Saturday, 10 October 2026

भौचक्का-सा (लघु कथा)


 


“हमारी पौराणिक कथाओं में न केवल समयुगीन समाज का चित्र तैरता है, प्रत्युत, आनेवाले युग की आहट भी सुनायी देती है। एक बड़ी रोचक किंवदंती आती है, राम-कथा में। राम  वनगमन हेतु महल से बाहर निकलते हैं। साथ में सीता और लक्ष्मण हैं। पीछे-पीछे पूरी अयोध्या लग जाती है। अयोध्या का करुण- विलाप दिल को दहला देने वाला है। राम के साथ कलपती अयोध्या सरयू तट तक आती है। राम आग्रह करते हैं लौट जाने को, ‘हे अयोध्या के समस्त नर और नारी! आपसे सविनय आग्रह है कि आप  वापस अपने घरों में लौट जाएँ। हम अपनी वनवास अवधि पूरी कर आपके श्री चरणों में पुनः उपस्थित होंगे’। विरह-व्यथा-विगलित नर-नारी अपने राम की बात मान  लेते हैं। सीता और लक्ष्मण के साथ राम सरयू पार कर अपने वनवास की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। 
चौदह वर्षों के पश्चात राम वापस अयोध्या आते हैं। अयोध्या की ओर सरयू के तट पर अभी भी कुछ प्राणी गत चौदह वर्षों से उनकी वापसी की आँख गड़ाए अनवरत उनकी प्रतीक्षा में रत पाए जाते हैं।  भगवान राम का चित्त उनके दुर्धर्ष त्याग और अप्रतिम भक्ति से विहवल हो उठता है। उनकी वाणी में करुणा छलकती है। ‘हे प्राणी-गौरव! आप क्यों रुके रहे? हमने तो आप सब से अयोध्या अपने घर लौट जाने की अनुनय याचना की थी’!
‘हे रघु कुल तिलक! आपका आग्रह तो अयोध्या के नर और नारियों से ही था। हम तो न नर ठहरे न नारी! इन दोनों समूहों से बाहर है। भला, हम कैसे लौट पाते’। भक्ति-भाव से आर्द्र उत्तर आया।
अब भगवान राम वर देने की मुद्रा में आ गए, ‘हे प्राणियों में श्रेष्ठ!  इस भूमि पर भविष्य में  कलियुग का अवतरण  होगा। इक्कीसवी  शताब्दी में आर्यावर्त अपने लोकतंत्र का अमृत महोत्सव मनाएगा। उस समय जब यहाँ की वायु में  ‘श्रेष्ठ भारत’ के स्वर तैरने का समय आएगा तो उस भारत के समकालीन राजनीतिक दलों में आपका ही प्रभुत्व होगा। क्या पक्ष, क्या विपक्ष! क्या ‘भक्त’, क्या ‘विभक्त’! क्या रक्त, क्या अनुरक्त! क्या ‘स्थितप्रज्ञ’, क्या ‘आसक्त’! राजनीतिक दलों  के हर वर्ण की ध्वजा के वाहक आप ही होंगे। राजनीतिक दल ही आपके आश्रय होंगे और आप ही राजनीतिक दलों के आश्रय होंगे। समस्त राजनीतिक दलों में आपकी ही संख्या और प्रभुता का बाहुल्य होगा। आप दो दलों में बटेंगे। एक शासक और एक नाशक। एक धरना देगा। दूसरा आम जन-जीवन बंद कर देगा। एक रास्ता बंद कर देगा, दूसरा यातायात के साधन। आपका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकेगा। यदि मरना भी हो तो मरेगी बात मानने वाली जनता ही। आप दोनों राजनीतिक दल, पक्ष और विपक्ष, बारी-बारी से अपने दायित्वों की अदला-बदली करते रहेंगे। जनता की शव-यात्रा में आप बारी-बारी से कन्धा बदलते रहेंगे। अमृत काल में जनता के मृत-उत्सव का आपका यह  आयोजन अत्यंत गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक होगा।‘
अयोध्या का सरयू तट भगवान के इस वर के उन्माद में गूँज उठा, ‘जय श्री राम’! -सुत जी नैमिषारण्य में कथा बाँच रहे थे।”
आकाशवाणी से प्रसारित महालय के मंत्रोच्चार से मेरी नींद टूट गयी थी। सामने अख़बार का यह मुखड़ा मैं  भौचक्का-सा निहार रहा था।