Saturday, 18 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र – ८ (Corona and the Sociology of India - 8)


(भाग – ७ से आगे)



सामुदायिक जीवन जीने की तड़प व्यक्ति में न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का हेतु है, प्रत्युत यह उसकी प्रकृति का निमित्त भी है। मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। प्रतिकूल परिस्थितियों में तो उसकी अपनी भावना पूर्णरूपेण समुदाय से एकाकार हो जाती है क्योंकि समाज का  सान्निध्य ही  उसे सुरक्षा की छतरी का मनोवैज्ञानिक अहसास देता है। समाज के अस्तित्व में ही उसे अपनी  भौतिक सत्ता की प्रतिछवि दिखायी देती है और सामुदायिक चेतना में उसे अपनी चेतना की प्रतिध्वनि सुनायी देती है। महामारी सारे समाज का शत्रु है। सबका दुश्मन एक – ‘महामारी’। सबकी रणनीति का एक ही केंद्र बिंदु – ‘महामारी’। इस शत्रु का जो भी शत्रु, उसका मित्र, और जो भी मित्र,  उसका शत्रु! यह भावना समाज के प्रत्येक जन में हिलोरे ले रही हैं और विदेश से इस धरती पर आयी इस बीमारी ने सबके मन में देश भक्ति का एक अद्भुत उफान उत्पन्न कर दिया है। देशभक्ति का यह उफान महज़ भावनाओं का उफनता दूध नहीं है बल्कि प्रशांत महासागर-से गम्भीर मानस की तलहटी में मानव सृष्टि को बचाने हेतु दुर्जेय प्रण की प्रकंपित  सुनामी से उद्भूत भीषण ज्वार है। उसके अंदर के अति-व्यक्तिवाद ने समाजवाद के समक्ष घुटने टेक दिए हैं और अब वह अपनी आत्मा का विस्तार समाज के समस्त प्राणियों की आत्मा में देख रहा है। बाज़ार  की संस्कृति सिकुड़ रही है और महामारी-मुक्त मुल्क  की चाहत विस्तार ले रही है।
                 यहाँ तक कि लोकबंदी के इस ऐकान्तिक घरवास में धर्म का मर्म भी अपने कर्म-कांडी कलेवर के छिलके उतारकर आध्यात्मिक अवतार में निखर रहा है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजा सबके दरवाज़े बंद हो गए हैं और अस्पताल के दरवाज़े खुल गए हैं। डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन – ईश्वर  के ये नए अवतार अपनी उपस्थिति से उद्विग्न मानव मन को जीवन का सुधा पान करा रहे हैं। कल्याण की कामना ही धर्म है। जहाँ भी इस कामना का अभाव है, बस अधर्म ही अधर्म है। धर्म के नाम पर बहुत तांडव हो चुका। अब इस क़यामत के काल में उसे धर्म का सीधा साक्षात्कार हो रहा है। कोरोना घनघोर काल-वृक्ष बन पीपल की तरह खड़ा  है और उसके नीचे आकर उसे बोधिसत्व की प्राप्ति हो गयी है। ‘सेवा परमो धर्म:’ ‘परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम’ बस यही धर्म है। बाक़ी सब जमात है। स्वास्थ्य-सेवाओं के प्रति भी उसका आग्रह अब बढ़  गया है। स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना में अब आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। महामारी की यह चुनौती ही अब अवसर बन कर आयी है। नौकरशाही की सारी सामंती मान्यताएँ समाज के इस नवजागृत ‘कलेक्टिव-कोंसेंस’ के सामने दम तोड़ रही हैं। शासकीय व्यवहार में पारदर्शिता और शुचिता का आग्रह जाग उठा है। वैज्ञानिक परिहार्यताओं के समक्ष प्रशासनिक जड़ता घुटने टेकने लगी है। महामारी के इस झटके ने नौकरशाही के आडंबरों को ख़ारिज कर तंत्र को डिजिटल राह पर धकेल दिया है। भौतिक स्पर्श से परहेज़ हेतु अब मुद्रा का विनिमय-व्यापार भी ‘डिजिटल मोड’ में आ गया है। टेली-मेडिसिन और टेली-कॉनफेरेंसिंग का प्रचलन  शुरू हो गया है। इस रीति से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के रयुमेटोलौजी विभाग के डॉक्टर रूद्र के द्वारा पुणे की रेणु को दी गयी मेडिकल सेवा ट्विटर पर चर्चा का विषय बनी। यह आगे के दिनों में मेडिकल के क्षेत्र में आने  वाली  नयी क्रांति की सुगबुगाहट  है।
                  ‘आइसोलेशन’ और ‘क्वारंटाइन’ को भी सुगम और सरल बनाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। कहते है कि १९वीं शताब्दी में फैली प्लेग की महामारी के दौरान जितनी जानें प्लेग ने लीली, उससे कम क्वारंटाइन ने नहीं खायीं। महामारी से ज़्यादा त्रासद होते  थे ये! प्रसिद्ध साहित्यकार राजेंद्र सिंह बेदी ने अपनी एक प्रसिद्ध कहानी ‘क्वारंटीन’ में इसका चित्र खिंचा है : -
“प्लेग तो ख़तरनाक था ही, मगर क्वारंटीन उससे भी ज़्यादा ख़ौफ़नाक थे। लोग प्लेग से उतने परेशान नहीं थे, जितने क्वारंटीन से और यहीं वजह थी कि स्वास्थ्य सुरक्षा विभाग ने नागरिकों को चूहों से बचाने का हिदायत करने के लिए बड़े आदमकद विज्ञापन छपवाकर दरवाज़ों, सड़कों और गलियों में लगाया था। उस पर ‘न चूहा, न प्लेग'  के शीर्षक में इज़ाफ़ा करते हुए ‘न प्लेग, न चूहा, न क्वारंटीन’ लिखा था। “ यह साबित करता है कि  मानसिक अवसाद के कारकों में क्वारंटीन अपना एक अलग स्थान रखता है। इसकी एक झलकी दिलशाद गार्डेन,  दिल्ली के मुहल्ला क्लीनिक में डॉक्टर गोपाल झा द्वारा अपने संक्रमण काल में अपने मित्रों को ‘आइसोलेशन’ से भेजे गए मार्मिक वहट्टसप्प संदेश से मिलती है। अब 'वर्चूअल रीऐलिटी' (आभासी वास्तविकता) की तकनीक से आइसोलेशन और क्वारंटीन के मनोविज्ञान पर शोध कर इसे रोगी के अनुकूल और ‘यूज़र-फ़्रेंड्ली’ बनाने की दिशा में काम हो रहा है।
                    संक्रमण की शृंखला को तोड़ने के लिए लोकबंदी (लॉक-डाउन) की इस मुहिम से समाज को अन्य ढेर मोर्चों पर भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है। अर्थतंत्र बिलकुल तबाह-सा हो गया है। बहुत सारे लोग अपने काम के सिलसिले में अस्थायी ठिकानों पर फँसे रह गए। उत्पादन इकाइयाँ बंद हो गयीं। लोग भारी मात्रा में बेरोज़गार हो गए। कोरोना से संघर्ष में अन्य रोगों के लिए अस्पताल की सेवाएँ बंद हो गयीं। कैन्सर, दिल की बीमारी और  मस्तिष्क-आघात जैसी जानलेवा बीमारियों के मरीज़ निस्सहाय-से हो गए।  असंगठित क्षेत्र के दैनिक भोगी कर्मकार, मज़दूर, निजी विद्यालयों के शिक्षक और दिन भर की अपनी दुकानदारी से परिवार का पेट भरने वाले खोमचे वाले, ठेले वाले, दुकानदार, मोटर और साइकल रिक्शा चालक, बस और ट्रक के ड्राइवर भीषण आर्थिक संकट में फँस गए हैं। निम्न मध्यम वर्ग के कामगारों की एक विशाल संख्या है जो दस से पच्चीस हज़ार की मासिक आमदनी की नौकरी निजी क्षेत्रों में करने के लिए शहरों  में टिकी  हुई  हैं। इनकी स्थिति त्रिशंकु-सी हो गयी है। इन्हें न तो मज़दूरों वाली सुविधा मिल रही है, और न इनकी नौकरी के सुनिश्चित होने के आसार ही दिख रहे हैं।
                  सारी दुनिया की एक तिहाई आबादी लोकबंदी में घरवास कर रही है। अर्थतंत्र विश्राम की अवस्था में है। इतिहास की सबसे बड़ी मंदी दुनिया के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। पिछले साठ सालों में पहली बार एशिया के देशों की आर्थिक वृद्धि दर शून्य पर होने की तलवार लटक रही है। ऐसे तो आजकल आँकड़े भी विचारधारा की कोख से जनमते हैं। इसलिए किसी आँकड़े का सहारा न लेकर भी हम अर्थतंत्र की तबाही को  पूरी तरह से महसूस करने लगे हैं। जब अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की माली हालत ख़स्ता हो गयी है तो बाक़ी का क्या कहना! बाज़ार में ज़रूरी सामानों की कमी की आशंका के आतंक में ‘परचेज-पैनिक’ का लोग शिकार होने लगे हैं और भंडार करने की प्रवृति में सामान बाज़ार से ग़ायब होने लगे हैं। स्थिति को भाँपकर जमाखोरों ने मूल्य को ऊपर उछाल दिया है। इससे ज़रूरी सामानों की आपूर्ति का संकट गहराने लगा है। सिनेमा उद्योग थम गया है। खेल-कूद के बड़े आयोजन रद्द हो गए हैं। दूरदर्शन पर कार्यक्रमों और धारावाहिकों के निर्माण में शिथिलता आ गयी है। प्रकाशन का कारोबार बंद है। छोटे अख़बार दम तोड़ रहे हैं। आन-लाइन खाद्य और भोज्य-पदार्थों की विक्री बंद हो गयी है। होटल और रेस्तराँ वीरान पड़े हैं। पर्यटन उद्योग बंद है। रेल, सड़क और वायु परिवहन रोक दिए गए हैं। विज्ञान और तकनीक के उन्नत शोध संसधान भी बुरी तरह प्रभावित हैं। कोरोना ने उनकी सारी गतिविधियों पर ताला जड़ दिया है। शोध कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान के सारे कार्य रोक दिए गए हैं। यहाँ तक कि  सदाबहार जुए  के अड्डे बियाबान  हो गए हैं तथा चिरहरित सट्टेबाज़ी के धंधे भी अंतिम साँस गिन रहे हैं।
                     लोग घरों में घुस गए हैं और जंगली जानवर सड़कों पर आ गए हैं। चिरई-चिरगुन और जानवरों के खाने-पीने पर आफ़त आ गयी है। सड़कों के किनारे ढाबे, होटल बंद होने से कुत्तों को बहुत जगह भरपेट खाना नहीं मिल रहा है। कसाईखानों के बंद हो जाने से गिद्धों को आहार नहीं मिल पा रहा है। कोरोना वाइरस के चमगादड़ से जन्म लेने की सूचना ने मनुष्य  को पक्षियों और जानवरों के प्रति शंकालु बना दिया है और अब वे अपने ही पालतू जानवरों से भी कन्नी काटने लगे हैं। कोरोना के आक्रमण  ने मानव-व्यवहार के स्तर पर परिवर्तन के कुछ नए बीज डालने शुरू कर दिए हैं। ये परिवर्तन आने वाले समाज को किस दिशा में ले जाएँगे, यह समय ही बतलाएगा!..................................क्रमश: ………………

8 comments:

  1. "कल्याण की कामना ही धर्म है" अगर ये बात कुछ धर्माँधों के भी घुस जाये तो कुछ बात बने। बढ़िया जा रहे हैं।

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  2. आदरणीय विश्वमोहन जी . कोरोना संकट काल में धर्म - आध्यात्म पर सारगर्भित विचारों से युक्त आपके लेख को पढकर बहुत अच्छा लग रहा है | लोकबंदी के दौरान दुर्घटनाओं और . आत्महत्याओं में कमी के साथ प्रदूषण का घटता स्तर सुखद लग रहा है। भागतीदौड़ती जिन्दगी खुलकर साँस ले रही है | साथ में रोचक है -- सुबह -सुबह शोर प्रदुषण में अपना अतुलनीय योगदान देने वाले -- धर्म स्थानों पर मौज कूट रहे कथित धर्मावलम्बियों की जमात , ना जाने किसे मांद में जाकर छिप गयी है| --- होई हैं वहीँ जो राम रचि राखा पर -- उन्हें आज कतई विश्वास नहीं हो रहा | वे कोरोना से इतना भयाक्रांत हो गये हैं कि उनके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं | जिन्हें ना किसी बीमार की चिंता , ना परीक्षा काल में छात्रों के भविष्य की चिंता थी | जो बस लाउड स्पीकर में भजनों के द्वारा- भीषण हाहाकार को ही धर्म की शक्ति मानते थे - आज मौन हैं | |कथित उपदेशक बाबा लोग तो अदृश्य से होगये हैं | उन्हें ये कैसा सदमा लगा - समझ नहीं आता | पर उस अनचाहे शोर से मुक्ति ने आमजन की नींद को बहुत मधुर बना दिया है तो एकाग्रता को बढ़ा दिया है | इस संकटकाल में गोस्वामी जी की मानव धर्म की महिमा बढ़ाती दूसरी उक्ति गली- गली . कूचे -कूचे चरितार्थ हो रही है | ---- परहित सरस धर्म नहीं भाई -- को निभाते चिकित्सक , और अन्य कोरोना योद्धा , मानवता और सद्भावना के शांति दूत बनकर आमजन की आँखों के तारे बने हुए हैं और दुनिया को समझा रहे हैं कि यही है सच्चा धर्म - | निस्वार्थ कर्म जो केवल और केवल मानवता को समर्पित है जिसमें त्याग भी है , सद्भावना भी है | हो सकता है कोरोना की महामारी लोगों को ये जरुर समझा दे कि सच्चे धर्म की परिभाषा क्या है | लोक बंदी में उनकी चिंतन शक्ति को विस्तार मिल रहा है | स्वहित और जनहित में ये एकांतवास एक समाधि सरीखा है |आपके व्यापक चितन से उपजे लेख भी इसी का प्रतीक हैं | एक और सार्थक लेख के लिए साधुवाद | हाँ पशुओं की व्यथा कथा मन को उद्वेलित करती है । सादर🙏🙏

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    1. जी, आपकी समिक्षाएँ सर्वदा हमारे लेखन का आलम्ब रही हैं। आपने बहुत सरल शब्दों में मेरी बातों का गाहन विस्तार दिया है। आपके उत्साह जनक शब्दों का हृदय से आभार।

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  3. " कल्याण की कामना ही धर्म है। जहाँ भी इस कामना का अभाव है, बस अधर्म ही अधर्म है। धर्म के नाम पर बहुत तांडव हो चुका। अब इस क़यामत के काल में उसे धर्म का सीधा साक्षात्कार हो रहा है।" बिलकुल सही विश्लेषण ,सादर नमन आपको

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    1. जी, अत्यंत आभार आपके आशीष का!

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  4. वाह!!बहुत ही सुंदर व सामयिक ..आज पूरा पढकर ही दम लेना है ।
    लोगों की भागती -दौडती जिंदगी पर विराम लगा दिया है इस महामारी नें ।जहाँ सुबह होते ही वाहनों की कतारें लगनी शुरू हो जाती थी ,एक कार में एक व्यक्ति ...। घरती माँ भी अब थोडा अच्छा महसूस कर रही होगी ..कितना बोझ सहती आखिर ...।
    अब तो डॉक्टर ,पुलिस और अन्य सेवभावी लोग ही ईश्वर स्वरूप हैं ..। कबीर जी ने़ कहा है न ..ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काशी कैलाश में ....मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे 🙏

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    1. आपकी अध्ययनशीलता को नमन। अत्यंत आभार।

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