात्रों में अध्यापन के दौरान जीवन के  वहीं सोच और वहीं मूल्य भरता है जो जीवन वह स्वयं जीता है। किंतु विज्ञान की दुनिया में ऐसा नहीं होता। वहाँ तथ्यों को स्वीकारने और नकारने में कर्ता, कर्म या करण किसी के भी जीवन मूल्यों का कोई असर नहीं होता। विज्ञान में भौतिक या रासायनिक क्रिया या प्रतिक्रिया अपने वैज्ञानिक कार्य-कारण सिद्धांतों पर घटित होती हैं। उनका इससे लेना देना नहीं होता कि प्रयोगशाला  पूँजीवादी की है या समाजवादी की, प्रयोग करने वाला गोरा है या काला और उसका ख़र्च किस धर्म के लोग उठा रहे हैं। लेकिन ग़ैर वैज्ञानिक विषयों से सम्बंधित शास्त्रों में कोई भी प्रयोग, अध्ययन, पड़ताल, समीक्षा और विश्लेषण  इन समस्त कारकों से प्रभावित होते हैं।  इसलिए जब तक वहाँ पर शोधार्थी वैज्ञानिक संस्कारों से सम्पन्न होकर बिना कोई नया तथ्य पैदा किए या वर्तमान तथ्यों में कोई कृत्रिमता पैदा किए विशुद्ध वस्तुनिष्ठता से अपनी पड़ताल नहीं करता तबतक उसके इस उद्योग को हम ‘सामाजिक कला’ ही कहते हैं, ‘सामाजिक विज्ञान’ कतई नहीं! मैं समाज-विज्ञान के अध्येताओं और छात्रों से अपनी इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी के लिए कोई खेद नहीं व्यक्त करता क्योंकि निष्पक्षता और पंथ-निरपेक्षता ही सही शोध की कसौटी है। एक बात ज़रूर है कि भारतीय समाज मार्क्स की अवधारणा में मुश्किल से समा पाता है क्योंकि यहाँ बुर्जुआ और सर्वहारा से इतर एक प्रबल मध्यम वर्ग है जिसकी जड़ें  आर्थिक के साथ-साथ उसकी सामाजिक आधारभूमि में भी गहरे तक गड़ी हैं। यहीं वर्ग इस समाज की बौद्धिक आत्मा है और यहाँ के समाज की साझी चेतना का निर्माण और वहन करता है। मध्यम वर्ग ही भारतीय समाज की चेतना का प्रतिनिधि है, उसकी सनातन संस्कृति का चिर संरक्षक है और भारतीय समाज की आध्यात्मिक समृद्धि है। मध्यम वर्ग विहीन समाज सदैव पंगु और निष्प्राण होता है।  
                      पूर्ण-सहभागी-अवलोकन में आत्मनिष्ठा के दोष से बचने के बाद जो दूसरी महत्वपूर्ण बात आती है, वह है -  “समाज में साथ-साथ बहने वाली अनेक धाराएँ, साथ-साथ बढ़ने वाली अनेक प्रवृतियाँ और साथ-साथ दिखने वाले अनेक लक्षण”! इनमें देखें तो सभी को, लेकिन समाज की मौलिक पहचान के रूप में पहचानें उसी को जो उस समाज की स्थापना का लक्ष्य है, जो उस समाज के व्यक्ति की जीवन प्रणाली का आदर्श है और जिसके उल्लंघन से उस समाज का ‘कलेक्टिव कोंसेंस’ आहत होता है। यदि किसी लक्षण के विरोध में समाज मुखर हो जाय तो निश्चित रूप से वह लक्षण उस समाज के मौलिक चरित्र का विलोम है। लेकिन, यदि किसी लक्षण के अनैतिक और आपराधिक होने के बाद भी वह समाज अपने ऐसे लक्षण धारियों की प्रत्यक्ष रूप से निंदा नहीं करता, उन्हें कठघरे में खड़ा नहीं करता या फिर जान बूझकर आँखें बंद कर लेता है, तो धीरे-धीरे वे लक्षण  उस समाज के मूल्य बनने लगते हैं और बाद में वहीं लक्षण उस  समाज की संस्कृति बन जाते हैं। आज भी इस दुनिया में ऐसे कतिपय क्षेत्र और समुदाय हैं जिनकी  अपनी आपराधिक पहचान है।  मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु सभ्यता के विकास-क्रम में ऐसी ढेर सारी पुरानी मान्यताएँ ढहती हैं, मूल्यों के नये  प्रतिमान गढ़ते हैं और परिवर्तन की डगर पर समाज का सफ़र जारी रहता है। समाज का ‘कलेक्टिव-कोंसेंस’ अपने ‘सोशल-नॉर्म’ और आदर्शों को स्थापित करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है। यदि भारत की अदालतों में गांधी के चित्र के नीचे ‘सत्यमेव जयते’ की तखती टँगी  है, तो इस बात का यह रेखांकन है कि  ‘सत्य की विजय’ भारतीय समाज का मौलिक आदर्श और चिर-उद्घोष है। भले ही, आए दिनों ऐसी घटनाएँ क्यों न होती रहे जो सत्य का गला दबाती हों! ऐसी प्रतिकूल और निंदनीय घटनाएँ समाज के बहुसंख्यक सुसंस्कृत सज्जन नागरिकों के मन में बुराई के विरुद्ध क्षोभ का तीव्र ज्वार भरती हैं। वह ऐसे कुकर्मियों को इंसान की परिभाषा के दायरे से भी दूर समझती  है और ऐसे लोगों को दंडित किए जाने पर उसका मन जुड़ा जाता है। हैदराबाद  में बलात्कारियों को पुलिस द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर जनता का असीम  उल्लास  इसी  बिंदु की ओर संकेत करता है। समाज का यहीं  ‘कलेक्टिव-कोंसेंस’ न्याय के दर्शन को परिभाषित करता है।
                     तीसरी बात, कि एक समाज के समान धारा ही किसी अन्य  समकालीन समाज में दृष्टिगोचर हो तो दोनों धाराएँ एक-दूसरे को धोती नहीं, बल्कि अपने-अपने मूल्यों को ढोती स्वतंत्र रूप से बहती हैं। दक्षिण कोरिया और अन्य देशों में कहीं यदि संयुक्त परिवार की व्यवस्था बची है तो इसका यह अर्थ नहीं कि  भारतीय संयुक्त परिवार प्रणाली उनका मुखापेक्षी  हो गयी और उसकी चर्चा करना अपनी उत्कृष्टता को रेखांकित करने का उद्योग हो गया। हर संस्कृति अपने में महान है और महान संस्कृतियाँ सदैव दूसरों की महानता को भी उतनी ही तबज्जो देती हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपनी महानता से आँखें मूँद लेती हों! उसी तरह धर्म की यदि बात करें तो सामाजिक व्यवहार के धरातल पर कल्याण की कामना और परोपकार ही धर्म है। “सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पशयन्ति, मा कश्चित दुःख भागवेत।।“ और “अयम निज:, परो वेत्ति, गणना लघु चेतसाम। उदार चरितानांतु वसुधैव कूटुंबकम।।“ यहीं धर्म के सम्बंध में भारतीय समाज के बीज-वाक्य हैं। वर्तमान संदर्भ में धर्म के बारे में हमें बस इतना ही कहना है और भारतीय समाज तथा संस्कृति  की भी प्रत्येक भारतीय से बस यहीं  अपेक्षा  है।  इससे इतर धर्म की और कोई भी बात बस ढकोसला है। हम फ़िलहाल अपनी बात नहीं कर रहे बल्कि महामारी से जूझता यह भारतीय समाज अभी क्या सोच रहा है, हम उसे टटोल रहे हैं। आगे फिर कभी हम विस्तार में अलग से  धर्म और सम्प्रदाय पर भी भारतीय समाज की पड़ताल कर लेंगे।
                      भारतीय समाज न तो घोर पदार्थवादी है न शुष्क अध्यात्मवादी। इसका पुरुषार्थ दर्शन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों को क्रमिक महत्व देता है और इनके लिए जीवन की चार अवस्थाओं में चार आश्रमों का आग्रह भी है। अतः कुछ आलोचकों का यह विचार कि भारतीय समाज पदार्थवादी जीवन में प्रवेश को किसी गहरी खाई में गिरने के समान मानता है, बिलकुल भ्रामक है। बल्कि यदि सही मायने में देखें तो अपने उन्हीं पदार्थवादी मूल्यों से जिजीविषा को सहेजकर कोरोना के दैत्य से लड़ने के लिए सम्पूर्ण भारतीय समाज आज एक साथ  उठ खड़ा हुआ है।
                       और, इस चर्चा का  उपसंहार करने के क्रम में मैं एक बार भारत के समाज और उसके व्यक्ति को आमने-सामने खड़ा कर दोनों की एक-दूसरे की सापेक्ष स्थिति का आकलन भी कर लेना चाहूँगा।  यहाँ पर अपने ऊपर ‘इथनोसेंट्रिज़म’ (अपनी संस्कृति को उत्कृष्ट मानने की प्रवृति) के आरोप का जोखिम उठाते हुए इतना तो हम पक्का कहेंगे कि भारतीय समाज और उसका सदस्य व्यक्ति दोनों आपसी संपुरकता से ओत-प्रोत  और समरसता से सराबोर हैं। अपने आम जीवन में व्यक्ति एक ओर अपनी सम्पूर्ण भावनाओं का समाज के ‘कलेक्टिव-कोंसेंस’ अर्थात ‘सामूहिक चेतना’ से समाहार कर सामाजिक मूल्यों के उत्थान, संवर्धन और संरक्षण में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है तो दूसरी ओर समाज भी व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र चेतना विकसित करने के लिए एक उदार और उर्वरा वातावरण प्रदान करता है। ऐसा व्यक्ति जो समाज की जड़ता, अंधविश्वास, दकियानुसीपन और प्रतिगामी  प्रवृत्तियों पर हल्ला बोलता है, इसको हिलोड़ कर जगाता है और क्रांति के बीज बोता है उसे समाज अपने सिर आँखों पर बिठाकर अपना नेता बना लेता है और उसके पीछे-पीछे चल देता है। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, गुरु गोविंद सिंह, कबीर, गांधी, कलाम  जैसे उदाहरणों से यह समाज पटा  हुआ है। सामाजिक क्रांतियों और उनसे  उद्भूत परिवर्तनों के पीछे ऐसे ही व्यक्तियों की प्रखर भूमिका रही है। व्यक्ति को  पहचान भी समाज ही देता है, अर्थात उसका परिवार, गाँव, प्रांत, जाति, गोत्र, जमात, धर्म आदि तमाम संस्थाएँ हैं जो व्यक्ति को समाज में अपने से जोड़कर पहचान देती है। एक व्यक्ति के  सत्कर्मों और उपलब्धियों से उसका  परिवार, उसका गाँव, उसकी जाति, उसका ज़िला, उसका स्कूल-कॉलेज, उसका प्रांत और यहाँ तक की पूरा भारतीय समाज महिमामंडित होता है और गर्व से फूले नहीं समाता।  इन संस्थानों से  उस सदस्य व्यक्ति को  और उस व्यक्ति से इन संस्थानों को इज़्ज़त मिलती है। दोनों एक-दूसरे की पहचान बनते हैं। इसी तरह बुरे कर्मों का लेखा-जोखा भी समाज और व्यक्ति के समीकरण को प्रभावित करता है। दोनों एक दूसरे का अपयश ढोते हैं। व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन का यह अद्भुत ताना-बाना हमारे सामाजिक व्यक्तित्व का अध्यात्मिक पक्ष है। इसी अदभुत ताने-बाने में भारतीय समाज  का हर प्रांत, हर क्षेत्र, हर नगर, हर शहर, हर क़स्बा,  हर गाँव, हर जमात, हर तबक़ा, हर परिवार और हर इंसान आज कोरोना से जंग लड़ रहा है।
                                                                    ------------- समाप्त -----------------
#विश्वमोहन#कोरोना




Saturday, 18 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र – ८ (Corona and the Sociology of India - 8)


(भाग – ७ से आगे)



सामुदायिक जीवन जीने की तड़प व्यक्ति में न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का हेतु है, प्रत्युत यह उसकी प्रकृति का निमित्त भी है। मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। प्रतिकूल परिस्थितियों में तो उसकी अपनी भावना पूर्णरूपेण समुदाय से एकाकार हो जाती है क्योंकि समाज का  सान्निध्य ही  उसे सुरक्षा की छतरी का मनोवैज्ञानिक अहसास देता है। समाज के अस्तित्व में ही उसे अपनी  भौतिक सत्ता की प्रतिछवि दिखायी देती है और सामुदायिक चेतना में उसे अपनी चेतना की प्रतिध्वनि सुनायी देती है। महामारी सारे समाज का शत्रु है। सबका दुश्मन एक – ‘महामारी’। सबकी रणनीति का एक ही केंद्र बिंदु – ‘महामारी’। इस शत्रु का जो भी शत्रु, उसका मित्र, और जो भी मित्र,  उसका शत्रु! यह भावना समाज के प्रत्येक जन में हिलोरे ले रही हैं और विदेश से इस धरती पर आयी इस बीमारी ने सबके मन में देश भक्ति का एक अद्भुत उफान उत्पन्न कर दिया है। देशभक्ति का यह उफान महज़ भावनाओं का उफनता दूध नहीं है बल्कि प्रशांत महासागर-से गम्भीर मानस की तलहटी में मानव सृष्टि को बचाने हेतु दुर्जेय प्रण की प्रकंपित  सुनामी से उद्भूत भीषण ज्वार है। उसके अंदर के अति-व्यक्तिवाद ने समाजवाद के समक्ष घुटने टेक दिए हैं और अब वह अपनी आत्मा का विस्तार समाज के समस्त प्राणियों की आत्मा में देख रहा है। बाज़ार  की संस्कृति सिकुड़ रही है और महामारी-मुक्त मुल्क  की चाहत विस्तार ले रही है।
                 यहाँ तक कि लोकबंदी के इस ऐकान्तिक घरवास में धर्म का मर्म भी अपने कर्म-कांडी कलेवर के छिलके उतारकर आध्यात्मिक अवतार में निखर रहा है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजा सबके दरवाज़े बंद हो गए हैं और अस्पताल के दरवाज़े खुल गए हैं। डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन – ईश्वर  के ये नए अवतार अपनी उपस्थिति से उद्विग्न मानव मन को जीवन का सुधा पान करा रहे हैं। कल्याण की कामना ही धर्म है। जहाँ भी इस कामना का अभाव है, बस अधर्म ही अधर्म है। धर्म के नाम पर बहुत तांडव हो चुका। अब इस क़यामत के काल में उसे धर्म का सीधा साक्षात्कार हो रहा है। कोरोना घनघोर काल-वृक्ष बन पीपल की तरह खड़ा  है और उसके नीचे आकर उसे बोधिसत्व की प्राप्ति हो गयी है। ‘सेवा परमो धर्म:’ ‘परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम’ बस यही धर्म है। बाक़ी सब जमात है। स्वास्थ्य-सेवाओं के प्रति भी उसका आग्रह अब बढ़  गया है। स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना में अब आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। महामारी की यह चुनौती ही अब अवसर बन कर आयी है। नौकरशाही की सारी सामंती मान्यताएँ समाज के इस नवजागृत ‘कलेक्टिव-कोंसेंस’ के सामने दम तोड़ रही हैं। शासकीय व्यवहार में पारदर्शिता और शुचिता का आग्रह जाग उठा है। वैज्ञानिक परिहार्यताओं के समक्ष प्रशासनिक जड़ता घुटने टेकने लगी है। महामारी के इस झटके ने नौकरशाही के आडंबरों को ख़ारिज कर तंत्र को डिजिटल राह पर धकेल दिया है। भौतिक स्पर्श से परहेज़ हेतु अब मुद्रा का विनिमय-व्यापार भी ‘डिजिटल मोड’ में आ गया है। टेली-मेडिसिन और टेली-कॉनफेरेंसिंग का प्रचलन  शुरू हो गया है। इस रीति से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के रयुमेटोलौजी विभाग के डॉक्टर रूद्र के द्वारा पुणे की रेणु को दी गयी मेडिकल सेवा ट्विटर पर चर्चा का विषय बनी। यह आगे के दिनों में मेडिकल के क्षेत्र में आने  वाली  नयी क्रांति की सुगबुगाहट  है।
                  ‘आइसोलेशन’ और ‘क्वारंटाइन’ को भी सुगम और सरल बनाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। कहते है कि १९वीं शताब्दी में फैली प्लेग की महामारी के दौरान जितनी जानें प्लेग ने लीली, उससे कम क्वारंटाइन ने नहीं खायीं। महामारी से ज़्यादा त्रासद होते  थे ये! प्रसिद्ध साहित्यकार राजेंद्र सिंह बेदी ने अपनी एक प्रसिद्ध कहानी ‘क्वारंटीन’ में इसका चित्र खिंचा है : -
“प्लेग तो ख़तरनाक था ही, मगर क्वारंटीन उससे भी ज़्यादा ख़ौफ़नाक थे। लोग प्लेग से उतने परेशान नहीं थे, जितने क्वारंटीन से और यहीं वजह थी कि स्वास्थ्य सुरक्षा विभाग ने नागरिकों को चूहों से बचाने का हिदायत करने के लिए बड़े आदमकद विज्ञापन छपवाकर दरवाज़ों, सड़कों और गलियों में लगाया था। उस पर ‘न चूहा, न प्लेग'  के शीर्षक में इज़ाफ़ा करते हुए ‘न प्लेग, न चूहा, न क्वारंटीन’ लिखा था। “ यह साबित करता है कि  मानसिक अवसाद के कारकों में क्वारंटीन अपना एक अलग स्थान रखता है। इसकी एक झलकी दिलशाद गार्डेन,  दिल्ली के मुहल्ला क्लीनिक में डॉक्टर गोपाल झा द्वारा अपने संक्रमण काल में अपने मित्रों को ‘आइसोलेशन’ से भेजे गए मार्मिक वहट्टसप्प संदेश से मिलती है। अब 'वर्चूअल रीऐलिटी' (आभासी वास्तविकता) की तकनीक से आइसोलेशन और क्वारंटीन के मनोविज्ञान पर शोध कर इसे रोगी के अनुकूल और ‘यूज़र-फ़्रेंड्ली’ बनाने की दिशा में काम हो रहा है।
                    संक्रमण की शृंखला को तोड़ने के लिए लोकबंदी (लॉक-डाउन) की इस मुहिम से समाज को अन्य ढेर मोर्चों पर भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है। अर्थतंत्र बिलकुल तबाह-सा हो गया है। बहुत सारे लोग अपने काम के सिलसिले में अस्थायी ठिकानों पर फँसे रह गए। उत्पादन इकाइयाँ बंद हो गयीं। लोग भारी मात्रा में बेरोज़गार हो गए। कोरोना से संघर्ष में अन्य रोगों के लिए अस्पताल की सेवाएँ बंद हो गयीं। कैन्सर, दिल की बीमारी और  मस्तिष्क-आघात जैसी जानलेवा बीमारियों के मरीज़ निस्सहाय-से हो गए।  असंगठित क्षेत्र के दैनिक भोगी कर्मकार, मज़दूर, निजी विद्यालयों के शिक्षक और दिन भर की अपनी दुकानदारी से परिवार का पेट भरने वाले खोमचे वाले, ठेले वाले, दुकानदार, मोटर और साइकल रिक्शा चालक, बस और ट्रक के ड्राइवर भीषण आर्थिक संकट में फँस गए हैं। निम्न मध्यम वर्ग के कामगारों की एक विशाल संख्या है जो दस से पच्चीस हज़ार की मासिक आमदनी की नौकरी निजी क्षेत्रों में करने के लिए शहरों  में टिकी  हुई  हैं। इनकी स्थिति त्रिशंकु-सी हो गयी है। इन्हें न तो मज़दूरों वाली सुविधा मिल रही है, और न इनकी नौकरी के सुनिश्चित होने के आसार ही दिख रहे हैं।
                  सारी दुनिया की एक तिहाई आबादी लोकबंदी में घरवास कर रही है। अर्थतंत्र विश्राम की अवस्था में है। इतिहास की सबसे बड़ी मंदी दुनिया के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। पिछले साठ सालों में पहली बार एशिया के देशों की आर्थिक वृद्धि दर शून्य पर होने की तलवार लटक रही है। ऐसे तो आजकल आँकड़े भी विचारधारा की कोख से जनमते हैं। इसलिए किसी आँकड़े का सहारा न लेकर भी हम अर्थतंत्र की तबाही को  पूरी तरह से महसूस करने लगे हैं। जब अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की माली हालत ख़स्ता हो गयी है तो बाक़ी का क्या कहना! बाज़ार में ज़रूरी सामानों की कमी की आशंका के आतंक में ‘परचेज-पैनिक’ का लोग शिकार होने लगे हैं और भंडार करने की प्रवृति में सामान बाज़ार से ग़ायब होने लगे हैं। स्थिति को भाँपकर जमाखोरों ने मूल्य को ऊपर उछाल दिया है। इससे ज़रूरी सामानों की आपूर्ति का संकट गहराने लगा है। सिनेमा उद्योग थम गया है। खेल-कूद के बड़े आयोजन रद्द हो गए हैं। दूरदर्शन पर कार्यक्रमों और धारावाहिकों के निर्माण में शिथिलता आ गयी है। प्रकाशन का कारोबार बंद है। छोटे अख़बार दम तोड़ रहे हैं। आन-लाइन खाद्य और भोज्य-पदार्थों की विक्री बंद हो गयी है। होटल और रेस्तराँ वीरान पड़े हैं। पर्यटन उद्योग बंद है। रेल, सड़क और वायु परिवहन रोक दिए गए हैं। विज्ञान और तकनीक के उन्नत शोध संसधान भी बुरी तरह प्रभावित हैं। कोरोना ने उनकी सारी गतिविधियों पर ताला जड़ दिया है। शोध कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान के सारे कार्य रोक दिए गए हैं। यहाँ तक कि  सदाबहार जुए  के अड्डे बियाबान  हो गए हैं तथा चिरहरित सट्टेबाज़ी के धंधे भी अंतिम साँस गिन रहे हैं।
                     लोग घरों में घुस गए हैं और जंगली जानवर सड़कों पर आ गए हैं। चिरई-चिरगुन और जानवरों के खाने-पीने पर आफ़त आ गयी है। सड़कों के किनारे ढाबे, होटल बंद होने से कुत्तों को बहुत जगह भरपेट खाना नहीं मिल रहा है। कसाईखानों के बंद हो जाने से गिद्धों को आहार नहीं मिल पा रहा है। कोरोना वाइरस के चमगादड़ से जन्म लेने की सूचना ने मनुष्य  को पक्षियों और जानवरों के प्रति शंकालु बना दिया है और अब वे अपने ही पालतू जानवरों से भी कन्नी काटने लगे हैं। कोरोना के आक्रमण  ने मानव-व्यवहार के स्तर पर परिवर्तन के कुछ नए बीज डालने शुरू कर दिए हैं। ये परिवर्तन आने वाले समाज को किस दिशा में ले जाएँगे, यह समय ही बतलाएगा!..................................क्रमश: ………………

Friday, 17 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र – ७ (Corona and the Sociology of India - 7)


(भाग – ६ से आगे)

विविधताओं से भरे इस समाज के विस्तृत फलक पर  हमें भिन्न-भिन्न  प्रवृतियों के उस वृहत स्पेक्ट्रम के दर्शन होते हैं, जिसमें आप को हर रंग के उदाहरण मिल जाएँगे। ऐसी भी स्थितियों का मिलना मुश्किल नहीं जहाँ पिछले दृष्टांत का प्रतिलोम उभर कर सामने आ जाए। किंतु समाजशास्त्रीय अवलोकन में हम समाज की उसी प्रवृति को पकड़ने, पढ़ने और अपने विश्लेषण  में ज़्यादा ज़ोर देते  हैं जो इसकी साझी चेतना, इसके सोशल नॉर्म, इसके आदर्श और सबसे बढ़कर उन मूल्यों को संवर्धित करने की दिशा में हो, जिसके आलोक में व्यक्ति ने संगठित होकर समाज नाम की इस महान संस्था का निर्माण किया। और, संगठन की यह आवश्यकता तथा प्रवृति विपत्ति के दिनों में कुछ ज़्यादा ही प्रबलता से घनीभूत हो जाती है। उस अर्थ में थोड़े हद तक ऐसी विपत्तियाँ भी मानव समाज के दीर्घ क़ालीन उद्देश्यों की पूर्ति में प्रकार्यात्मक ढंग से ही अपना योगदान देती  हैं। लॉक-डाउन या घरवास या लोकबंदी  के दिनों में भारतीय समाज के आचरण ने इसे रेखांकित किया है।
       मनोवैज्ञानिकों का मानना है क़ि छोटी-मोटी व्यक्तिगत आदतों के बनने और टूटने की आधारशिला के निर्माण हेतु क़रीब तीन सप्ताह का समय पर्याप्त है। अतः परिस्थितियों के दवाब में जिस किसी व्यक्ति को धूम्रपान या उसके द्वारा सेवन किए जाने वाले किसी अन्य नशे की उपलब्धता तीन सप्ताह या उसके बाद तक नहीं मिली, तो धीरे-धीरे वह इन बुरी आदतों से छूटने हेतु  वांछित शारीरिक और मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं में पहुँच चुका होता है। इस ख़याल से इस लोकबंदी ने ढेर सारे लोगों को दुर्व्यसन के किसी न किसी ग़ुलामी से आज़ाद करने में एक अहम रोल अदा किया है। कुछ ऐसी व्याधियाँ भी जो अकेलेपन से उद्भूत थीं, पारिवारिक माहौल में आकार स्वतः दूर हो गयीं। बाहर की ‘सोशल-डिसटेंसिंग’ ने घर के अंदर ‘इमोशनल-प्राक्सिमटी’ का सूत्रपात कर दिया है। विशेषकर परिवार के बालकों  और किशोर वय के सदस्यों के लिए तो यह स्थिति वरदान बन कर ही आयी  है। हालाँकि इससे प्रतिकूल स्थिति के भी ढेर सारे दृष्टांत आए हैं जहाँ घर के अंदर चौबीसों  घंटे की यह रिहायश परिवार के कुछ सदस्यों के लिए किसी क़ैद की सज़ा से कम साबित नहीं हुई  और उनके कुंठा तथा अवसाद की स्थिति में भी पहुँचने की सूचना है। किंतु, ऐसे तत्व वहीं दृष्टिगोचर हुए हैं जहाँ पारिवारिक बंधन पहले से ही कमज़ोरी की कगार पर थे तथा सभ्यता के आघात ने संस्कृति को कुंद  करना शुरू कर दिया था। फिर भी कुल मिलकर सकारात्मक तत्वों की  रुझान ही ज़्यादा प्रभावी दिखी  है। भारतीय समाज निपट देहाती से शुरू होकर विशुद्ध महानगरीय जीवन तक पसरा हुआ है। किंतु मध्यम-वर्ग मुख्यतः ग्रामीण-शहरी-निरंतरता की जीवन पद्धति में पगा हुआ है और यहीं वह वर्ग है जो भारतीय समाज के कलेक्टिव कोंसेंस का ध्वजा-वाहक है। इसलिए भारतीय समाज के जिस किसी भी समुदाय का  मध्यम वर्ग सिकुड़ा हुआ है या मध्यम वर्गीय संस्कार समृद्ध नहीं है, वहाँ खुलेपन की कमी है और वहाँ  कुंठा, असामाजिकता  एवं दिग्भ्रमिता का प्राधान्य है।  
             लोग अपने को पुराने दिनों की ओर लौटते देखने लगे हैं, जहाँ ख़ुद से भी थोड़ी गुफ़्तगू  करने का वक़्त उन्हें नसीब हो रहा है तथा अपनी ज़िंदगी को अब बहुत क़रीब से देखने लगे हैं वे! पहले विवशता , फिर आदत, फिर स्वभाव और फिर आनंद!  लोकबंदी  में इस चक्र ने उनके आहार, आचार और विचार तीनों को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। मांसाहार बहुतों का छूट गया। पारिवारिक जनों के साथ लम्बे समय तक समय बिताने के क्रम में दिल से दिल के आलाप ने एक अत्यंत आह्लादकारी और आत्मीय सम्बन्धों का सूत्रपात कर दिया है। संचार माध्यमों ने तो अंदर को बाहर से जोड़ ही रखा है। अंदर के रस का प्रवाह बाहर भी उसी सरसता से बहकर  सामाजिकता की भाव-लताओं को सिंचित कर रहा है। परिवार जन एक दूसरे की खोज-ख़ैर ले रहे हैं और हाल-चाल पूछ रहे हैं। तेज़ी से बढ़ती मॉल-संस्कृति  पर अनायास विराम लग गया है। चायनीज़ फ़ास्ट-फ़ूड स्टॉल को कोरोना वाइरस ने डँस लिया है। घर में बने भोजन के स्वाद का न केवल परिचय मिल रहा है, बल्कि उसे पकाने में भी हाथ बँटाना पड़ रहा है। पारिवारिक जीवन जीने की इस आकस्मिक बाध्यता ने सामजिकता की सूखती-सी बेलि-लता को फिर से पनपाना शुरू कर दिया है। परिवार में पनपते इस पारस्परिक सामंजस्य की कड़ी में अब व्यक्ति ख़ुद से  भी मेल बिठाने  लगा  है। उसने अपने अंतर्मन की आकांक्षाओं को पहचानना शुरू कर दिया है। अब उसका कल का अकेलापन आज के एकांत  में बदल गया है जहाँ  उसे अपूर्व शांति और आध्यात्मिक सुख मिल रहा है। वह  अपने व्यक्तित्व के नए आयाम को तलाशने लगा है और अपने अंदर छिपे नए किरदार को तराशने लगा है। इस दीर्घ घरवास ने उसे अपनी रचनात्मक रुचियों को सजाने-सँवारने का भरपूर मौक़ा दिया है। उसके व्यक्तित्व का सृजनतमक पक्ष उभरकर सामने आ गया है।
                    घर के अंदर सिमटे जीवन की इस शैली के बड़े सामाजिक प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। अपराध की घटनाएँ समाप्तप्राय हो गयी हैं। चोरी, राहजनी, छिना-झपटी जैसी छोटी घटनाएँ बिलकुल बंद हो गयी हैं। रहन-सहन और खान-पान के इस अनुशासन ने छोटे-मोटे रोगों में भारी कमी की है और ऐसे रोगियों की संख्या आशातीत रूप से घट गयी है। पर्यावरण के प्रदूषण से जनित रोग हाशिए पर चले गए हैं। और तो और, बड़े-बड़े महानगरों के शव दाह गृहों में १५ से २० प्रतिशत की कमी की सूचना अंकित की गयी है। समझा जा रहा है की सड़क-दुर्घटना में होने वाली मौतों की संख्या शून्य हो गयी है। अस्पतालों में शल्य-चिकित्सा के दौरान होने वाली मृत्यु बंद हो गयी है। आपराधिक घटनाओं में होने वाली मौत बंद हो गयी है। साफ़-सफ़ाई के कारण भी औसत-स्वास्थ्य-स्तर सुधर गया है। धुआँ उगलती गाड़ियों के सड़क से हट जाने के कारण कार्बन उत्सर्जन का स्तर क़रीब-क़रीब शून्य हो गया है। वातावरण से कार्बन और ग्रीन हाउस गैसें ग़ायब हो गयी है। पार्टिकल मैटर का अनुपात काफ़ी घट गया है। एलर्जी, दमे और साँस की समस्या में अत्यधिक गिरावट आ गयी है। बड़ी तेज़ी से पर्यावरण अपनी पुरानी स्वच्छता और निर्मलता की ओर लौट रहा है। हवाएँ शुद्ध हो गयी हैं। उपवन में वसंत की बहार है। शोर थम गया है। पत्र-दलों और तरु-लताओं में संगीत का वेग है।  वातावरण की शांति और निस्तब्धता में कोयल की कुक और चिड़ियों की चहक की मिठास घुल गयी है। हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ दूर से ही नज़र आने लगी हैं। आसमान स्वच्छ एवं नीला दिख रहा है। चाँद की दूधिया चाँदनी अपनी धवलता में निखर उठी है। नीरभ्र अंतरिक्ष में टिमटिमाते अगणित तारे गिनती करने लायक़ साफ़-साफ़ दिखने लगे हैं। भूमंडल के निरंतर गरमाने  की प्रक्रिया (ग्लोबल वार्मिंग) थम-सी गयी है। पारा नीचे गिर गया है और वायुमंडल का सामान्य तापक्रम १ से २ डिग्री सेल्सियस तक कम हो गया है। सामाजिक जीवन और प्रकृति के आपसी तालमेल की प्रगाढ़ता स्पष्ट से स्पष्टतर हो चली है।
ऊर्जा के क्षेत्र में आशातीत बचत हुई है। कार्यालयों में अपव्यय होने वाली बिजली की काफ़ी  बचत हो रही है। और सबसे ज़्यादा तो, तेल की खपत  बिलकुल कम हो गयी है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है।  ढेर सारे निजी क्षेत्र के और सरकारी कार्यालयों ने भी घर से ही इंटर्नेट के माध्यम से काम करने की प्रथा शुरू कर दी हैं। शिक्षण-संस्थानों ने भी  ‘विडीओ-कॉनफेरेंसिंग’ के माध्यम से अपने संस्थानों में पढ़ाई-लिखाई का काम शुरू कर दिया। यह आम आदमी की जेब की बहुत बड़ी बचत है। आनेवाले दिनों में इसका व्यापक असर पड़ने वाला है। एक ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकती है, जिसमें छात्रों को अपने घर पर बैठे उच्च तकनीकी शिक्षा मिल जाए और उनकी  काफ़ी मोटी  रक़म ख़र्च कर छात्रावासों या महँगे ‘पीजी’ में रहने की बाध्यता ख़त्म  हो जाए ! बाज़ारों के बंद रहने के कारण अनावश्यक ख़र्चों पर विराम लग गया है और लोग केवल अपनी अति आवश्यक आवश्यकताओं की ही पूर्ति कर रहे हैं। मितव्ययिता जीवन प्रणाली में प्रवेश कर गयी है। आराम संबंधी और विलासिता की आवश्यकताओं पर पूरी तरह लगाम लग गया है। कुल मिलाकार समाज अपने पुरातन स्वरूप वाली शांत, स्वस्थ, निश्चिन्त और तनाव मुक्त शैली की ज़िंदगी में लौट गया है। लोग भी पूरी तरह से संवेदनशील होकर अत्यंत सामाजिक और अनुशासित भाव से अपने नागरिक मूल्यों का पालन करते हुए इस बीमारी के संक्रमण चक्र को तोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। दूक़ानों पर उचित दूरी बना के खड़े होना, मास्क लगाना, हाथों को भली-भाँति साबुन से साफ़ करना और संक्रमण की शंका होने पर जाँच करा कर ख़ुद ‘आयसोलेशन’ या ‘कवारेंटाइन’ में चले जाना दिनचर्या हो गयी है। कहीं-कहीं तो लोगों ने इस बिंदु पर अत्यंत अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।  बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में बेतिया के पास बैरिया  प्रखंड  के बगही बघंबरपुर से एक ऐसी ही उत्साह जनक सूचना प्राप्त हुई है। वहाँ दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, लुधियाना  और नेपाल से  २९ मार्च तक लौटे ४० प्रवासियों को पंचायत वालों ने ही बिना किसी सरकारी सहायता के अपने स्तर पर पंचायत भवन में ही कवारेंटाइन की व्यवस्था करा दी। उचित मेडिकल  संरक्षण में रखकर १४ दिनों बाद स्वास्थ्य परीक्षण करने के पश्चात उन्हें वस्त्र और  मास्क के साथ गाँव वालों ने भावभीनी विदायी दी। गाँव वालों की यह भावपूर्ण व्यवस्था सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है।  यह पूरा ज़िला कोरोना मुक्त है। …………………………………क्रमशः …………………………

Tuesday, 14 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र – ६ (Corona and the Sociology of India - 6)



(भाग – ५ से आगे)
पहले दिन के ‘जनता-कर्फ़्यू” में भागीदारी  और कोरोना से अहर्निश लड़ने वाले अपने डॉक्टर, स्वास्थ्य-कर्मी, पुलिस, अत्यावश्यक सेवा मुहैया करानेवाले कर्मचारी एवं अन्य समाज सेवियों के प्रति अपना अप्रतिम सम्मान और एकजुटता  दिखाकर भारतीय समाज ने इस महामारी से युद्ध में न केवल अपनी सतर्कता, तत्परता और सामाजिक सहधर्मिता  के पाँचजन्य का उद्घोष कर दिया, प्रत्युत इस जगत में मानवीय अस्तित्व की रक्षा के प्रति अपनी संस्कृति  के संवेदनात्मक पक्ष को भी प्रकट किया। उसके तुरंत बाद प्रारम्भ होने वाली 'लोकबंदी' अर्थात  ‘लॉक डाउन’  निश्चित रूप से एक ऐसी स्थिति थी, जिससे निपटने में  हमारे चिर-संचित सांस्कृतिक तत्वों और सामाजिक मनोविज्ञान की सबसे बड़ी भूमिका थी और इस कसौटी पर भारतीय समाज का एक मज़बूत पक्ष उभरा है। हमने पहले ही कहा है कि “महामारी का यह मनोविज्ञान भी दोमुँहा होता है – एक ‘महामारी के ख़ौफ़’ का मनोविज्ञान  और दूसरा ‘ख़ौफ़ के मनोविज्ञान’ की महामारी! सौभाग्य से, भारतीय समाज के जीवट ने इस मनोविज्ञान को अपने पर हावी नहीं होने दिया है। ये आपदाएँ जान-माल की बर्बादी तो करती  ही हैं, सबसे ज़्यादा इनका असर हौसलों पर होता है, जिसे भारतीय समाज ने बहुत हद तक बचा रखा है। सदियों के अनुभव ने इस मामले में उसे अब काफ़ी ‘प्रफ़ेशनल’ बना दिया है। भारतीय जनता पहले एक सामजिक जीव है, फिर एक आर्थिक शरीर!”
                    भारतीय समाज ने परिस्थितियों के साथ जिस धैर्य और कुशलता से अपने को ढाला है, उसने एक नए आयाम ‘लॉक-डाउन के सामाजिक मनोविज्ञान’ का उद्घाटन किया है, जो न केवल मानव-व्यवहार के उद्भव और क्रमगत विकास की कड़ी में एक नया अध्याय है, बल्कि इसका सांगोपांग अवलोकन और अध्ययन आधुनिक समाजशास्त्रियों और समाज मनोवैज्ञानिकों के लिए बड़ा रोचक भी है। इसमें कहीं हमारे श्रमिक भाइयों द्वारा  इस ‘ताले’ को खोलने की छटपटाहट भी दिखी तो वह अपनों से जुड़ने की तड़प थी, न कि उसके पीछे कोई नकारात्मक तत्व! और, इस तड़प का उत्स भी हमारी सामाजिक भावनाओं के गर्भ में ही सुरक्षित है। परिस्थिति की गम्भीरता और   भारतीय जनसंख्या के आकार और प्रकार  के आलोक में यह कोई अप्रत्याशित अवसर भी नहीं था। थोड़ी देर से ही सही, उनकी छटपटाहट ने संवेदना के जिस ज्वार को आंदोलित किया और जिस तत्परता से समाज और सरकार ने उनकी समस्यायों के त्वरित निदान में अपना हाथ बढ़ाया, यह भी भारतीय समाज के संवेदना मूलक सांस्कृतिक पक्ष के घनत्व और मज़बूती को इंगित करता है। भीषण से भीषण झंझवातों को सह लेने और परिवर्तनों को, बिना अपना मौलिक स्वरूप खोए, आत्मसात करने की क्षमता भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता है। यह क्षमता इसे क़ुदरत ने कैसे दी है, इसका ज़िक्र तो पहले किया ही जा चुका है, साथ ही, इतिहास भी काल-प्रवाह के भिन्न-भिन्न खंडों में ऐसे अनवरत झटकों से इसकी झोली भरता रहा है। बाहरी सभ्यताओं के आक्रमण  और लम्बे काल की विदेशी ग़ुलामी की विभीषिकाओं की अग्नि में भी तपकर इस समाज की सुवर्ण-संस्कृति लोकतंत्र का कुंदन बनकर ही दमकी और इसने सभी सभ्यताओं का आलिंगन कर उसे अपनी संस्कृति की वृहत धारा में घुला लिया और एक सर्वग्राही  भारतीय समाज अपनी अलग पहचान बनकर उभरा। यह विरासत में प्राप्त इस समाज की शक्ति है कि यह अब चुनौतियों में भी अवसर तलाशने लगी है और आधुनिकताओं को अपनी अपरंपार परम्पराओं में विलीन कर ‘नव-परंपरावाद’ का एक नया वितान तान रही है। यहीं इसका सनातन होना है।
                     समाज के एक बड़े शहरी  तबके ने ‘लॉक-डाउन’ को ‘बोरियत की समस्या’ के रूप में उभारकर मानों महामारी के आतंक और उसकी भयावहता को ठेंगा दिखा दिया हो! इस संकट काल में अपने स्वभाव के विनोद-प्रिय पक्ष का आलम्ब समाज के स्वस्थ मनोविज्ञान का परिचायक है। जनमत के अद्भुत जीवट के सामने ‘संशयवादियों ‘ की आलोचना की तमाम तिकड़में दम तोड़ती नज़र आ रही हैं। यह दम तोड़ना भी समाज-निर्माण में उनकी प्रकार्यात्मक भूमिका का ही  हिस्सा है। इसमें कोई संशय नहीं कि आलोचनाएँ विमर्श का एक ज़रूरी हिस्सा हैं, लेकिन कब?  तब, जब वह समाधान के लिए और समाधान के साथ प्रस्तुत की जाती हों! आप सिर्फ़ खोट निकालते रहें हर बात पर, और अपनी ओर से समाधान का कोई तार्किक प्रस्ताव प्रस्तुत न करें तो आपकी आलोचनाएँ अपनी  धार खो देती हैं। ध्यातव्य है, यह समाज सूचना क्रांति का समाज है और यह पीढ़ी साइबर युग में कुलाँचे भरने वाली पीढ़ी है। इसलिए अब विमर्श का स्वरूप भी  वस्तुनिष्ठ  निकष पर समाधान की तार्किक परिणती की ओर अग्रसर है न कि, बहस मात्र के लिए दलीलें पेश करने  की बाज़ीगरी! किसी ठोस समाधान को सुझाने की जगह पर व्यवहार के धरातल से दूर केवल सिद्धांत मूलक सवालों से भरी शिकायतों की अतिशयता एक मनोवैज्ञानिक विकार की आकृति में आपको  विश्वसनीयता की परिधि से बाहर धकेल देती  हैं और आप अप्रासंगिक होने लगते हैं। 
                     २१वीं सदी की पीढ़ी का यह भारतीय समाज अब आपसे कथनी  और करनी में सामंजस्य की अपेक्षा रखता है। आप उसे बचपन से बड़े होने तक सत्य, ईमानदारी और आदर्शों की बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ाते रहें और अपनी नौकरी का नियुक्ति पत्र लेकर जब आशीष लेने आपका चरण-स्पर्श करने पहुँचे तो आपका उससे पहला सवाल  - ‘इस नौकरी में कोई ऊपरी आमदनी है कि  नहीं ‘- आपके प्रति उसके मन में बनी अबतक की छवि और चरित्र के इस दुहरेपन के ख़िलाफ़ एक गहरा क्षोभ उत्पन्न कर देता है और विरसता तथा विद्रोह के भाव से वह भर उठता है। नयी पीढ़ी का समाज ज़्यादा व्यावहारिक है और बदली स्थितियों से अपना संतुलन बैठाने में ज़्यादा  ‘प्रफ़ेशनल’ है। लॉक-डाउन में उसके व्यवहार का यह आयाम ज़्यादा सकारात्मक होकर उभरा है। इसीलिए उसकी चौपाल ‘सोशल मीडिया’ में दैनिक चर्चाओं के चरित्र ने एक नयी चटपटी चाल पकड़ ली है। जनता महामारी से लड़ने वाले अपने योद्धाओं को पूरा सहयोग और समर्थन दे रही है। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर अपने लॉक-डाउन को कैसे स्वस्थ ढंग से व्यतीत करें, इस पर  सार्थक, मनोरंजक और  चटपटी चर्चायें  कर रही है। सोशल-डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए अपने घरों में सिमटे लोग मनोवैज्ञानिक स्तर पर तनिक भी हारे हुए महसूस नहीं कर रहे हैं। सोशल मीडिया की चौपाल पर समाज से वे पूरी तरह जुड़े हुए हैं। रोज़-रोज़ की दौड़-धूप और आपा-धापी  में जहाँ एक दूसरे की सुध लेने की मोहलत नहीं थी, वहाँ अब फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है। साथ देने के लिए फ़ोन, फ़ेसबुक, व्हाटसप , ट्विटर, ब्लॉग सब कुछ पड़ा है सामने! दुर्गति तो उलटे उनकी हो रही है जो अबतक ‘बहुत व्यस्त हैं’ का तमग़ा लटकाकर समाज से मुँह चुराते फिर रहे थे।
                    परिवार इस दुनिया की सबसे पुरातन और सनातन संस्था है जिससे व्यक्ति का जनमते ही सबसे पहला परिचय होता है। सामाजिक जीवन की सर्वोत्तम पाठशाला भी परिवार ही है। परिवार ही वह स्थल है, जहाँ व्यक्ति  मानवता और नागरिकता का पहला पाठ पढ़ता है, जहाँ उसमें  सुख-दुःख, हर्ष-विषाद जैसे समस्त भावों का बीजारोपन होता है, जहाँ वह अपने सदस्यों के साथ अपनी भावनाएँ बाँटता है, जहाँ  वह हँसना और रोना सीखता है और जो उसकी सुरक्षा का सबसे पहला और अंतिम आश्रय होता है। यहीं से वह एक नए परिवार के निर्माण की सतत संस्कृति के यज्ञ का सम्पादन करता है। इधर तेज़ी से बढ़ते व्यावसायिक माहौल  के प्रबल आघात से सामाजिक जीवन की यह सर्वोत्तम  पाठशाला चरमराती और बिखरती-सी लग रही थी। लेकिन लॉक-डाउन में आज अपने परिवार में ‘लॉक’ होकर व्यक्ति फिर से उन चिर संचित  पारिवारिक भावनाओं और मूल्यों को ‘अनलॉक’ करने लगा है। महामारी से इस संघर्ष ने परिवार की इस संस्था के सार्वभौमिक सत्य को फिर से रेखांकित कर दिया है। आज परिवार फिर से जी उठा है। परिवार और परिवार में व्यक्ति का व्यक्ति से भावनात्मक बंधन मनुष्य को मिला एक दैवीय उपहार है जो उसे सामाजिक जीवन जीने का रस देता है। इस अवधि में बीते लोक-पर्वों को जिस सादगी और गरिमा से उसने बिताया है, इससे न केवल परिवार के संस्कार  पुष्ट हुए हैं, बल्कि लोक-आस्था  भी समृद्ध हुई है और तेज़ी से अपनी मौलिकता खोते जा रहे त्योहारों ने फिर से अपना लोक रंग प्राप्त कर लिया है। परिवार के वरिष्ठ जन अपनी नयी पीढ़ी से सतत सम्पर्क में आए हैं।  इन बंद दिनों में परिवार के लोग आपस में जिस तरह से खुले हैं और उनके दिलों में  जिस प्रगाढ़ता से पारिवारिक मूल्यों का भावनात्मक रोपण हुआ है, उस आधार पर हम इसे  ‘लॉक-डाउन’ कम और ‘घरवास’ ज़्यादा कह सकते  हैं। सही मायने में यह भारतीय समाज का ‘घरवास’ है। परिवार की घर वापसी हुई है। किसी कारण से जो  प्राणी अपने परिवार से अलग भी छूट  गया है, भावनाओं के स्तर पर उसमें पारिवारिक निकटता की प्यास ज़्यादा उजागर होने लगी है। कुल मिलाकर लोग मकानों से वापस अपने घर में  लौट गए हैं। साथ हँसना, साथ रोना, साथ बर्तन माँजना, साथ झाड़ू-पोंछा देना, साथ खाना, साथ पीना और साथ जीना यहीं दिनचर्या है – इस घरवास की!...................क्रमशः………….