Tuesday, 31 March 2020

कोरोना वायरस

बनकर
धड़कन धमनियों की
रगों में रेंगती
रक्त धाराएं
और
 श्वास-उच्छवास
की सुवास
देती है
अहसास मुझे
जीने का।
टपकी दो बूंदे
पसीने की तुम्हारी।
मेरे श्रमवीर दूत!

आज पसीना आ गया
मुझे
आनंदविहार के बस अड्डे पर।
काठ मार गया मुझे,
देखकर लकवाग्रस्त
बुद्धिवीर समाज!
रोज-रोज फट पड़ने वाली
बेसुरी आवाज
हिन्दू-मुस्लिम पर।
नहीं फूटी आज!
एक भी बोली!
मर गए सारे
परजीवी, ये मुआ बुद्धिजीवी।

छुप गए सारे सियार
अपनी मांद में।
अगर पहले ही
कोई कह देता
'आओ, रहो, ठहरो
अबतक तुमने हमें खिलाया
अब हमारी भी थोड़ी खाओ।
कयामत की इस घड़ी में
इस कदर
नेह न छुड़ाओ।
अब तुम्हे
 जाने नहीं देंगे'
तो भला !

वह 'नीति-निष्ठुरवा'
नहीं न बकबकाता
''तुम्हे आने नहीं देंगे''
चलो, मेरे श्रमजीवी मित्र!
झाड़ो !
रसायन की फुहार से धुले,
अपने 'सेनिटाइज्ड' तन को।
रोज-रोज पसीने से नहाती
बदबू में पसीने के
दम घुट जाता होगा
उस निगोड़े कोरोना का!
आज तो बेरहमी की इस बारिश में
दम ही तोड़ दिया होगा उसने!

आज लगा
गरीब तू नहीं!
तू तो खुद चल पड़ा
अपना बोझ रख
अपने माथे
अग्निपथ पर।
तू तो नहीं लदा
बोझ बनकर
हवाई उड़नखटोले में!
तू तो राजसी रुधिर है
सिंचनेवाले शिराओं को
इस मुल्क और इंसानियत की !
अवाम की अमानत हो तुम!


मेरे मज़दूर भाईयों!
बचो ।
और बचाओ।
अपने
और अपनों को।
अपने से ही!
एक हो जाओ।
लेकिन,अलग-अलग होकर।
'कोरोना-डिस्टेंसिंग'!
छोड़ो आसरा।
क्रांति का झुनझुना बजाते
उन डपोरशंखी
सियासी जमातों का।

इस बार याद रखो।
नहीं भेजी
 किसी 'लिबरेशन' आर्मी ने!
' पूरब की पहली लाल किरणों' की सौगात।
उल्टे परोस दी है
अपनी कुत्सित औकात।
उपहारों की श्रृंखला में
हे सर्व हारा!
पहले
'सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम '
अथवा सार्स!
और अब
कोरोना वायरस!

Friday, 27 March 2020

नहीं रहेगा 'करोना'!

पदार्थ के प्रयोग भौतिक जगत के वे मूल सूत्र हैं जो  तथ्यों की जाँच-पड़ताल कर कार्य और कारण सिद्धांत के आलोक में प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या करते हैं। इसे ही हम भौतिक जगत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं। यहाँ हम तब तक किसी बात को नहीं मानते जब तक  प्रामाणिकता के धरातल पर अपने प्रयोगों द्वारा उसके होने की पुष्टि नहीं कर लेते। ये प्रयोग सार्वजनिक और सार्वभौमिक  होते हैं। कहने का मतलब यह है कि  प्रयोग की उस अमुक विधा को चाहे कोई भी दुहराए, परिणाम सदैव वहीं मिलेगा। हाँ, इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि  बाकी  कारक भी न बदलें! अर्थात प्रयोग का वातावरण। जैसे किस दबाव या तापमान के परिवेश में वह प्रयोग किया जा रहा है। इन कारकों का प्रयोग के प्रतिकारक और प्रतिफल दोनों की भौतिक और रासायनिक बनावट और बुनावट पर असर पड़े बिना नहीं रहता।आप नाइट्रोजन और ऑक्सिजन के  आपसी संयोग को ही देख लें। ये एक से अधिक तरीक़ों से आपस में रासायनिक संयोग कर अलग अलग यौगिक  संरचनाएँ  बना लेते हैं। किंतु, प्रकृति में घटने वाली इन घटनाओं में एक व्यवस्था ज़रूर है। रासायनिक संयोग के भी अपने ख़ास नियम होते हैं। अब यह भी ख़ास रुचि का विषय है कि  प्राकृतिक घटनाओं की यह सारी व्यवस्था भी एक अव्यवस्था  के गर्भ से ही निकलती हैं।ठीक वहीं बात जो गीता में कृष्ण  ने ' न होने' से 'होने ' का होना बताया था। ताप गतिकी का नियम (Law of thermodynamics) है कि 'ब्रह्मांड की अव्यवस्था अनवरत बढ़ोतरी की ओर अग्रसर है ( Entropy of the universe is increasing)।'  कहने का मतलब ठीक वैसा ही है जैसे कि अफ़रातफ़री के महौल में आप एक ओर एकान्त ढूँढकर अपने मन को पहले शांत करने का प्रयास करें और फिर बुद्धि-विवेक से उस माहौल से निपटने की कोई रणनीति का इजाद कर लें या करने की चेष्टा करें। यह हुई अव्यवस्था के माहौल में व्यवस्था के प्रवाह का प्रयास। यहीं इस प्रकृति के प्रत्येक परमाणु के एक दूसरे और अपने ख़ुद के प्रति व्यवहार का मूल है। स्थायित्व हेतु न्यूनतम ऊर्जा का सिद्धांत  भी यहीं है।सभी एक दूसरे और स्वयं के प्रभाव और प्रवाह में बढ़े जा रहे हैं - असंतुलन और संतुलन के द्वैत के बंधन  से शाश्वत  मुक्ति के प्रयास की छटपटाहट  में। उनका यह प्रवाह ठीक उसी महाविस्फोट  की प्रक्रिया की लय में है जिसमें एक सूक्ष्म बिंदु  महानाद की ध्वनि में फटकर इस ब्रह्मांड को आकार देती फैलती जा रही है।

हमारे मन, बुद्धि और अहंकार की अवस्था भी ठीक वैसी ही है। यह भी ऐसी अव्यवस्था और अफ़रातफ़री के माहौल में अपनी चेतन-सत्ता से मिलने को न केवल छटपटाते है, बल्कि उस दिशा में अपने सारे उपकरणों को प्रयोग में लगा देते हैं। यह प्रयोग अपने अंदर के अस्तित्व को बाहरी अस्तित्व में घोल देना होता है, जहाँ अपना -पराया कुछ नहीं होता है। सब कुछ एक जगह सिमट जाता है, अभेद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, समस्त ऊर्जा  एक साथ  चेतना में समा जाती है और अपनी आवृतियों को एक दूसरे में  घोलकर उस  'बिग-बैंग' के महानाद की आवृति के संग अनुनाद की स्थिति में आ  जाने को तत्पर हो जाती है। प्रयोग के इसी तुरीय  स्वरूप को हम प्रार्थना कहते हैं। इस प्रयोग के प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, परंतु प्रकृति सदैव सार्वजनिक और सार्वभौमिक  ही होती है। अर्थात, सूक्ष्म का विस्तार में विलय और विस्तार का सूक्ष्म में सिमट जाना। इसमें हम अपनी ऊर्जा दूसरों  की शुभकामना, दूसरों के कल्याण और अपने आस्तित्व की रक्षा के लिए दूसरों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए करते हैं।यहाँ यह दूसरा और कोई नहीं बल्कि उस परम पिता परमेश्वर का ही अभिन्न अंश है जो इस चराचर जगत सहित  हममें भी व्याप्त  है। आध्यात्मिक जगत के इसी प्रयोग का नाम  उपासना है। यह न केवल वैज्ञानिक प्रयोगों से भी ऊँचे धरातल पर अवस्थित है, जो न केवल सीधे अनुभव के स्तर पर हमें आभासित होता है, बल्कि प्रयोक्ता को  चेतना के इस उत्कर्ष का स्पर्श पाने के लिए निरंतर प्रयास भी  करने पड़ते हैं। तब जाकर वह इस प्रयोग को सम्पादित करने के संस्कार से सम्पन्न हो पाता है। उचित संस्कार के अभाव में प्रतिभा माहुर  बन जाती है। इसका सबसे प्रमुख कारक मन का  निश्छलता और बुद्धि का जागरूकता और चैतन्य के उच्चतम  बिंदु पर स्थित  रहना है। ऐसे प्रयोगों के प्रभाव का विस्तार उनके ज्ञान से उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति तक होता है।
गांधी के 'सत्य का प्रयोग' में प्रार्थना की भूमिका कुछ ऐसे ही आध्यात्मिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। आइए, उनके इस आध्यात्मिक प्रयोग अर्थात प्रार्थना  के प्रभाव की कहानी हम आपको उनके सरलतम सिपाही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में सुनाते हैं: -

" सारे देश में जहाँ-तहाँ हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे। गांधीजी इन घटनाओं से बहुत चिंतित और परेशान थे। बहुत ऊबकर उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इक्कीस दिनों का उपवास करने का निश्चय किया। महात्माजी के उपवास की ख़बर छपते ही सारे देश में बड़ी चिंता व्याप्त हो गयी। अभी-अभी वह बड़ी ख़तरनाक बीमारी से उठे थे। सब लोग, विशेषकर  डॉक्टर अंसारी - जो उनके स्वास्थ्य से अच्छी तरह परिचित थे - बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने इस निश्चय से गांधीजी को डिगाने का बहुत प्रयत्न किया। अपने प्रेम तथा अपनी डॉक्टरी  कला, दोनों का प्रयोग किया।पर गांधीजी अपने निश्चय से नहीं डिगे। अंत में वह इतने सफल हुए कि उन्होंने गांधीजी से वचन ले लिया कि  उनकी मृत्यु ही अगर इस उपवास का नतीजा होनेवाला हो, तो उस हालत में वह उपवास तोड़ डालेंगे। उपवास आरम्भ हुआ। ख़बर पाते ही मैं दिल्ली पहुँच गया। डॉक्टर अंसारी तो दिन-रात देखभाल करते ही रहे। 
उधर गांधीजी  के उपवास के दिन बीतते चले जाते थे।डॉक्टर अंसारी दिन में दो बार उनके पेशाब की जाँच करते। एक दिन अद्भुत घटना हुई। मैंने डॉक्टर अंसारी से ही सुनी। एक दिन पेशाब की जाँच करने पर उन्होंने देखा, उसमें असीटोन की मात्रा अधिक निकली! यह अच्छा लक्षण नहीं है।यदि इसकी मात्रा बढ़ जाये तो आदमी बेहोश हो जाता है। उसके बाद उस आदमी को बचाना कठिन हो जाता है। इससे वह चिंतित हुए। उन्होंने महात्माजी से कहा कि  अब आप ख़तरे के निकट पहुँचने वाले हैं और हो सकता है कि इक्कीस दिन पूरे होने के पहले ही आपको अपने वादे के अनुसार उपवास तोड़ना पड़े।
असीटोन की मात्रा बढ़ती गयी। डॉक्टर अंसारी ने निश्चय किया कि अब अधिक ठहरना बहुत ख़तरनाक होगा। उन्होंने यह बात महात्माजी से कही। आग्रह भी किया कि  अब उपवास तोड़ना चाहिए। वह डरते थे कि  कुछ ही घंटों बाद बेहोशी आ सकती है। उन्होंने यह सब कहा और खिलाने पर ज़िद की। महात्माजी ने कहा कि  आपने अपनी विद्या से सब कुछ तो देख लिया है और सब हिसाब लगा लिया है; पर रात भर मुझे छोड़ दीजिए। इस पर डॉक्टर साहब राज़ी नहीं होते थे। तब गांधीजी ने कहा क़ि  आपने सबका हिसाब तो लगाया है, पर प्रार्थना के असर का हिसाब तो लगाया ही नहीं; आज मुझे छोड़ दीजिए। डॉक्टर साहब मान गए। दूसरे दिन पेशाब की जाँच कर उन्होंने कहा कि असीटोन का अब  ख़तरा नहीं है और खिलाने का आग्रह छोड़ दिया। उसके बाद, उपवास की अवधि में, फिर कभी असीटोन का उपद्रव न हुआ। डॉक्टर अंसारी की चिंता जाती रही। उन्होंने हम लोगों से कहा कि इस चमत्कार का कोई कारण हमारी चिकित्सा नहीं बताती - हम नहीं समझ सकते, यह कैसे हुआ!
महात्माजी, उपवास की पूरी अवधि में प्रत्येक दिन, अपने नियमानुसार चरख़ा कातते रहे। उनको किसी तरह चारों ओर तकिया रखकर बिठा दिया जाता। उसी तरह बैठे-बैठे वह चरख़ा चला लेते। अंत में जब उपवास समाप्त करने का समय आया, तब प्रार्थना करके, चर्खा चलाकर और भजन गाकर, उन्होंने नारंगी का रस पीकर उपवास तोड़ा। मौलाना मुहम्मद अली ने इस अवसर पर बूचड़खाने  से एक गौ ख़रीदकर महात्माजी को भेंट की।इसमें कितना प्रेम और सद्भाव भरा था।"   

तो आज जब एक वैश्विक संकट की स्थिति मँडरा रही हो, तो इसमें प्रार्थना का महत्व और बढ़ जाता है, जन-कल्याण के लिए। चाहें मौन रहे, चाहे घंटा-घड़ियाल-शंख बजाएँ, चाहे मंत्रोच्चार करें, चाहें भजन -कीर्तन गाएँ, चाहे अजान अदा  करें, चाहे गुरुबानी को गाएँ,  जैसे भी करें - विश्व-कल्याण की आकांक्षा , ईश्वर के आशीष की कामना , इस घड़ी आपकी सेवा में लगे देवदूतों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता के भावों की अभिव्यक्ति, और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह हेतु - अपने एकान्त में आप भी प्रार्थना करो ना!
नहीं रहेगा 'करोना'।

Sunday, 26 January 2020

कदमताल

भले कुछ सिरफिरे बहेलिए
बहलाने के खातिर मन को।
फुसलाकर फंसा ले कुछ
चिड़ियों और जंगली जंतुओं को।
 करने को अपनी
 हैवानियत मालामाल
और फिर उतार ले
 उनकी खाल।
पर कर न पाएंगे कभी
 ये जंगल बेजार!
चिड़ियों की चहचहाहट
 तैरेगी ही सदा फिजा में।
होगा मंगल जंगल में
 सिंह - शावकों का ,
मृगछौनों से।

रहेगा गुलजार गुलिस्तां
पत्र कलरव से,
द्रूम - लताओ के ।
भला कैसे रुकेगी?
 नदियों की नादानी!
 जमीन पर उछलकर
पहाड़ों से,
पसार देती पानी ।
बुझाने को प्यास
अरण्य प्राणियों की।
जिसमें धोते
 कटार का खून, बहेलिए!
तो भला क्यों न सूखे नदी
 प्यास बुझाकर
इन भक्षियों की!

भले ही भक्षियों का भक्षण रहे
जारी बदस्तूर।
धरती तो धरणी है।
धरती रहेगी,
धुकधुकियों में अपनी
और रह रह कर उगलती रहेगी,
ज्वालामुखी, आक्रोश का!
डोल-डोल कर
करती रहेगी प्रकम्पित
जज़्बातों को,
जन समुदाय के रूह की।
राजपथ काँपता रहेगा
सलामी मंच के सामने,
सेना की टुकड़ी के
नुमायशी कदम ताल से!





Sunday, 19 January 2020

“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”

“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”


भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’ हमारी सनातन परम्परा के मूल से नि:सृत है। प्रारम्भ से ही हमारा सनातन दृष्टिकोण जीवन के एक ऐसे दर्शन की तलाश में रहा है जो ‘आत्मवत सर्व भूतेषु य: पश्यति स: पंडित:’ के भाव में पगा हो और जिससे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना का प्रवाह होता है। अतः हमारी अभिव्यक्ति की परम्परा के उत्स में ही इस व्यवहार दर्शन का प्राधान्य रहा जो ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’की ओर उन्मुख हो। और तो और, पारिवारिक अनुष्ठान में एक बालक नचिकेता भी अपने वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति को प्रबल स्वर देने में पीछे नहीं हटता और अपने पिता की अनैतिकता को ललकार देता है। हमारा समस्त उपनिषद दर्शन ऐसी ही वैचारिक शुचिता और अभिव्यक्ति की गरिमा के अध्यात्म का आख्यान है।
समस्त भारतीय विचार-कुल-परम्परा शास्त्रार्थ की विलक्षण विवेचना प्रणाली से विभूषित है। सारत: ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’ हमारी सनातन परम्परा में महज़ एक क़ानूनी अधिकार ही नहीं बल्कि एक विराट सांस्कारिक उत्तरदायित्व का वहन भी है जो अपना विरोध भी अपने व्यवहार की विनम्रता और विचार के चेतन स्तर पर प्रकट करता है। जहाँ दुर्दांत हत्यारे डकैत अँगुलीमाल के समक्ष बुद्ध का संयत व्यवहार और चेतना-दीप्त प्रतिवाद ‘मैं तो ठहर गया, भला तू कब ठहरेगा?’ उसके अंतर्मन को झकझोर देता है और वह डाकू ‘ठहर’ जाता है। विरोध की अभिव्यक्ति का यहीं दर्शन आर्यावर्त की धारा की उर्वरा शक्ति है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इसी अध्यात्म को स्वर दिया बापू ने अपने सत्याग्रह में राजकुमार शुक्ल के सदाग्रह पर चंपारण  में १९१७ में! अब देखिए और तुलना कीजिए इसी साल घटने वाली दो घटनाओं की। एक रूस में और दूसरी भारत के चंपारण में। रूस में भी जनता सामंती अत्याचार में त्राहि-त्राहि कर रही थी। चंपारण में भी निलहे ज़मींदार जनता का ख़ून सोख रहे थे। क्रांति की धारा दोनों धराओं पर एक साथ बही। विरोध के स्वर दोनों के आकाश में एक साथ गूँजे। किंतु कितना अंतर था दोनों में ! एक की धरती लहू से लबरेज़ थी तो दूसरे का आँगन अहिंसा के अध्यात्म से आप्लावित ! 
चंपारण की अवाम ने राजकुमार शुक्ल के नेतृत्व में अपने आंदोलन का नायक गांधी को चुना और गांधी ने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुवाद अपने सत्याग्रह में किया। सत्य और अहिंसा के अध्यात्म में चंपारण का कण-कण आंदोलन का चेतन स्वरूप बन गया और क्रूर सामंती व्यवस्था ने उसके समक्ष घुटने टेक दिए। अभिव्यक्ति की इसी दार्शनिक परम्परा का प्रवाह आगे हुआ और समस्त भारत भूमि ‘बिना खड्ग, बिना ढाल’  सिक्त होकर अंग्रेज़ी सत्ता से रिक्त हो गयी।
दूसरी ओर रूस के नायक की अभिव्यक्ति की कोख से ख़ून की धारा बहने लगी। भीषण नरसंहार हुआ। करोड़ों जानें गयीं। नायक तानाशाह हिटलर की गोद में जा बैठा और इतिहास रक्त-रंजित हो उठा। 
हमारा उद्देश्य इतिहास बाँचना नहीं, विरोध की इस विकृत शैली की विसंगतियों के आलोक में अपनी उदात्त परम्पराओं का स्मरण कर अपने पवित्र संविधान में दिए गए ‘विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार’ का सांस्कारिक और सार्थक निर्वाह करने की आवश्यकता को रेखांकित करना है। ऐसा न कि हम पथ-भ्रमित लम्पट तत्वों की चपेट में आकर इस आध्यात्मिक अधिकार की गरिमा को धूमिल कर दें!
“सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म:”              

Monday, 25 November 2019

बकरबग्घा

जंगल में भी प्रजातांत्रिक मूल्य अब आकृति ग्रहण करने लगे थे। जानवरों में चेतना आ गयी थी। सूचनाओं के तीव्र प्रचार-प्रसार के युग में उन्होंने भी अपने संपर्क सूत्र सुदृढ कर लिए थे। अन्य प्रजातियों की बस्ती में भी उन्होंने अपने जासूस पालतू रूप में छोड़ रखे थे जो भोजन-पत्तर, रहन-सहन से लेकर बात-विचार तक  की प्रणालियों से जंगल की जनता को जागरूक रखते। जनता बड़ी तेजी से आधुनिक हो रही थी। जंगल की जनता को इस बात पर भी गर्व होता,कि बाहर की दोपायी प्रजाति जिसके मूल्यों को वह ग्रहण कर रहे थे, वे भी स्वयं न केवल जंगली संस्कारों को अपने रक्त में अब प्रवाहित करने लगी थी, बल्कि वह अपने लोगों के लिए उपयुक्त विशेषण से अलंकृत करने में चौपाई संज्ञाओं का धड़ल्ले से उपयोग करने लगी थी। ऊपर से तेजी से कटते जंगलों के कारण भौतिक  आसन्नता भी निकटतर होते जा रही थी। अब विचारों के साथ-साथ दोपायों ने व्यवहार में भी इन चौपायों से अपनी दूरी मिटानी शुरू कर दी थी। भोले-भाले और सरल दोपाये  के लिए 'गाय', धूर्त के लिए 'भेड़िया', मूर्ख के लिए 'गदहा', स्वामिभक्त के लिए 'कुत्ता' या 'घोड़ा' और  निरीह बेचारी के लिए 'बकरी' जैसी संज्ञाएँ दोपायों में अलंकरण की शब्दावली थी। उल्टे इन चौपाये जंगलियों ने अपनी मान-मर्यादा का खयाल कर  दोपायों का नाम अपनाने की कतई सहमति नहीं दी थी।

जंगल की निरीह प्रजा का खयाल रखने के लिए बकरियों ने एक सत्तारूढ़ दल जानवरों के अपने तंत्र की स्थापना-काल से ही  बना लिया था। इस दल में शांति, अहिंसा, सदाचार बकरी के दूध- सा प्रवाहित होता। बकरियों का नेता बड़ा शातिर निकला। अपने सीधेपन के छद्मवेश में न केवल जंगल की जानवर-आत्मा को खूब सोखा, बल्कि अपने परिवार का एक छत्र राज्य कायम कर लिया, इसी ढाढस पर कि एक दिन वह इस जंगल से 'जानवरपन' का सफाया कर देगा।

'जानवरपन हटाओ' के उसके नारे ने जंगल की तीन पीढ़ियों को काटा,  लेकिन चौथी पीढ़ी आते-आते नागफनी की ढेर सारी कंटीली लतायें पनप गयी थी और दूध देनेवाली गाय- भैंस जैसी अन्य प्रजातियों  ने भी बकरी का साथ छोड़ दिया था । सत्ता की मलाई से वंचित उसके कुनबे में थोड़ा  और असंतोष फैला। लेकिन जंगल में जानवरी-जनता के एक जागरूक बुद्धिजीवी वर्ग  'जानवरपन हटाओ' के नारे में ऐसा मुग्ध था  कि दूसरे दल की दाल गल ही नहीं पा रही थी। किन्तु, उचित समय देखकर आपसी कटुता और स्वार्थ के चक्कर में भेड़-दल उससे टूटकर बाहर आ गया था।

उधर बकरियों के कपटपूर्ण  शांति के सिद्धांत और छद्म समभाव के दर्शन ने जंगल में अहिंसक मूल्यों की ऐसी बयार बहाई थी कि थोड़ा भी विरोध करने वाला  'हिंसक' और 'असहिष्णु' माना जाता था। इसी कारण लकड़बग्घे प्रजा के गले मे उतर नहीं पा रहे थे। ऊपर से इन लकड़बग्घों के चेहरे  पर आरोप के एक बड़े कलंक की कालिख पुती थी कि इनके कुनबे के किसी सदस्य ने बकरी का दूध पीने वाले किसी निरीह को मार कर खा लिया था। इस कलंक के ब्रह्मास्त्र से बकरियों ने लकड़बग्घों की जमानत जब्त कर ली थी। लकड़बग्घों की लुटिया हर चुनाव में डूब जाती।

एक युग बीत चुका था। बकरे की माँ आखिर कबतक खैर मनाती। उसका भी  छल अब नंगा हो चुका था। लकड़बग्घों ने प्रजा के समक्ष बकरियों की जालबाजी के तार-तार उधेड़ दिए थे। अब लकड़बग्घे  सत्तासीन थे। लकड़बग्घों की लीक पर ही भेड़ियों ने भी उनके दृष्टिपत्र में सेंध मारकर अपना एक अलग दर्शन जंगल को दिखाया था। लेकिब यह दर्शन जंगल के किसी खास भाग में ही अपनी छाप छोड़ सका।

दार्शनिक स्तर पर 'बकरी और भेड़' तथा 'लकड़बग्घे औऱ भेड़िये' मौसेरे भाई लगते थे।  इन मौसेरे भाइयों ने इस बार मिलकर चुनाव लड़ा था। परिणाम आते ही अब वे अपनी असलियत पर आ गए। जिसे घोड़ो, गदहों, कुत्तों आदि ने चुनकर छोटे भाई का आकार दिया, वह अपने को बाप घोषित करने लगा। भेड़िये ने लकड़बग्घे को चुनौती दे दी। इस चुनौती की कसौटी उसने अपनी धूर्तता को बनाया।
भेड़ ने सोचा कबतक बकरी के चक्कर में विलुप्त प्रजातियों की सूची में जगह बनाने की होड़ में शामिल हुआ जाय! उसने भेड़िये से अपना थुथुन भिड़ाया और उसे सूंघते हुए कहा, "जब हम नाम में इतने नज़दीक हैं ही , ऊपर से खाल में कोई अंतर दिखता नहीं और रक्त वर्ण से ठहरे खालिस जानवर! फिर हम अपने पशुवत मूल्यों से और समान उद्देश्यों से मुंह क्यों मोड़ें? न विश्वास हो तो जंगल के पार की सियासत और मूल्यों की विरासत समझ के आओ। जब हम सब उनके शरीर के अंदर की आत्मा में बैठ सकते हैं तो यहां जानवरपन से परहेज़ कैसा! मैं बकरी को बताऊंगा तो बड़ी खुश होगी। कब से लालायित निगाहों से तुम्हारे थुथुन चाटने को आतुर है। पहले तुम औपचारिक ढंग से लकड़बग्घे के कुनबे को छोड़ने की हुंकार मार दो जंगल में।"

भेड़िया की धूर्तता को भेड़ की यह मूर्खता भा गयी। उसने ताबड़तोड़ विद्रोह कर भेड़ और बकरी के साथ अपनी बिसात बिछा दी।
लेकिन लकड़बग्घा भी बहुत बड़ा 'बकरबग्घा' जो निकला.....!!!!