Monday, 25 November 2019

बकरबग्घा

जंगल में भी प्रजातांत्रिक मूल्य अब आकृति ग्रहण करने लगे थे। जानवरों में चेतना आ गयी थी। सूचनाओं के तीव्र प्रचार-प्रसार के युग में उन्होंने भी अपने संपर्क सूत्र सुदृढ कर लिए थे। अन्य प्रजातियों की बस्ती में भी उन्होंने अपने जासूस पालतू रूप में छोड़ रखे थे जो भोजन-पत्तर, रहन-सहन से लेकर बात-विचार तक  की प्रणालियों से जंगल की जनता को जागरूक रखते। जनता बड़ी तेजी से आधुनिक हो रही थी। जंगल की जनता को इस बात पर भी गर्व होता,कि बाहर की दोपायी प्रजाति जिसके मूल्यों को वह ग्रहण कर रहे थे, वे भी स्वयं न केवल जंगली संस्कारों को अपने रक्त में अब प्रवाहित करने लगी थी, बल्कि वह अपने लोगों के लिए उपयुक्त विशेषण से अलंकृत करने में चौपाई संज्ञाओं का धड़ल्ले से उपयोग करने लगी थी। ऊपर से तेजी से कटते जंगलों के कारण भौतिक  आसन्नता भी निकटतर होते जा रही थी। अब विचारों के साथ-साथ दोपायों ने व्यवहार में भी इन चौपायों से अपनी दूरी मिटानी शुरू कर दी थी। भोले-भाले और सरल दोपाये  के लिए 'गाय', धूर्त के लिए 'भेड़िया', मूर्ख के लिए 'गदहा', स्वामिभक्त के लिए 'कुत्ता' या 'घोड़ा' और  निरीह बेचारी के लिए 'बकरी' जैसी संज्ञाएँ दोपायों में अलंकरण की शब्दावली थी। उल्टे इन चौपाये जंगलियों ने अपनी मान-मर्यादा का खयाल कर  दोपायों का नाम अपनाने की कतई सहमति नहीं दी थी।

जंगल की निरीह प्रजा का खयाल रखने के लिए बकरियों ने एक सत्तारूढ़ दल जानवरों के अपने तंत्र की स्थापना-काल से ही  बना लिया था। इस दल में शांति, अहिंसा, सदाचार बकरी के दूध- सा प्रवाहित होता। बकरियों का नेता बड़ा शातिर निकला। अपने सीधेपन के छद्मवेश में न केवल जंगल की जानवर-आत्मा को खूब सोखा, बल्कि अपने परिवार का एक छत्र राज्य कायम कर लिया, इसी ढाढस पर कि एक दिन वह इस जंगल से 'जानवरपन' का सफाया कर देगा।

'जानवरपन हटाओ' के उसके नारे ने जंगल की तीन पीढ़ियों को काटा,  लेकिन चौथी पीढ़ी आते-आते नागफनी की ढेर सारी कंटीली लतायें पनप गयी थी और दूध देनेवाली गाय- भैंस जैसी अन्य प्रजातियों  ने भी बकरी का साथ छोड़ दिया था । सत्ता की मलाई से वंचित उसके कुनबे में थोड़ा  और असंतोष फैला। लेकिन जंगल में जानवरी-जनता के एक जागरूक बुद्धिजीवी वर्ग  'जानवरपन हटाओ' के नारे में ऐसा मुग्ध था  कि दूसरे दल की दाल गल ही नहीं पा रही थी। किन्तु, उचित समय देखकर आपसी कटुता और स्वार्थ के चक्कर में भेड़-दल उससे टूटकर बाहर आ गया था।

उधर बकरियों के कपटपूर्ण  शांति के सिद्धांत और छद्म समभाव के दर्शन ने जंगल में अहिंसक मूल्यों की ऐसी बयार बहाई थी कि थोड़ा भी विरोध करने वाला  'हिंसक' और 'असहिष्णु' माना जाता था। इसी कारण लकड़बग्घे प्रजा के गले मे उतर नहीं पा रहे थे। ऊपर से इन लकड़बग्घों के चेहरे  पर आरोप के एक बड़े कलंक की कालिख पुती थी कि इनके कुनबे के किसी सदस्य ने बकरी का दूध पीने वाले किसी निरीह को मार कर खा लिया था। इस कलंक के ब्रह्मास्त्र से बकरियों ने लकड़बग्घों की जमानत जब्त कर ली थी। लकड़बग्घों की लुटिया हर चुनाव में डूब जाती।

एक युग बीत चुका था। बकरे की माँ आखिर कबतक खैर मनाती। उसका भी  छल अब नंगा हो चुका था। लकड़बग्घों ने प्रजा के समक्ष बकरियों की जालबाजी के तार-तार उधेड़ दिए थे। अब लकड़बग्घे  सत्तासीन थे। लकड़बग्घों की लीक पर ही भेड़ियों ने भी उनके दृष्टिपत्र में सेंध मारकर अपना एक अलग दर्शन जंगल को दिखाया था। लेकिब यह दर्शन जंगल के किसी खास भाग में ही अपनी छाप छोड़ सका।

दार्शनिक स्तर पर 'बकरी और भेड़' तथा 'लकड़बग्घे औऱ भेड़िये' मौसेरे भाई लगते थे।  इन मौसेरे भाइयों ने इस बार मिलकर चुनाव लड़ा था। परिणाम आते ही अब वे अपनी असलियत पर आ गए। जिसे घोड़ो, गदहों, कुत्तों आदि ने चुनकर छोटे भाई का आकार दिया, वह अपने को बाप घोषित करने लगा। भेड़िये ने लकड़बग्घे को चुनौती दे दी। इस चुनौती की कसौटी उसने अपनी धूर्तता को बनाया।
भेड़ ने सोचा कबतक बकरी के चक्कर में विलुप्त प्रजातियों की सूची में जगह बनाने की होड़ में शामिल हुआ जाय! उसने भेड़िये से अपना थुथुन भिड़ाया और उसे सूंघते हुए कहा, "जब हम नाम में इतने नज़दीक हैं ही , ऊपर से खाल में कोई अंतर दिखता नहीं और रक्त वर्ण से ठहरे खालिस जानवर! फिर हम अपने पशुवत मूल्यों से और समान उद्देश्यों से मुंह क्यों मोड़ें? न विश्वास हो तो जंगल के पार की सियासत और मूल्यों की विरासत समझ के आओ। जब हम सब उनके शरीर के अंदर की आत्मा में बैठ सकते हैं तो यहां जानवरपन से परहेज़ कैसा! मैं बकरी को बताऊंगा तो बड़ी खुश होगी। कब से लालायित निगाहों से तुम्हारे थुथुन चाटने को आतुर है। पहले तुम औपचारिक ढंग से लकड़बग्घे के कुनबे को छोड़ने की हुंकार मार दो जंगल में।"

भेड़िया की धूर्तता को भेड़ की यह मूर्खता भा गयी। उसने ताबड़तोड़ विद्रोह कर भेड़ और बकरी के साथ अपनी बिसात बिछा दी।
लेकिन लकड़बग्घा भी बहुत बड़ा 'बकरबग्घा' जो निकला.....!!!!

14 comments:

  1. वाह!! सार्थक दमदार व्यंग लेख, समसामयिक विषय पर!! 🙏🙏🙏

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    1. जी, बहुत आभार आपके प्रातर आशीर्वचनों के।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 26 नवम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी, बहुत आभार आपके प्रातर आशीर्वचनों के।

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  3. वाह वाह क्या गज़ब का लेखन..सर्वप्रथम तो बकरबग्घा शीर्षक नाम ही रोचक और ध्यान आकृष्ट करने वाला है।
    बकरबग्घा का अर्थ काम से ज्यादा बड़बोलेपन में रहनै वाला।
    कहानी के अंदाज़ में लिखा गया राजनीतिक इतिहास सच में सराहनीय है। सत्ता की सियासत में बस नाम बदल जाते हैं
    उनके अंंदर का जानवर एकसमान ही रहता है। इन जानवरों के नेतृत्व में जंगलराज ही चलाया जा सकता है क्योंकि प्रजा को हर बार ही छल का शिकार होना है।
    कसी हुई पटकथा पात्र संयोजन.. बहुत सुंदर लेखन।
    बधाई आपको।

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    1. बहुत-बहुत आभार आपके इस प्रभातकालींन आशीर्वाद का।

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 27 नवंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. जी, बहुत-बहुत आभार आपका।

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  5. बहुत सुंदर और सार्थक लेख लिखा आपने 👌👌

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  6. शानदार लेख 👌👌👌 जानवरों के माध्यम से मनुष्य में छिपे पशु स्वभाव का सटीक चित्रण....नमन आपकी लेखनी को 🙏🙏🙏

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