न राजा अनजान था।
न मुद्दालह परेशान था।
न मुद्दई हलकान था।
न मुख्तार नादान था।
न मुंसिफ बेईमान था।
बस मीनार बेजुबान था।
न राजा अनजान था।
न मुद्दालह परेशान था।
न मुद्दई हलकान था।
न मुख्तार नादान था।
न मुंसिफ बेईमान था।
बस मीनार बेजुबान था।
श्वानों ने आज संगत की है,
राजतिलक अब कर दो मेरा।
बहुत ढुलके बिन पेंदी लोटे,
हम न चूकेंगे अबकी बेरा।
करिआ कुकुर बीच खड़ा था,
स्व वर्णी सब घेरे थे।
लटकी थीं जीभ चितकबरों की,
कलमुंहे मुंह फेरे थे।
कुछ मगध, कुछ अंग देश,
कुछ मिथिला से आए थे।
लोकतंत्र धुन वैशाली की,
अपनी भौंक में लाए थे।
कहीं न कोई कुकर बचा था,
जो हो कुत्ता इकलौता।
कूटनीति की द्युत क्रीड़ा में,
सरमा पाणी समझौता।
फूटी लालटेन से लाली,
और छूटा पिनाक से सायक।
इंदिवर पंकिल लथपथ थे,
पुलकित थे सारे शुनक।
लाज सरम के बंधन टूटे,
जो अछूत थे, छूत बने।
धर्मी अधर्मी एक देख अब,
सारमेय थे अड़े तने।
हमीं है वे चौपाये जो,
पांडव सुरलोक लाए थे।
एकलव्य संधान शौर्य गुर,
द्रोण को दिखलाए थे।
दोगलापन दोपायों का अब,
नहीं रहेगी लाचारी।
वृकारी हुंकार भरे हैं,
राजतिलक की करो तैयारी।
#राजतिलककीकरोतैयारी
सूबे में नए बड़ा बाबू आए हैं। किसी भी गड़बड़ी के प्रति ‘शून्य सहिष्णु’ हैं। क़ानून का राज बहाल करने की ठान ली है। साक्षात मूल वाराह अवतार हैं, बड़ा बाबू! प्रचंड, प्रकृष्ट और प्रगल्भ तो इतने कि महादेव भी पानी भरें!
आज तो भोले नाथ भी सहम गए। उनके दरबार में जो बड़ा बाबू के पुष्पक से पहले नहीं पहुँचेगा उसे वह कंस-शैली में काल-कोठरी में डाल देंगे। भाग्य नियंता, एकदम हिरण्यकश्यिपु स्टाइल! ‘ले लो, इस अभियंता को हिरासत में!’ शक्ति रूपा ने शून्य लापरवाही से ’जी हुकुम’ की हुकुम बजायी। राम राज आया। जनता ने जय जयकार की।
सूबे में मारकाट मची है। लोग घर बार छोड़कर भाग रहे हैं। क्या मालूम, नरसंहार की दूसरी फ़ाइल भी खुल जाए! आकाशवाणी होने वाली है, ‘बड़ा बाबू को हिरासत में ले लिया जाय’।
जनता जयकार लगा रही है, ‘बड़ा बाबू जेल जाएँगे’।
सुना है
कई दिनों से
कस के बांधी गयी
लाल फीते में
एक फ़ाइल
खुल गयी है।
दिन पर दिन
जमायी जा रही
वक़्त की सर्द गर्द पर
रेंगने लगे थे
शफ्फाक श्वेत दीमक
वैचारिक तंद्रा के।
कि खोल दिया
किसी ने
पिछली सदी से
बंद तहखाने में
पीढ़ियों के,
'पेंडोराज बॉक्स'!
पल्लवी फूटी है
विवेक-विटप-से
अनुपम पिटारे से
भानुमति के इस्स!
ईशोपनिषद के
अमिय वाक्य!
"हिरण्मयेन पात्रेण
सत्यस्य मुखम्
अपिहितम् अस्ति।
पूषन् तत्
सत्यधर्माय दृष्टये
त्वम् अपावृणु ॥"
फाइल के खुलते ही
उसमें बंद
उजली-सी बर्फ
पिघलने लगी है।
बहने लगी है बनकर
गरम खून की धार।
कश्यप का कपार
लूट, बलवा, बलात्कार।
फ़ाइल में
करीने से सजे
पृष्टों से गूंज रहा
खामोशी का प्रचंड नाद।
नोट पेज भरे हुए हैं
तहरीर से
दोगले नुमाइंदों के।
वाराह ने मूल उठाया
सतीसर बह गया।
हो गया 'का' 'शिमिर'।
जान गई है अब ये
रिपब्लिक जनता कुछ!
और बौरा गए हैं
सौदागर मौत के
खुल जाने से
अपनी फ़ाइल के।