Wednesday, 8 June 2022
.....बेटी पढ़ाओ...बेटी बहाओ! (लघुकथा)
Sunday, 5 June 2022
बड़ा बाबू जेल जाएँगे (लघुकथा)
सूबे में नए बड़ा बाबू आए हैं। किसी भी गड़बड़ी के प्रति ‘शून्य सहिष्णु’ हैं। क़ानून का राज बहाल करने की ठान ली है। साक्षात मूल वाराह अवतार हैं, बड़ा बाबू! प्रचंड, प्रकृष्ट और प्रगल्भ तो इतने कि महादेव भी पानी भरें!
आज तो भोले नाथ भी सहम गए। उनके दरबार में जो बड़ा बाबू के पुष्पक से पहले नहीं पहुँचेगा उसे वह कंस-शैली में काल-कोठरी में डाल देंगे। भाग्य नियंता, एकदम हिरण्यकश्यिपु स्टाइल! ‘ले लो, इस अभियंता को हिरासत में!’ शक्ति रूपा ने शून्य लापरवाही से ’जी हुकुम’ की हुकुम बजायी। राम राज आया। जनता ने जय जयकार की।
सूबे में मारकाट मची है। लोग घर बार छोड़कर भाग रहे हैं। क्या मालूम, नरसंहार की दूसरी फ़ाइल भी खुल जाए! आकाशवाणी होने वाली है, ‘बड़ा बाबू को हिरासत में ले लिया जाय’।
जनता जयकार लगा रही है, ‘बड़ा बाबू जेल जाएँगे’।
Wednesday, 23 March 2022
फ़ाइल खुल गयी
सुना है
कई दिनों से
कस के बांधी गयी
लाल फीते में
एक फ़ाइल
खुल गयी है।
दिन पर दिन
जमायी जा रही
वक़्त की सर्द गर्द पर
रेंगने लगे थे
शफ्फाक श्वेत दीमक
वैचारिक तंद्रा के।
कि खोल दिया
किसी ने
पिछली सदी से
बंद तहखाने में
पीढ़ियों के,
'पेंडोराज बॉक्स'!
पल्लवी फूटी है
विवेक-विटप-से
अनुपम पिटारे से
भानुमति के इस्स!
ईशोपनिषद के
अमिय वाक्य!
"हिरण्मयेन पात्रेण
सत्यस्य मुखम्
अपिहितम् अस्ति।
पूषन् तत्
सत्यधर्माय दृष्टये
त्वम् अपावृणु ॥"
फाइल के खुलते ही
उसमें बंद
उजली-सी बर्फ
पिघलने लगी है।
बहने लगी है बनकर
गरम खून की धार।
कश्यप का कपार
लूट, बलवा, बलात्कार।
फ़ाइल में
करीने से सजे
पृष्टों से गूंज रहा
खामोशी का प्रचंड नाद।
नोट पेज भरे हुए हैं
तहरीर से
दोगले नुमाइंदों के।
वाराह ने मूल उठाया
सतीसर बह गया।
हो गया 'का' 'शिमिर'।
जान गई है अब ये
रिपब्लिक जनता कुछ!
और बौरा गए हैं
सौदागर मौत के
खुल जाने से
अपनी फ़ाइल के।
Saturday, 26 February 2022
महामारी का रोना!
उग रही हैं
रिश्तों की फ़सल,
जगह-जगह!
क्यारियाँ, कोले,
खेत, फ़ार्म हाउस,
सब-के-सब।
‘पट’ गए हैं
इन रिश्तों से!
कहीं मन के रिश्ते,
कहीं निरा तन के!
कहीं धन के,
तो कहीं
सिर्फ़ आवरण के!
कहीं धराशायी हो रही है
पककर पुरानी फ़सलें,
तो कहीं अंकशायी
सद्य:स्नात, लहलहायी!
कहीं बोए जा रहे हैं
बीज, संभावनाओं के!
कीटनाशक छिड़के जा रहे हैं।
डाले गए हैं थोड़े
रासायनिक खाद भी!
रिश्तों का रसायन
बनाने को!
कृत्रिम रिश्तों की
इस पैदावार पर
भारी पड़ गयी है,
प्रदूषित प्रकृति !
कभी सूखा,
कभी बाढ़,
कभी भूस्खलन,
तो फिर रहे-सहे
रिश्तों का दम
घुटा दिया है,
महामारी 'का रोना' ने!
Tuesday, 4 January 2022
बेवक़ूफ़ कौन! (लघुकथा)
नया नियम-क़ानून आ गया। कोरोना का दोनों टीका नहीं लगाये तो, सरकारी कार्यालयों और परिसरों में चल रहे निर्माण स्थलों पर जाने की अनुमति नहीं! कुछ ही दिनों पहले की तो बात है। पहिला टीका लगवा के लौटे थे उसकी झुग्गी के संगी साथी।कोई उड़ीसा से, कोई बंगाल से, कोई कन्नौज से, कोई छत्तीसगढ़ से .......! अब तो दूसरे टीके के भरोसे बैठने के अलावा कोई चारा भी नहीं रहा ।
भला हो उसके राज्य के बाबुओं का! पहले टीके के बाद ही दोनों टीकों का प्रमाण पत्र उसके नाम निर्गत कर दिया था। सुशासन का आँकड़ा जो ठीक करना था!
अब बेवक़ूफ़ वह किसे कहे? अपने पेट पर आज लात पड़ने से बचाने वाली उस बाबूशाही को! या, फिर मज़दूरों का होलसेल सप्लाई करने वाले उसके राज्य को पिछड़ा कहने वाले बुद्धिवीरों को! बेवक़ूफ़ कौन! उसने गमछे से अपने माथे का पसीना पोंछा और अपने काम में लग गया।
तेज परताप के चेहरे पर मुस्कान थी।