Saturday, 4 April 2020

कोरोना और भारत का समाजशास्त्र -१ (Corona and the Sociology of India - 1)




चीन के एक शहर हुआन में जन्मे वाइरस ने एक नयी प्राण घातक बीमारी ‘कोरोना’ की दस्तक दे दी है जो अत्यंत तीव्र वेग से इस भूमंडल के बड़े भूभाग को लीलता जा रहा है। हालाँकि, जन्मदाता चीन ने अपने यहाँ कथित तौर पर इस पर विजय पा ली है, किंतु स्पेन, इटली, फ़्रान्स, जर्मनी, ब्रिटेन एवं अमेरिका सहित एक बहुत बड़े क्षेत्र में सुरसा की भाँति मुँह फैलाए यह बीमारी लोगों को मौत का ग्रास बनाती चली जा रही है। अपनी राजनीतिक व्यवस्था के विलक्षण चाल और चरित्र के आलोक में चीन की बातों पर दुनिया को विश्वास नहीं है। सम्भवतः, भविष्य में उस पर दुनिया में विस्तृत विवेचना और अन्वेषण भी  हो, किंतु आज के परिदृश्य में अभी सम्पूर्ण मानव जाति अपने मिटते वजूद को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। अबतक पचास से साठ हज़ार लोग काल कवलित हो चुके हैं और यह संख्या दिन दोगुणी रात चौगुनी की गति से बढ़ती जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने तो यहाँ तक  आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि अकेले उनके देश में यह संख्या दो लाख के पार जा सकती है।
ऐसी स्थिति में भारत में भी पैर पसारती नज़र आती इस बीमारी पर चौकन्ना होना स्वाभाविक है।  भारत सरकार ने बड़ी तेज़ी से सतर्कता दिखाते हुए इस बीमारी की रोकथाम के लिए क़दम उठाए हैं। चूँकि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की आधारभूत संरचना अभी तक इस बीमारी से जूझते अन्य विकसित देशों की तुलना में काफ़ी पीछे है, ऐसी स्थिति में सरकार ने ‘रोकथाम इलाज से बेहतर’ की रणनीति को प्राथमिकता दी है और ऐसा उचित भी है।

इसके तहत सरकार ने कई चरणों में युद्ध-स्तर पर अपने रोकथाम कार्यक्रम को लागू किया है। सबसे पहले चरण में विदेशों से आने वाले यात्रियों और अपने देश में संक्रमित नागरिकों  की जाँच, बीमारी के लक्षण पाए जाने पर उन्हें अलग से ‘आयसोलेशन’ और ‘क्वारंटाइन’ में पृथक रखने की व्यवस्था की गयी है। फिर, एक दिन का जनता-कर्फ़्यू लागू किया गया। एक दिन शाम को समस्त देशवासियों ने अपने-अपने घरों में ही रहकर इस बीमारी से लड़ने वाले स्वास्थ्य-कर्मियों, डॉक्टरों, पुलिस कर्मियों, सफ़ाई-कर्मियों और आवश्यक सेवा से जुड़े लोगों के प्रति घंटी, शंख, थाली आदि बजाकर अपने आभार व्यक्त किए। हालाँकि, कुछ भ्रमित तत्व उत्साह के अतिरेक में बाहर झुंड में निकलते भी देखे गए जो इस कार्यक्रम में निहित उद्देश्यों के  प्रतिकूल था। उसके तुरंत बाद सम्पूर्ण देश में ‘लॉकडाउन’ आज़मायिशी तौर पर २१ दिनों के लिए घोषित कर दिया गया। इस घोषणा के पूर्व प्रधान मंत्री ने इसके उद्देश्यों और कार्यान्वयन  की विधि पर प्रकाश डाला और जनता से सहयोग की अपील की।

भारत मूलतः प्राचीन संस्कारों से शोभित सनातन परम्पराओं वाला देश है। संयुक्त परिवार की प्रणाली इसकी मौलिक पहचान रही है। सामुदायिक संवेदना और वसुधैव कूटुंबकम की भावना का रुधिर इसकी धमनियों में प्रवाहित होता है। अपने-पराए की क्षुद्र भावना से अछूता रहकर ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ का सुवास  इस माटी की संस्कृति में सदा सुवासित होते रहा है। हमारे मूल्यों की जड़ें इतने गहरे तक जमी हैं कि हज़ारों वर्षों के अनवरत आक्रमण और प्रहार के पश्चात भी कोई बाहरी सभ्यता हमारी मूल संस्कृति को गहरे तक जाकर पराजित नहीं कर पायी। हाँ, सभ्यताओं के वस्त्र फ़ैशन में ढलते ज़रूर रहे, किंतु संस्कृति का कलेवर अक्षुण रहा। औद्योगिक क्रांति ने समाज के संयुक्त परिवार की संरचना को तोड़ा ज़रूर, किंतु संयुक्तता की भावना को झकझोर नहीं पायी। इसलिए  तथाकथित ‘तर्कवादियों’ के लाख जुमलों के बावजूद भी थाली पिटने और शंख बजाने में भारत के अवाम ने बढ़ चढ़कर यदि योगदान दिया तो इसके मूल में भारतीयों के उन्ही 'एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होने ' की सामाजिक भावना का संस्कार ज़्यादा था,  न कि कोई अंधानुकरण या दक़ियानूसी भाव !
अब हम इस लेख को आगे बढ़ाने से पूर्व थोड़ा इस देश के समाज को जकड़ी और दिन-पर-दिन जकड़ती जा रही धार्मिक संकीर्णता,  साम्प्रदायिक कट्टरता और कठमुल्लापन बनाम तर्क-विद्या की समस्त युक्तियों का अतिक्रमण करती ‘अतितर्कवादिता’  की व्याधि का शिकार बने कुछ आधुनिक नैयायिकों की चर्चा भी संक्षेप में कर लें। ऐसा करना इसलिए भी प्रासंगिक होगा कि ऐसी विकट स्थिति में जब हम समाज में होने वाली हलचलों का जायज़ा लेते हैं, तो समाज को गहरे तक हिला देने वाले ऐसे अवांछित तत्वों से मुँह भी तो नहीं मोड़ सकते।
तार्किक विवेचना और शास्त्रार्थ इस देश की मौलिक परम्परा रहे हैं। तब ऐसे समस्त शास्त्रार्थों का आधार दार्शनिक होता था जिसकी विषयवस्तु पदार्थवादी जगत से दूर आध्यात्मिक सरोकारों से पूर्ण होती थी। सनातन धर्म का स्वरूप आध्यात्मिक ज़्यादा था और पदार्थवादी कम। सही ढंग से यदि बोलें तो धर्म का लक्ष्य ही था इस पदार्थवादी संसार में आवागमन के चक्र से मुक्ति अर्थात मोक्ष। कालांतर में जैसे-जैसे ‘अर्थ’(पदार्थ) ‘धर्म’(आध्यात्म) पर चढ़ता गया, ‘काम’(नाएँ) प्रबल होती गयीं और ‘मोक्ष’ पीछे छूट गया। परिणाम यह हुआ कि  ‘पुरुषार्थ’ की सारी अवधारणा प्रदूषित होकर कर्मकांडीय कला में प्रवेश कर गयी। कर्मकांड की इस प्रधानता ने ढेर सारे विकारों का जन्म दिया। पंडितों की दूकान खुल गयी। कर्मकांड सम्पादन हेतु स्वघोषित पात्रों ने विकृत जन्म-आधारित कुत्सित वर्ण-व्यवस्था को जन्म दिया। समाज में वर्ण आधारित विषमता, वैमनस्य, मनुवाद आदि बीमारियों ने पाँव ज़माने शुरू किए। अंत में समाज जातियों में तितर-बितर होकर बिखरने लगा। अंधविश्वास, अशिक्षा, निरक्षरता,  धार्मिक और जातीय कट्टरता में एक कुरूप और कुतर्की समाज का ढाँचा मज़बूत होने लगा। समय आगे बढ़ता रहा और इतिहास भी ख़ुद को गढ़ता रहा। मध्य काल और मुग़ल काल के बीतते-बीतते तो भारतीय समाज के रग-रग में  धर्मांधता, साम्प्रदायिक उन्माद, जातिगत भेदभाव और कठमुल्लेपन का ज़हर फैलने लगा। ऐसी स्थिति में देश में प्रतिक्रियात्मक लहजे में एक विचारशील तबके का उदय हुआ जो उस समय के शिक्षित आभिजात्य वर्ग का अंग था और देश का नव शिक्षित वर्ग भी उससे अच्छा ख़ास प्रभावित था। यह वर्ग देश की बौद्धिकता का प्रतिनिधि वर्ग था और उसने एक क्रांति के लहजे में तत्कालीन समाज को सड़े-गले साम्प्रदायवादी विचार और व्यवहार के अंधे कूप से निकालकर तर्कवादी सोच के एक नए धरातल पर रखने का आंदोलन शुरू किया। अपनी कथनी और करनी में एकरूपता लाकर इस वर्ग ने किसी भी वस्तु को ‘आब्जेक्टिविटी’ की कसौटी पर कसकर उसे एक नवीन वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की समझ पैदा की। भारतीय समाज में उभरने वाला यह तत्व समाज के विकास का एक बड़ा शुभ शकुन बनकर उभरा, जिसने शनै:-शनै: इस देश की लोकतांत्रिक जड़ों को पुष्ट किया। 
प्रत्येक संस्था में स्वार्थ का समावेश अक्सर  उसके आदर्श को ही अपना ढाल बनाकर उसके उन तमाम मूल्यों को तार-तार कर देता है जो उस संस्था के आदर्शों के मूल में होते हैं।  धीरे-धीरे  वे  मूल्य दूषित होकर उस संस्था के ‘थीसिस’ को ‘एंटी-थीसिस’ में बदल देते हैं और फिर उसका प्रभाव प्रतिगामी होने लगता है।………………………..क्रमश:           

Tuesday, 31 March 2020

कोरोना वायरस

बनकर
धड़कन धमनियों की
रगों में रेंगती
रक्त धाराएं
और
 श्वास-उच्छवास
की सुवास
देती है
अहसास मुझे
जीने का।
टपकी दो बूंदे
पसीने की तुम्हारी।
मेरे श्रमवीर दूत!

आज पसीना आ गया
मुझे
आनंदविहार के बस अड्डे पर।
काठ मार गया मुझे,
देखकर लकवाग्रस्त
बुद्धिवीर समाज!
रोज-रोज फट पड़ने वाली
बेसुरी आवाज
हिन्दू-मुस्लिम पर।
नहीं फूटी आज!
एक भी बोली!
मर गए सारे
परजीवी, ये मुआ बुद्धिजीवी।

छुप गए सारे सियार
अपनी मांद में।
अगर पहले ही
कोई कह देता
'आओ, रहो, ठहरो
अबतक तुमने हमें खिलाया
अब हमारी भी थोड़ी खाओ।
कयामत की इस घड़ी में
इस कदर
नेह न छुड़ाओ।
अब तुम्हे
 जाने नहीं देंगे'
तो भला !

वह 'नीति-निष्ठुरवा'
नहीं न बकबकाता
''तुम्हे आने नहीं देंगे''
चलो, मेरे श्रमजीवी मित्र!
झाड़ो !
रसायन की फुहार से धुले,
अपने 'सेनिटाइज्ड' तन को।
रोज-रोज पसीने से नहाती
बदबू में पसीने के
दम घुट जाता होगा
उस निगोड़े कोरोना का!
आज तो बेरहमी की इस बारिश में
दम ही तोड़ दिया होगा उसने!

आज लगा
गरीब तू नहीं!
तू तो खुद चल पड़ा
अपना बोझ रख
अपने माथे
अग्निपथ पर।
तू तो नहीं लदा
बोझ बनकर
हवाई उड़नखटोले में!
तू तो राजसी रुधिर है
सिंचनेवाले शिराओं को
इस मुल्क और इंसानियत की !
अवाम की अमानत हो तुम!


मेरे मज़दूर भाईयों!
बचो ।
और बचाओ।
अपने
और अपनों को।
अपने से ही!
एक हो जाओ।
लेकिन,अलग-अलग होकर।
'कोरोना-डिस्टेंसिंग'!
छोड़ो आसरा।
क्रांति का झुनझुना बजाते
उन डपोरशंखी
सियासी जमातों का।

इस बार याद रखो।
नहीं भेजी
 किसी 'लिबरेशन' आर्मी ने!
' पूरब की पहली लाल किरणों' की सौगात।
उल्टे परोस दी है
अपनी कुत्सित औकात।
उपहारों की श्रृंखला में
हे सर्व हारा!
पहले
'सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम '
अथवा सार्स!
और अब
कोरोना वायरस!

Friday, 27 March 2020

नहीं रहेगा 'करोना'!

पदार्थ के प्रयोग भौतिक जगत के वे मूल सूत्र हैं जो  तथ्यों की जाँच-पड़ताल कर कार्य और कारण सिद्धांत के आलोक में प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या करते हैं। इसे ही हम भौतिक जगत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं। यहाँ हम तब तक किसी बात को नहीं मानते जब तक  प्रामाणिकता के धरातल पर अपने प्रयोगों द्वारा उसके होने की पुष्टि नहीं कर लेते। ये प्रयोग सार्वजनिक और सार्वभौमिक  होते हैं। कहने का मतलब यह है कि  प्रयोग की उस अमुक विधा को चाहे कोई भी दुहराए, परिणाम सदैव वहीं मिलेगा। हाँ, इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि  बाकी  कारक भी न बदलें! अर्थात प्रयोग का वातावरण। जैसे किस दबाव या तापमान के परिवेश में वह प्रयोग किया जा रहा है। इन कारकों का प्रयोग के प्रतिकारक और प्रतिफल दोनों की भौतिक और रासायनिक बनावट और बुनावट पर असर पड़े बिना नहीं रहता।आप नाइट्रोजन और ऑक्सिजन के  आपसी संयोग को ही देख लें। ये एक से अधिक तरीक़ों से आपस में रासायनिक संयोग कर अलग अलग यौगिक  संरचनाएँ  बना लेते हैं। किंतु, प्रकृति में घटने वाली इन घटनाओं में एक व्यवस्था ज़रूर है। रासायनिक संयोग के भी अपने ख़ास नियम होते हैं। अब यह भी ख़ास रुचि का विषय है कि  प्राकृतिक घटनाओं की यह सारी व्यवस्था भी एक अव्यवस्था  के गर्भ से ही निकलती हैं।ठीक वहीं बात जो गीता में कृष्ण  ने ' न होने' से 'होने ' का होना बताया था। ताप गतिकी का नियम (Law of thermodynamics) है कि 'ब्रह्मांड की अव्यवस्था अनवरत बढ़ोतरी की ओर अग्रसर है ( Entropy of the universe is increasing)।'  कहने का मतलब ठीक वैसा ही है जैसे कि अफ़रातफ़री के महौल में आप एक ओर एकान्त ढूँढकर अपने मन को पहले शांत करने का प्रयास करें और फिर बुद्धि-विवेक से उस माहौल से निपटने की कोई रणनीति का इजाद कर लें या करने की चेष्टा करें। यह हुई अव्यवस्था के माहौल में व्यवस्था के प्रवाह का प्रयास। यहीं इस प्रकृति के प्रत्येक परमाणु के एक दूसरे और अपने ख़ुद के प्रति व्यवहार का मूल है। स्थायित्व हेतु न्यूनतम ऊर्जा का सिद्धांत  भी यहीं है।सभी एक दूसरे और स्वयं के प्रभाव और प्रवाह में बढ़े जा रहे हैं - असंतुलन और संतुलन के द्वैत के बंधन  से शाश्वत  मुक्ति के प्रयास की छटपटाहट  में। उनका यह प्रवाह ठीक उसी महाविस्फोट  की प्रक्रिया की लय में है जिसमें एक सूक्ष्म बिंदु  महानाद की ध्वनि में फटकर इस ब्रह्मांड को आकार देती फैलती जा रही है।

हमारे मन, बुद्धि और अहंकार की अवस्था भी ठीक वैसी ही है। यह भी ऐसी अव्यवस्था और अफ़रातफ़री के माहौल में अपनी चेतन-सत्ता से मिलने को न केवल छटपटाते है, बल्कि उस दिशा में अपने सारे उपकरणों को प्रयोग में लगा देते हैं। यह प्रयोग अपने अंदर के अस्तित्व को बाहरी अस्तित्व में घोल देना होता है, जहाँ अपना -पराया कुछ नहीं होता है। सब कुछ एक जगह सिमट जाता है, अभेद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, समस्त ऊर्जा  एक साथ  चेतना में समा जाती है और अपनी आवृतियों को एक दूसरे में  घोलकर उस  'बिग-बैंग' के महानाद की आवृति के संग अनुनाद की स्थिति में आ  जाने को तत्पर हो जाती है। प्रयोग के इसी तुरीय  स्वरूप को हम प्रार्थना कहते हैं। इस प्रयोग के प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, परंतु प्रकृति सदैव सार्वजनिक और सार्वभौमिक  ही होती है। अर्थात, सूक्ष्म का विस्तार में विलय और विस्तार का सूक्ष्म में सिमट जाना। इसमें हम अपनी ऊर्जा दूसरों  की शुभकामना, दूसरों के कल्याण और अपने आस्तित्व की रक्षा के लिए दूसरों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए करते हैं।यहाँ यह दूसरा और कोई नहीं बल्कि उस परम पिता परमेश्वर का ही अभिन्न अंश है जो इस चराचर जगत सहित  हममें भी व्याप्त  है। आध्यात्मिक जगत के इसी प्रयोग का नाम  उपासना है। यह न केवल वैज्ञानिक प्रयोगों से भी ऊँचे धरातल पर अवस्थित है, जो न केवल सीधे अनुभव के स्तर पर हमें आभासित होता है, बल्कि प्रयोक्ता को  चेतना के इस उत्कर्ष का स्पर्श पाने के लिए निरंतर प्रयास भी  करने पड़ते हैं। तब जाकर वह इस प्रयोग को सम्पादित करने के संस्कार से सम्पन्न हो पाता है। उचित संस्कार के अभाव में प्रतिभा माहुर  बन जाती है। इसका सबसे प्रमुख कारक मन का  निश्छलता और बुद्धि का जागरूकता और चैतन्य के उच्चतम  बिंदु पर स्थित  रहना है। ऐसे प्रयोगों के प्रभाव का विस्तार उनके ज्ञान से उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति तक होता है।
गांधी के 'सत्य का प्रयोग' में प्रार्थना की भूमिका कुछ ऐसे ही आध्यात्मिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। आइए, उनके इस आध्यात्मिक प्रयोग अर्थात प्रार्थना  के प्रभाव की कहानी हम आपको उनके सरलतम सिपाही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में सुनाते हैं: -

" सारे देश में जहाँ-तहाँ हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे। गांधीजी इन घटनाओं से बहुत चिंतित और परेशान थे। बहुत ऊबकर उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इक्कीस दिनों का उपवास करने का निश्चय किया। महात्माजी के उपवास की ख़बर छपते ही सारे देश में बड़ी चिंता व्याप्त हो गयी। अभी-अभी वह बड़ी ख़तरनाक बीमारी से उठे थे। सब लोग, विशेषकर  डॉक्टर अंसारी - जो उनके स्वास्थ्य से अच्छी तरह परिचित थे - बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने इस निश्चय से गांधीजी को डिगाने का बहुत प्रयत्न किया। अपने प्रेम तथा अपनी डॉक्टरी  कला, दोनों का प्रयोग किया।पर गांधीजी अपने निश्चय से नहीं डिगे। अंत में वह इतने सफल हुए कि उन्होंने गांधीजी से वचन ले लिया कि  उनकी मृत्यु ही अगर इस उपवास का नतीजा होनेवाला हो, तो उस हालत में वह उपवास तोड़ डालेंगे। उपवास आरम्भ हुआ। ख़बर पाते ही मैं दिल्ली पहुँच गया। डॉक्टर अंसारी तो दिन-रात देखभाल करते ही रहे। 
उधर गांधीजी  के उपवास के दिन बीतते चले जाते थे।डॉक्टर अंसारी दिन में दो बार उनके पेशाब की जाँच करते। एक दिन अद्भुत घटना हुई। मैंने डॉक्टर अंसारी से ही सुनी। एक दिन पेशाब की जाँच करने पर उन्होंने देखा, उसमें असीटोन की मात्रा अधिक निकली! यह अच्छा लक्षण नहीं है।यदि इसकी मात्रा बढ़ जाये तो आदमी बेहोश हो जाता है। उसके बाद उस आदमी को बचाना कठिन हो जाता है। इससे वह चिंतित हुए। उन्होंने महात्माजी से कहा कि  अब आप ख़तरे के निकट पहुँचने वाले हैं और हो सकता है कि इक्कीस दिन पूरे होने के पहले ही आपको अपने वादे के अनुसार उपवास तोड़ना पड़े।
असीटोन की मात्रा बढ़ती गयी। डॉक्टर अंसारी ने निश्चय किया कि अब अधिक ठहरना बहुत ख़तरनाक होगा। उन्होंने यह बात महात्माजी से कही। आग्रह भी किया कि  अब उपवास तोड़ना चाहिए। वह डरते थे कि  कुछ ही घंटों बाद बेहोशी आ सकती है। उन्होंने यह सब कहा और खिलाने पर ज़िद की। महात्माजी ने कहा कि  आपने अपनी विद्या से सब कुछ तो देख लिया है और सब हिसाब लगा लिया है; पर रात भर मुझे छोड़ दीजिए। इस पर डॉक्टर साहब राज़ी नहीं होते थे। तब गांधीजी ने कहा क़ि  आपने सबका हिसाब तो लगाया है, पर प्रार्थना के असर का हिसाब तो लगाया ही नहीं; आज मुझे छोड़ दीजिए। डॉक्टर साहब मान गए। दूसरे दिन पेशाब की जाँच कर उन्होंने कहा कि असीटोन का अब  ख़तरा नहीं है और खिलाने का आग्रह छोड़ दिया। उसके बाद, उपवास की अवधि में, फिर कभी असीटोन का उपद्रव न हुआ। डॉक्टर अंसारी की चिंता जाती रही। उन्होंने हम लोगों से कहा कि इस चमत्कार का कोई कारण हमारी चिकित्सा नहीं बताती - हम नहीं समझ सकते, यह कैसे हुआ!
महात्माजी, उपवास की पूरी अवधि में प्रत्येक दिन, अपने नियमानुसार चरख़ा कातते रहे। उनको किसी तरह चारों ओर तकिया रखकर बिठा दिया जाता। उसी तरह बैठे-बैठे वह चरख़ा चला लेते। अंत में जब उपवास समाप्त करने का समय आया, तब प्रार्थना करके, चर्खा चलाकर और भजन गाकर, उन्होंने नारंगी का रस पीकर उपवास तोड़ा। मौलाना मुहम्मद अली ने इस अवसर पर बूचड़खाने  से एक गौ ख़रीदकर महात्माजी को भेंट की।इसमें कितना प्रेम और सद्भाव भरा था।"   

तो आज जब एक वैश्विक संकट की स्थिति मँडरा रही हो, तो इसमें प्रार्थना का महत्व और बढ़ जाता है, जन-कल्याण के लिए। चाहें मौन रहे, चाहे घंटा-घड़ियाल-शंख बजाएँ, चाहे मंत्रोच्चार करें, चाहें भजन -कीर्तन गाएँ, चाहे अजान अदा  करें, चाहे गुरुबानी को गाएँ,  जैसे भी करें - विश्व-कल्याण की आकांक्षा , ईश्वर के आशीष की कामना , इस घड़ी आपकी सेवा में लगे देवदूतों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता के भावों की अभिव्यक्ति, और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह हेतु - अपने एकान्त में आप भी प्रार्थना करो ना!
नहीं रहेगा 'करोना'।

Sunday, 26 January 2020

कदमताल

भले कुछ सिरफिरे बहेलिए
बहलाने के खातिर मन को।
फुसलाकर फंसा ले कुछ
चिड़ियों और जंगली जंतुओं को।
 करने को अपनी
 हैवानियत मालामाल
और फिर उतार ले
 उनकी खाल।
पर कर न पाएंगे कभी
 ये जंगल बेजार!
चिड़ियों की चहचहाहट
 तैरेगी ही सदा फिजा में।
होगा मंगल जंगल में
 सिंह - शावकों का ,
मृगछौनों से।

रहेगा गुलजार गुलिस्तां
पत्र कलरव से,
द्रूम - लताओ के ।
भला कैसे रुकेगी?
 नदियों की नादानी!
 जमीन पर उछलकर
पहाड़ों से,
पसार देती पानी ।
बुझाने को प्यास
अरण्य प्राणियों की।
जिसमें धोते
 कटार का खून, बहेलिए!
तो भला क्यों न सूखे नदी
 प्यास बुझाकर
इन भक्षियों की!

भले ही भक्षियों का भक्षण रहे
जारी बदस्तूर।
धरती तो धरणी है।
धरती रहेगी,
धुकधुकियों में अपनी
और रह रह कर उगलती रहेगी,
ज्वालामुखी, आक्रोश का!
डोल-डोल कर
करती रहेगी प्रकम्पित
जज़्बातों को,
जन समुदाय के रूह की।
राजपथ काँपता रहेगा
सलामी मंच के सामने,
सेना की टुकड़ी के
नुमायशी कदम ताल से!





Sunday, 19 January 2020

“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”

“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”


भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’ हमारी सनातन परम्परा के मूल से नि:सृत है। प्रारम्भ से ही हमारा सनातन दृष्टिकोण जीवन के एक ऐसे दर्शन की तलाश में रहा है जो ‘आत्मवत सर्व भूतेषु य: पश्यति स: पंडित:’ के भाव में पगा हो और जिससे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना का प्रवाह होता है। अतः हमारी अभिव्यक्ति की परम्परा के उत्स में ही इस व्यवहार दर्शन का प्राधान्य रहा जो ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’की ओर उन्मुख हो। और तो और, पारिवारिक अनुष्ठान में एक बालक नचिकेता भी अपने वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति को प्रबल स्वर देने में पीछे नहीं हटता और अपने पिता की अनैतिकता को ललकार देता है। हमारा समस्त उपनिषद दर्शन ऐसी ही वैचारिक शुचिता और अभिव्यक्ति की गरिमा के अध्यात्म का आख्यान है।
समस्त भारतीय विचार-कुल-परम्परा शास्त्रार्थ की विलक्षण विवेचना प्रणाली से विभूषित है। सारत: ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’ हमारी सनातन परम्परा में महज़ एक क़ानूनी अधिकार ही नहीं बल्कि एक विराट सांस्कारिक उत्तरदायित्व का वहन भी है जो अपना विरोध भी अपने व्यवहार की विनम्रता और विचार के चेतन स्तर पर प्रकट करता है। जहाँ दुर्दांत हत्यारे डकैत अँगुलीमाल के समक्ष बुद्ध का संयत व्यवहार और चेतना-दीप्त प्रतिवाद ‘मैं तो ठहर गया, भला तू कब ठहरेगा?’ उसके अंतर्मन को झकझोर देता है और वह डाकू ‘ठहर’ जाता है। विरोध की अभिव्यक्ति का यहीं दर्शन आर्यावर्त की धारा की उर्वरा शक्ति है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इसी अध्यात्म को स्वर दिया बापू ने अपने सत्याग्रह में राजकुमार शुक्ल के सदाग्रह पर चंपारण  में १९१७ में! अब देखिए और तुलना कीजिए इसी साल घटने वाली दो घटनाओं की। एक रूस में और दूसरी भारत के चंपारण में। रूस में भी जनता सामंती अत्याचार में त्राहि-त्राहि कर रही थी। चंपारण में भी निलहे ज़मींदार जनता का ख़ून सोख रहे थे। क्रांति की धारा दोनों धराओं पर एक साथ बही। विरोध के स्वर दोनों के आकाश में एक साथ गूँजे। किंतु कितना अंतर था दोनों में ! एक की धरती लहू से लबरेज़ थी तो दूसरे का आँगन अहिंसा के अध्यात्म से आप्लावित ! 
चंपारण की अवाम ने राजकुमार शुक्ल के नेतृत्व में अपने आंदोलन का नायक गांधी को चुना और गांधी ने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुवाद अपने सत्याग्रह में किया। सत्य और अहिंसा के अध्यात्म में चंपारण का कण-कण आंदोलन का चेतन स्वरूप बन गया और क्रूर सामंती व्यवस्था ने उसके समक्ष घुटने टेक दिए। अभिव्यक्ति की इसी दार्शनिक परम्परा का प्रवाह आगे हुआ और समस्त भारत भूमि ‘बिना खड्ग, बिना ढाल’  सिक्त होकर अंग्रेज़ी सत्ता से रिक्त हो गयी।
दूसरी ओर रूस के नायक की अभिव्यक्ति की कोख से ख़ून की धारा बहने लगी। भीषण नरसंहार हुआ। करोड़ों जानें गयीं। नायक तानाशाह हिटलर की गोद में जा बैठा और इतिहास रक्त-रंजित हो उठा। 
हमारा उद्देश्य इतिहास बाँचना नहीं, विरोध की इस विकृत शैली की विसंगतियों के आलोक में अपनी उदात्त परम्पराओं का स्मरण कर अपने पवित्र संविधान में दिए गए ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार’ का सांस्कारिक और सार्थक निर्वाह करने की आवश्यकता को रेखांकित करना है। ऐसा न कि हम पथ-भ्रमित लम्पट तत्वों की चपेट में आकर इस आध्यात्मिक अधिकार की गरिमा को धूमिल कर दें!
“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”