Monday, 3 September 2018

जय श्री कृष्ण!!!!

जय श्री कृष्ण! आज अठमी है. कृष्ण की जन्मतिथि. आप सबको शुभकामनायें! आइये इस अवसर पर हम अपना एक बेहद प्रिय लेख आपको पढ़ाएं. लेख का शीर्षक है, ' कृष्ण ' और इसके लेखक हैं: 'श्री राममनोहर लोहिया ' जो किसी परिचय के मुहताज नहीं!


कृष्ण
राममनोहर लोहिया

कृष्‍ण की सभी चीजें दो हैं : दो मां, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएं या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्‍वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्‍ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्‍ण देवकीनंदन भी हैं, लेकिन यशोदानंदन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्‍ण की असली मां, पेट-मां का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरह, वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नंद को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारिका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्‍योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किंतु यदि कृष्‍ण की चले, तो द्वारिका और द्वारिकाधीश, मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि से, वृंदावन और वरसाना वगैरह अधिक महत्‍वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्‍न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्‍यभामा की, राधा और रुक्मिणी की या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्‍द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्‍वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुंचाए, लेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत में, रुक्मिणी राधा से टक्‍कर कभी नहीं ले सकेगी।
मनुष्‍य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख हैं। यह शारीरिक सीमा, उसे अपना एक दोस्‍त, एक मां, एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है। किंतु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है, मन ही के द्वारा उछल सकता है। कृष्‍ण उसी तत्‍व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्‍त सीमाओं से उलांघता-उलांघता सबमें मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता। क्‍योंकि कृष्‍ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्‍य-लीला है, केवल सिद्धांतों और तत्‍वों का विवेचन नहीं, इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रहकर दो और निरापनी हो गई हैं। यों दोनों में ही कृष्‍ण का तो निरापना है, किंतु लीला के तौर पर अपनी मां, बीवी और नगरी से पराई बढ़ गई है। पराई को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्‍म करना है। मथुरा का एकाधिपत्‍य खत्‍म करती है द्वारिका, लेकिन उस क्रम में द्वारिका अपना श्रेष्‍ठतत्‍व जैसा कायम कर लेती है।
भारतीय साहित्‍य में मां है यशोदा और लला है कृष्‍ण। मां-लला का इनसे बढ़कर मुझे तो कोई संबंध मालूम नहीं, किंतु श्रेष्‍ठत्‍व भर ही तो कायम होता है। मथुरा हटती नहीं और न रुक्मिणी, जो मगध के जरांसध से लेकर शिशुपाल होती हुई हस्तिनापुर की द्रौपदी और पांच पांडवों तक एक-रूपता बनाए रखती है। परकीया स्‍वकीया से बढ़कर उसे खत्‍म तो करता नहीं, केवल अपने और पराए की दीवारों को ढहा देता है। लोभ, मोह, ईर्ष्‍या, भय इत्‍यादि की चहारदीवारी से अपना या स्‍वकीय छुटकरा पा जाता है। सब अपना और, अपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्‍ण की, इस राधा-कृष्‍ण या द्रौपदी-सखा ओर रुक्मिणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में, प्रेमांनंद और खून की गर्मी और तेजी में, कमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना।
कृष्‍ण है कौन? गिरधर, गिरधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है, लेकिन कृष्‍ण का गुह्यतम रूप तो गिरधर गोपाल में ही निखरता है। कान्‍हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उंगली पर क्‍यों उठाना पड़ा था? इसलिए न कि उसने इंद्र की पूजा बंद करवा दी और इंद्र का भोग खुद खा गया, और भी खाता रहा। इंद्र ने नाराज होकर पानी, ओला, पत्‍थर बरसाना शुरू किया, तभी तो कृष्‍ण को गोवर्धन उठाकर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्‍ण ने इंद्र का भोग खुद क्‍यों खाना चाहा? यशोदा और कृष्‍ण का इस संबंध में गु्हय विवाद है। मां इंद्र को भोग लगाना चाहती है, क्‍योंकि वह बड़ा देवता है, सिर्फ वास से ही तृत्‍प हो जाता है, और उसकी बड़ी शक्ति है, प्रसन्‍न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इंद्र से भी बड़ा देवता है, क्‍योंकि वह तो वास से तृप्‍त नहीं होता और बहुत खा सकता है, और उसके खाने की कोई सीमा नहीं। यही है कृष्‍ण-लीला का गुह्य रहस्‍य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्‍ण-लीला है।
कृष्‍ण के पहले, भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। निस्‍संदेह अवतार कृष्‍ण के पहले से शुरू हो गए। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्‍य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्‍ण ऐसा देव है जो निरंतर मनुष्‍य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्‍ण संपूर्ण अबोध मनुष्‍य है, खूब खाया-खिलाया, खूब प्‍यार किया और प्‍यार सिखाया, जनगण की रक्षा की और उसे रास्‍ता बताया, निर्लिप्‍त भोग का महान त्‍यागी और योगी बना।
इस प्रसंग में यह प्रश्‍न बेमतलब है कि मनुष्‍य के लिए, विशेषकर राजकीय मनुष्‍य के लिए, राम का रास्‍ता सुकर और उचित है या कृष्‍ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्‍ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्‍य बनता रहा। देव और निःस्‍व और असीमित होने के नाते कृष्‍ण में जो असंभव मनुष्‍यताएं हैं, जैसे झूठ, धोखा और हत्‍या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्‍ण का क्‍या दोष। कृष्‍ण की संभव और पूर्ण मनुष्‍यताओं पर ध्‍यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्‍यान। कृष्‍ण ने इंद्र को हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिष्ठित किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्‍य को देव बनाया, जन-गण में भावना जाग्रत की कि देव को आसमान में मत खोजो, खोजो यहीं अपने बीच, पृथ्‍वी पर। पृथ्‍वी वाला देव खाता है, प्‍यार करता है, मिलकर रक्षा करता है।
कृष्‍ण जो कुछ करता था, जमकर करता था, खाता था जमकर, प्‍यार करता था जमकर, रक्षा भी जमकर करता था : पूर्ण भोग, पूर्ण प्‍यार, पूर्ण रक्षा। कृष्‍ण की सभी क्रियाएं उसकी शक्ति के पूर इस्‍तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं, शक्ति का कोई अंश बचाकर नहीं रखता था, कंजूस बिल्‍कूल नहीं था, ऐसा दिलफेंक, ऐसा शरीरफेंक चाहे मनुष्‍यों से संभव न हो, लेकिन मनुष्‍य ही हो सकता है, मनुष्‍य का आदर्श, चाहे जिसके पहुंचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रुक जाना पड़ता हो। कृष्‍ण ने, खुद गीत गया है स्थितप्रज्ञ का, ऐसे मनुष्‍य का जो अपनी शक्ति का पूरा और जमकर इस्‍तेमाल करता हो। 'कूर्मोगानीव' बताया है ऐसे मनुष्‍य को। कछुए की तरह यह मनुष्‍य अपने अंगों को बटोरता है, अपनी इंद्रियों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्‍व है इसका कि इंद्रियार्थों से उन्‍हें पूरी तरह हटा लेता है, कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उल्‍टा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जमकर - भोग भी, त्‍याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्‍ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भी, कृष्‍ण ने एकांगी परिभाषा दी, अचल स्थितप्रज्ञ की, चल स्थितप्रज्ञ की नहीं। उसकी परिभाषा तो दी तो इंद्रियार्थों में लपेटकर, घोलकर। कृष्‍ण खुद तो दोनों था, परिभाषा में एकांगी रह गया। जो काम जिस समय कृष्‍ण करता था, उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करता था, अपने लिए कुछ भी नहीं बचता था। अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। 'कूर्मोगानीव' के साथ-साथ 'समग्र-अंग-एकाग्री' भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करो, जमकर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंककर। देवता बनने की कोशिश में मनुष्‍य कुछ कृपण हो गया है, पूर्ण आत्‍मसमर्पण वह कुछ भूल-सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने-आपको किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्‍मसमर्पण करे। झाड़ू लगाए तो जमकर, या अपनी इंद्रियों का पूरा प्रयोग कर युद्ध में रथ चलाए तो जमकर, श्‍यामा मालिन बनकर राधा को फूल बेचने जाए तो जमकर, अपनी शक्ति का दर्शन ढूंढ़े और गाए तो जमकर। कृष्‍ण ललकारता है मनुष्‍य को अकृपण बनने के लिए, अपनी शक्ति को पूरी तरह ओर एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्‍य करता कुछ है, ध्‍यान कुछ दूसरी तरफ रहता है। झाड़ू देता है फिर भी कूड़ा कोनों में पड़ा रहता है। एकाग्र ध्‍यान न हो तो सब इंद्रियों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। 'कूर्मोगानीव' और 'समग्र-अंग-एकाग्री' मनुष्‍य को बनना है। यही तो देवता की मनुष्‍य बनने की कोशिश है। देखो, मां, इंद्र खाली वास लेता है, मैं तो खाता हूं।
आसमान के देवताओं को जो भगाए उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी कृष्‍ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उंगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्‍ण किस काम का। फिर कृष्‍ण के रक्षा-युग का आरंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है। कालिया-दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्‍ण की उंगली दु:खी होगी, अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुंझला कर सहारा देने को कहा होगा। मां को कुछ इतरा कर उंगली दुखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आंख लड़ाते हुए अपनी मुस्‍कान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्‍ण की तो आपस में गंभीर और प्रफल्लित मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्‍ण ने अधिक निहारा होगा, मां की ओर इतरा कर, या राधा की ओर प्रफुल्‍ल होकर। उंगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्‍ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा था, राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्‍थल पर कृष्‍ण से गंगा मांगी। बेचारे कृष्‍ण को कौन-कौन-से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उंगली दुख रही है। चलो, उसको सहारा दें।
गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने, जिनमें पंडे होते ही हैं, प्रश्‍न किया कि मैं कहां का हूं? मैंने छेड़ते हुए उत्‍तर दिया, राम की अयोध्‍या का। पंडों ने जवाब दिया, सब माया एक है। जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्‍तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन-मिसरी वाले कृष्‍ण से लगा है।
माखन-मिसरी वाला कृष्‍ण, सत्‍तू वाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उंगली अब तक दुख रही है।
एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई। पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकला, न निकलने वाला था। लेकिन क्‍या मीठी मुस्‍कान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्‍ण मीठी बात करना सिखा गया है। आसमान वाले देवताओं को भगा गया है, माखन-मिसरी वाले देवों की प्रतिष्‍ठा कर गया है। लेकिन उसका अपना कौन-कौन-सा अंग अब तक दुख रहा है।
कृष्‍ण की तरह एक और देवता हो गया है जिसने मनुष्‍य बनने की कोशिश की। उसका राज्‍य संसार में अधिक फैला। शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था। शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उंगली सिर्फ न दुखी, उसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूटकर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्‍यान करके अपने सीमा बांधने वाले चमड़े से बाहर उछलते हैं। हो सकता है कि ईसू मसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्‍यता के पुरखे हैं। ईसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्‍ण-लीला का मजा ब्रज और भारतभूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्‍ण की नियति कठिन है। जो भी हो, कृष्‍ण और क्रिस्‍टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्‍य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्‍ठ हैं। फिर भी, क्रिस्‍टोस प्रेम के आत्‍मोसर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्‍ण संपूर्ण मनुष्‍य-लीला के लिए। कभी कृष्‍ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगे, तो संभव है उसकी लीला दुनिया-भर में रस फैलाए।
कृष्‍ण बहुत अधिक हिंदुस्‍तान ने साथ जुड़ा हुआ है। हिंदुस्‍तान के ज्‍यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं। मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्‍प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्‍तान की उत्‍तर-दक्षिण एकता का देव है। द्वापर का कृष्‍ण देश की पूर्व-पश्चिम एकता का देव है। राम उत्‍तर-दक्षिण और कृष्‍ण पूर्व-पश्चिम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि देश को उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-‍पश्चिम एक करना ही राम और कृष्‍ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्‍पत्ति राजनीति से है, बिखरे हुए स्‍वजनों को इकठ्ठा करना, कलह मिटाना, सुलह कराना और हो सके तो अपनी और सबकी सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊंचा उठाना, सदाचार की दृष्टि से और आत्‍म-चिंतन की भी।
देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्‍यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्‍पत्ति हुई है। अलबत्‍ता, धर्म इन आवश्‍यकताओं से ऊपर उठकर, मनुष्‍य को पूर्ण करने की भी चेष्‍टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है, उतना और कोई धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्‍ण के किस्‍से तो मनगढ़ंत गाथाएं हैं, जिनमें एक अद्वितीय उद्देश्‍य हासिल करना था, इतने बड़े देश के उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को एक रूप में बांधना था। इस विलक्षण उद्देश्‍य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्‍से बने। मेरा मतलब यह नहीं कि सब के सब किस्‍से झूठे हैं। गोवर्धन पर्वत का किस्‍सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही, साथ-साथ न जाने कितने और किस्‍से, जो कितने और आदमियों के रहे हों, एक कृष्‍ण अथवा राम के साथ जुड़ गए हैं। जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ। यह भी हो सकता है कि कोई न कोई चमत्‍कारिक पुरुष राम और कृष्‍ण के नाम हुए हों। चमत्‍कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो। लेकिन उन गाथाकारों का यह कम अनहोना चमत्‍कार नहीं है, जिन्‍होंने राम और कृष्‍ण के जीवन की घटनाओं को इस सिलसिले और तफसील में बांधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है। आज के हिंदुस्‍तानी राम और कृष्‍ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं, जबकि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुंधली स्‍मृति-मात्र रह गए हैं।
महाभारत हिंदुस्‍तान की पूर्व-पश्चिम यात्रा है, जिस तरह रामायण उत्‍तर-दक्षिण यात्रा है। पूर्व-पश्चिम यात्रा का नायक कृष्‍ण है, जिस तरह उत्‍तर-दक्षिण यात्रा का नायक राम है। मणिपुर से द्वारिका तक कृष्‍ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ है, जैसे जनकपुर में श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का। राम का काम अपेक्षाकृत सहज था। कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी। राम का मुकाबला या दोस्‍ती हुई भील, किरात, किन्‍नर, राक्षस इत्‍यादि से, जो उसकी अपनी सभ्‍यता से अलग थे। राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्‍यता में ढाल देना, चाहे हराए बिना या हराने के बाद।
कृष्‍ण को वास्‍ता पड़ा अपने ही लोगों से। एक ही सभ्‍यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व-पश्चिम एकता कृष्‍ण को स्‍थापित करनी पड़ी। इस काम में पेंच ज्‍यादा थे। तरह-तरह की संधि और विग्रह का क्रम चला। न जाने कितनी चालकियां और धूर्तताएं भी हुईं। राजनीति का निचोड़ भी सामने आया - ऐसा छनकर जैसा फिर और न हुआ। अनेकों ऊंचाइयां भी छुई गईं। दिलचस्‍प किस्‍से भी खूब हुए। जैसी पूर्व-पश्चिम राजनीति जटिल थी, वैसे ही मनुष्‍यों के आपसी संबंध भी, खासकर मर्द-औरत के। अर्जुन की मणिपुर वाली चित्रागंदा, भीम की हिडंबा, और पांचाली को तो कहना ही क्‍या। कृष्‍ण की बुआ कुंती का एक बेटा था अर्जुन, दूसरा कर्ण, दोनों अलग-अलग बापों से, और कृष्‍ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया। फिर भी, क्‍यों जीवन का निचोड़ छनकर आया? क्‍योंकि कृष्‍ण जैसा निस्‍व मनुष्‍य न कभी हुआ और उससे बढ़कर तो कभी होना भी असंभव है। राम उत्‍तर-दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना, राजा भी हुआ। कृष्‍ण तो अपनी मुरली बजाता रहा। महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्‍ण ने कभी कुछ लिया नहीं, दिया ही।
पूर्व-‍पश्चिम एकता की दो धुरियां स्‍पष्‍ट ही कृष्‍ण-काल में थीं। एक पटना-गया की मगध-धुरी और दूसरी हस्तिनापुर-इंद्रप्रस्‍थ की कुरु-धुरी। मगध-धुरी का भी फैलाव स्‍वयं कृष्‍ण की मथुरा तक था जहां मगध-नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्‍य करता था। बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित-मित्र थे। मगध-धुरी के खिलाफ कुरु-धुरी का सशक्‍त निर्माता कृष्‍ण था। कितना बड़ा फैलाव किया कृष्‍ण ने इस धुरी का। पूर्व में मणिपुर से लेकर पश्चिम में द्वारिका तक इस कुरु-धुरी में समावेश किया। देश की दोनों सीमाओं, पूर्व की पहाड़ी सीमा और पश्चिम की समुद्री सीमा को फांसा और बांधा। इस धुरी को कायम ओर शक्तिशाली करने के लिए कृष्‍ण को कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़े, और कितनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसने पहला वार अपने ही घर मथुरा में मगधराज के दामाद पर किया। उस समय सारे हिंदुस्‍तान में यह वार गूंजा होगा। कृष्‍ण की यह पहली ललकार थी। वाणी द्वारा नहीं, उसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजाई। कौन अनसुनी कर सकता था। सबको निमंत्रण हो गया यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो। अंतिम चुनाव भी कृष्‍ण ने बड़े छली रूप में रखा। कुरु-वंश में ही न्‍याय-अन्‍याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्‍यायी टुकड़ी के साथ मगध-धुरी को जुड़वा दिया। कृष्‍ण संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरुवंश का अंदरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्‍ण जानता था कि वह तो इंद्रप्रस्‍थ-हस्तिनापुर की कुरु-धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है।
राजगिरि राज्‍य कंस-वध पर तिलमिला उठा होगा। कृष्‍ण ने पहले ही वार में मगध की पश्चिमी शक्ति को खत्‍म-सा कर दिया। लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्‍यादा बटोरनी और बढ़ानी थी। यह तो सिर्फ आरंभ था। आरंभ अच्‍छा हुआ। सारे संसार को मालूम हो गया। लेकिन कृष्‍ण कोई बुद्धू थोड़े ही था जो आरंभ की लड़ाई को अंत की बना देता। उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिंदुस्‍तान की शक्ति से जूझ बैठता। वार करके, संसार को डंका सुना के कृष्‍ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूर, द्वारिका में। तभी से उसका नाम रणछोड़दास पड़ा। गुजरात में आज भी हजारों लोग, शायद एक लाख से भी अधिक लोग होंगे, जिनका नाम रणछोड़दास है। पहले मैं इस नाम पर हंसा करता था, मुस्‍काना तो कभी न छोडूंगा। यों, हिंदुस्‍तान में और भी देवता हैं जिन्‍होंने अपना पराक्रम भागकर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने। यह पुराना देश है। लड़ते-लड़ते थकी हड्डियों को भगाने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन कृष्‍ण थकी पिंडलियों के कारण नहीं भागा। वह भागा जवानी की बढ़ती हुई हड्डियों के कारण। अभी हड्डियों को बढ़ाने और फैलाने का मौका चाहिए था। कृष्‍ण की पहली लड़ाई तो आज तक की छापामार लड़ाई की तरह थी, वार करो और भागो। अफसोस यही है कि कुछ भक्‍त लोग भागने ही में मजा लेते हैं।
द्वारिका मथुरा से सीधे फासले पर करीब 700 मील है। वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब 1,050 मील होती है। बिचली दूरी इस तरह करीब 850 मील होती है। कृष्‍ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गया, साथ ही साथ देश की पूर्व-पश्चिम एकता हासिल करने के लिए उसने पश्चिम के आखिरी नाके को बांध लिया। बाद में, पांचों पांडवों के बनवास युग में अर्जुन की चित्रांगदा और भीम की हिडंबा के जरिए उसने पूर्व के आखिरी नाके को भी बांधा। इन फासलों को नापने के लिए मथुरा से अयोध्‍या, अयोध्‍या से राजमहल और राजमहल से इम्‍फाल की दूरी जानना जरूरी है। यही रहे होंगे उस समय के महान राजमार्ग। मथुरा से अयोध्‍या की बिचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्‍या से राजमहल करीब 470 मील है। राजमहल से इम्‍फाल की बिचली दूरी करीब सवा पांच सौ मील हो, यों वर्तमान सड़कों से फासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब 380 मील है। इस तरह मथुरा से इम्‍फाल का फासला उस समय के राजमार्ग द्वारा करीब 1,600 मील रहा होगा। कुरु-धुरी के केंद्र पर कब्‍जा करने और उसे सशक्‍त बनाने के पहले कृष्‍ण केंद्र से 800 मील दूर भागा और अपने सहचरों और चेलों को उसने 1,600 मील दूर तक घुमाया। पूर्व-पश्चिम की पूरी भारत यात्रा हो गई। उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियां और जानना जरूरी है। मथुरा से बनारस का फासला करीब 370 मील और मथुरा से पटना करीब 500 मील है। दिल्‍ली से, जो तब इंद्रप्रस्‍थ थी, मथुरा का फासला करीब 90 मील है। पटने से कलकत्‍ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्‍ते के फासले का कोई विशेष तात्‍पर्य नहीं, सिर्फ इतना ही कि कलकत्‍ता भी कुछ समय तक हिंदुस्‍तान की राजधानी रहा है, चाहे गुलाम हिंदुस्‍तान की। मगध-धुरी का पुनर्जन्‍म एक अर्थ में कलकत्‍ते में हुआ। जिस तरह कृष्‍ण-कालीन मगध-धुरी के लिए राजगिरि केंद्र है, उसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केंद्र है, और इन दोनों का फासला करीब 40 मील है। पटना-राजगिरि केंद्र का पुनर्जन्‍म कलकत्‍ते में होता है, इसका इतिहास के विद्यार्थी अध्‍ययन करें, चाहे अध्‍ययन करते समय संतापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्‍वावधान में क्‍यों हुआ।
कृष्‍ण ने मगध-धुरी का नाश करके कुरु-धुरी की क्‍यों प्रतिष्‍ठा करनी चाही? इसका एक उत्‍तर तो साफ है, भारतीय जागरण का बाहुल्‍य उस समय उत्‍तर और पश्चिम में था जो राजगिरि और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था। उसके अलावा मगध-धुरी कुछ पुरानी बन चुकी थी, शक्तिशाली थी, किंतु उसका फैलाव संकुचित था। कुरु-धुरी नई थी और कृष्‍ण इसकी शक्ति और इसके फैलाव दोनों का ही सर्वशक्तिसंपन्‍न निर्माता था, मगध-धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता, कुरु-धुरी को अपनी इच्‍छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था। सारे देश को बांधना जो था उसे। कृष्‍ण त्रिकालदर्शी था। उसने देख लिया होगा कि उत्‍तर-पश्चिम में आगे चलकर यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इ‍सलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र कहीं वहीं रचना चाहिए, जो इन आक्रमणों का सशक्‍त मुकाबला कर सके। लेकिन त्रिकालदर्शी क्‍यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध-धुरी बदला चुकाएगी और सैकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्‍व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्‍ण की भूमि के नजदीक यानी कन्नौज और उज्‍जैन तक खिसक चुकी होगी, किंतु अशक्‍त अवस्‍था में। त्रिकालदर्शी ने देखा शायद यह सब कुछ हो, लेकिन कुछ न कर सका हो। वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता। वह तो केवल रास्‍ता दिखा सकता था। रास्‍ते में भी शायद त्रुटि थी। त्रिकालदर्शी को यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्‍ते पर ज्ञानी ही नहीं, अनाड़ी भी चलेंगे और वे कितना भारी नुकसान उठाएंगे। राम के रास्‍ते चलकर अनाड़ी का भी अधिक नहीं बिगड़ता, चाहे बनना भी कम होता है। अनाड़ी ने कुरु-पांचाल संधि का क्‍या किया?
कुरु-धुरी की आधार-शिला थी कुरु-पांचाल संधि। आसपास के इन दोनों इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था जो कृष्‍ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया, जिनसे पांचाली का विवाह पांचों पांडवों से हो गया। यह पांचाली भी अद्भुत नारी थी। द्रौपदी से बढ़कर, भारत की कोई प्रखर-मुखी और ज्ञानी नारी नहीं। कैसे कुरु सभा को उत्‍तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्‍या दूसरे को दांव पर रखने की उसमें स्‍वतंत्र सत्‍ता है?
पांचों पांडव और अर्जुन भी उसके सामने फीके थे। यह कृष्‍णा तो कृष्‍ण के ही लायक थी। महाभारत का नायक कृष्‍ण, नायिका कृष्‍णा। कृष्‍णा और कृष्‍ण का संबंध भी विश्‍व-साहित्‍य में बेमिसाल है। दोनों सखा-सखी का संबंध पूर्ण रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु-धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था? जो हो, कृष्‍णा और कृष्‍ण का यह संबंध राधा और कृष्‍ण के संबंध से कम नहीं, लेकिन साहित्यिकों और भक्‍तों की नजर इस ओर कम पड़ी है। हो सकता है कि भारत की पूर्व-पश्चिम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म, न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा, शायद इसलिए कि यदि वह व्‍यस्‍क कर्मफल-हेतु बन जाता, तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था। उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी-केंद्र बनाए, उसके लिए दूसरों का इंद्रप्रस्‍थ और हस्तिनापुर ही अच्‍छा रहा। उसी तरह कृष्‍णा को भी सखी रूप में रखा, जिसे संसारी अपनी कहता है, वैसी न बनाया। कौन जाने कृष्‍ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दुखा था।
कृष्‍णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी, महान सुंदरी रही होगी। उसकी बुद्धि का तेज, उसकी चकित-हरिणी आंखों में चमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सुंदर सांवली, नखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है। राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्‍ण राधा में एकरस रहा। प्रौढ़ कृष्‍ण के मन पर कृष्‍णा छाई रही होगी, राधा और कृष्‍ण तो एक थे ही। कृष्‍ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी। बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्‍था में श्‍यामा को निहारना। कृष्‍ण-कृष्‍णा संबंध में और कुछ हो न हो, भारतीय मर्दों को श्‍यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर ममन करना चाहिए।
रामायण की नायिका गोरी है। महाभारत की नायिका कृष्‍णा है। गोरी की अपेक्षा सांवली अधिक सजीव है। जो भी हो, इसी कृष्‍ण-कृष्‍णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्‍म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्‍याग। कृष्‍णा पांचाल यानी कन्नौज के इलाके की थी, संयुक्‍ता भी। धुरी-केंद्र इंद्रप्रस्‍थ का अनाड़ी राजा पृथ्‍वीराज अपने पुरखे कृष्‍ण के रास्‍ते न चल सका। जिस पांचाली द्रौपदी के जरिए कुरु-धुरी की आधार-शिला रखी गई, उसी पांचाली संयुक्‍ता के जरिए दिल्‍ली-कन्नौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना। कभी-कभी लगता है कि व्‍यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्‍म होता है, कभी फीका कभी रंगीला। कहां द्रौपदी और कहां संयुक्‍ता, कहां कृष्‍ण और कहां पृथ्‍वीराज, यह सही है। फीका और मारात्‍मक पुनर्जन्‍म लेकिन पुनर्जन्‍म तो है ही।
कृष्‍ण की कुरु-धुरी के और भी रहस्‍य रहे होंगे। साफ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्‍व का निर्माता और प्रतीक था। उसी तरह जरासंध भौतिकवादी एकत्‍व का निर्माता था। आजकल कुछ लोग कृष्‍ण और जरासंध युद्ध को आदर्शवाद-भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं। वह सही जंचता है, किंतु अधूरा विवेचन। जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्‍व का इच्‍छुक था। बाद के मगधीय मौर्य और गुप्‍त राज्यों में कुछ हद तक इसी भौतिकवादी एकरूप एकत्‍व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का। कृष्‍ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्‍व का निर्माता था। जहां तक मुझे मालूम है, अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी एकत्व के आधार पर कभी नहीं हुआ। चिर चमत्‍कार तो तब होगा जब आदर्शवाद और भौतिकवाद के मिले-जुले बहुरूप एकत्‍व के आधार पर भारत का निर्माण होगा। अभी तक तो कृष्‍ण का प्रयास ही सर्वाधिक मानवीय मालूम होता है, चाहे अनुकरणीय राम का एकरूप एकत्‍व ही हो। कृष्‍ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल-जीवन है जो औरों में नहीं।
कृष्‍ण यादव-शिरोमणि था, केवल क्षत्रिय राजा ही नहीं, शायद क्षत्री उतना नहीं था, जितना अहीर। तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है, क्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पाई। विराट् विश्‍व और त्रिकाल के उपयुक्‍त कृष्‍ण बहुरूप था। राम और जरासंध एकरूप थे, चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केंद्रीयकरण और क्रूरता कम हो, लेकिन कुछ न कुछ केंद्रीयकरण तो दोनों में होता है। मौर्य और गुप्‍त राज्‍यों में कितना केंद्रीयकरण था, शायद क्रूरता भी।
बेचारे कृष्‍ण ने इतनी नि:स्‍वार्थ मेहनत की, लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा है। सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे - 'बोल हरि, हरि बोल' के उच्‍चारण से - अपनी आखरी यात्रा पर निकाले जाते हैं, नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिंदू मुर्दे 'राम नाम सत्‍य है' के साथ ही ले जाए जाते हैं। बंगाल के इतना तो नहीं, फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्‍ण का स्‍थान अच्‍छा है। कहना मुश्किल है कि राम और कृष्‍ण में कौन उन्‍नीस, कौन बीस है। सबसे आश्‍चर्य की बात है कि स्‍वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहां एक-दूसरे को 'जैरामजी' से नमस्‍ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह 'जैरामजी' बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह भी हो।
राम त्रेता के मीठे, शांत और सुसंस्‍कृत युग का देव है। कृष्‍ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम गम्‍य है, कृष्‍ण अगम्‍य है। कृष्‍ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद ओर कूटनीति की नकल करते हैं, उसका अथक निस्‍व उनके लिए असाध्‍य रहता है। इसीलिए कृष्‍ण हिंदुस्‍तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्‍ण ने कर्म राम से ज्‍यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे। यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्‍णनीति अब भी चलाई जाए। कृष्‍ण जो पूर्व-पश्चिम की एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उस नीति का औचित्‍य भी खत्‍म हो गया। बच गया कृष्‍ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्‍तानी इन दोनों का समन्‍वय नहीं कर पाए हैं। करें तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आए। राम रोऊ है, इतना कि मर्यादा भंग होती है। कृष्‍ण कभी रोता नहीं। आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकी, कुछ मौकों पर, जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्‍ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं।
कैसे मन और वाणी थे उस कृष्‍ण के। अब भी तब की गोपियां और जो चाहें वे, उसकी वाणी और मुरली की तान सुनकर रस विभोर हो सकते हैं और अपने चमड़े के बाहर उछल सकते हैं। साथ ही कर्म-संग के त्‍याग, सुख-दु:ख, शीत-उष्‍ण, जय-अजय के समत्‍व के योग और सब भूतों में एक अव्‍यय भाव का सुरीला दर्शन, उसकी वाणी से सुन सकते हैं। संसार में एक कृष्‍ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया।
वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्‍ण का संबंध कैसा था। क्‍या सखा-सखी का संबंध स्‍वयं एक अंतिम सीढ़ी और असीम मैदान है, जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं? कृष्‍ण छलिया जरूर था, लेकिन कृष्‍णा से उसने कभी छल न किया। शायद वचनबद्ध था, इसलिए। जब कभी कृष्‍णा ने उसे याद किया, वह आया। स्त्री-पुरुष की किसलय-मित्रता को, आजकल के वैज्ञानिक, अवरुद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं। यह अवरोध सामाजिक या मन के आंतरिक कारणों से हो सकता है। पांचों पांडव कृष्‍ण के भाई थे और द्रौपदी कुरु-पांचाल संधि की आधार-शिला थी। अवरोध के सभी कारण मौजूद थे। फिर भी, हो सकता है कि कृष्‍ण को अपनी चित्‍तप्रवृत्तियों का कभी निरोध न करना पड़ा हो। यह उसके लिए सहज और अंतिम संबंध था, ठीक उतना ही सहज और रसमय, जैसा राधा से प्रेम का संबंध था। अगर यह सही है, तो कृष्‍ण-कृष्‍णा के सखा-सखी संबंध का ब्‍योरा दुनिया में विश्‍वास का होना चाहिए और तफसीली से, जिससे स्त्री-पुरुष संबंध का एक नया कमरा खुल सके। अगर राधा की छटा कृष्‍ण पर हमेशा छाई रहती है, तो कृष्‍ण की घटा भी उस पर छाई रहती है। अगर राधा की छटा निराली है, तो कृष्‍ण की घटा भी। छटा में तुष्टिप्रदान रस है, घटा में उत्‍कंठा-प्रधान कर्तव्‍य।
राधा-रस तो निराला है ही। राधा-कृष्‍ण हैं, राधा कृष्‍ण का स्‍त्री रूप और कृष्‍ण राधा का पुरुष रूप। भारतीय साहित्‍य में राधा का जिक्र बहुत पुराना नहीं है, क्‍योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है 'अनुराधा' के नाम से। नाम ही बताता है प्रेम और भक्ति का वह स्‍वरूप, जो आत्‍मविभोर है, जिससे सीमा बांधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती। आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्‍मविभोरता को पाने की कोशिश की। बहुत दूर तक गई मीरा, शायद उतनी दूर गई जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो। फिर भी, मीरा की आत्‍मविभोरता में कुछ गर्मी थी। कृष्‍ण को तो कौन जला सकता है, सुलगा भी नहीं सकता, लेकिन मीरा के पास बैठने में उसे जरूर कुछ पसीना आए, कम से कम गर्मी तो लगे। राधा न गरम है न ठंडी, राधा पूर्ण है। मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है। पद्मिनी मीरा की पुरखिन थी। दोनों चित्‍तौड़ की नायिकाएं हैं। करीब ढाई सौ वर्ष का अंतर है। कौन बड़ी है, वह पद्मिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्‍ण के लिए नाचने से कोई मना न कर सका। पुराने देश की यही प्रतिभा है। बड़ा जमाना देखा है इस हिंदुस्‍तान ने। क्‍या पद्मिनी थकती-थकती सैकड़ों वर्ष में मीरा बन जाती है? या मीरा ही पद्मिनी का श्रेष्‍ठ स्‍वरूप है? अथवा जब प्रताप आता है, तब मीरा फिर पद्मिनी बनती है। हे त्रिकालदर्शी कृष्‍ण! क्‍या तुम एक ही में मीरा और पद्मिनी नहीं बना सकते?
राधा-रस का पूरा मजा तो ब्रज-रज में मिलता है। मैं सरयू और अयोध्‍या का बेटा हूं। ब्रज-रस में शायद कभी न लोट सकूंगा। लेकिन मन से तो लोट चुका हूं। श्री राधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रहकर मैंने राधानारी के गीत सुने हैं।
कृष्‍ण बड़ा छलिया था। कभी श्‍यामा मालिन बनकर, राधा को फूल बेचने आता था। कभी वैद्य बनकर आता था, प्रमाण देने कि राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है। कभी राधा प्‍यारी को गोदाने का न्‍योता देने के लिए गोदनहारिन बनकर आता था। कभी वृंदा की साड़ी पहन कर आता था और जब राधा उससे एक बार चिपटकर अलग होती थी, शायद झुंझलाकर, शायद इतराकर, तब भी कृष्‍ण मुरारी को ही छट्ठी का दूध याद आता था, बैठकर समझाओ राधारानी को कि वृंदा से आंखें नहीं लड़ाईं।
मैं समझता हूं कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुई है, तो सिर्फ ब्रज में और कान्‍हा के पास। शायद इसीलिए आज भी हिंदुस्‍तान की औरतें वृंदावन में जमुना के किनारे एक पेड़ में रूमाल जितनी चुनड़ी बांधने का अभिनय करती हैं। कौन औरत नहीं चाहेगी कन्‍हैया से अपनी चुनड़ी हरवाना, क्‍योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्‍टजनों द्वारा चीरहरण के समय कृष्‍ण ही उनकी चुनड़ी अनंत करेगा। शायद जो औरतें पेड़ में चीर बांधती हैं, उन्‍हें यह सब बताने पर वह लजाएंगी, लेकिन उनके पुत्र पुण्‍य आदि की कामना के पीछे भी कौन-सी सुषुप्‍त याद है।
ब्रज की मुरली लोगों को इतना विह्रल कैसे बना देती है कि वे कुरुक्षेत्र के कृष्‍ण को भूल जाएं और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्‍या का राम मणिपुर से द्वारिका के कृष्‍ण को कभी भुलाने न देगा। जहां मैंने चीर बांधने का अभिनय देखा उसी के नीचे वृंदावन के गंदे पानी का नाला बहते देखा, जो जमुना से मिलता है और राधारानी के बरसाने की रंगीली गली में पैर बचा-बचाकर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गंदगी में न सन जाए। यह वही रंगीली गली है, जहां से बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी लेकर निकलती हैं और जिनके नुक्‍कड़ पर नंद गांव में मर्द मोटे साफे बांध और बड़ी ढालों से अपनी रक्षा करते हैं। राधारानी अगर कहीं आ जाए, तो वह इन नालों और गंदगियों को खत्‍म करे ही, बरसाने की औरतों के हाथ में इत्र, गुलाल और हल्‍के, भीनी महक वाले, रंग की पिचकारी थमाए और नंद गांव के मर्दों को होली खेलने के लिए न्‍योता दे। ब्रज में महक और नहीं है, कुंज नहीं है, केवल करील रह गए हैं। शीतलता खत्‍म है। बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढूंढा। पांच-दस घर होंगे। वहां बनियाइनों और ब्राह्मणियों का जमाव हो गया है। जब किसी जात में कोई बड़ा आदमी या बड़ी औरत हुई, तीर्थ-स्‍थान बना और मंदिर और दुकानें देखते-देखते आईं, तब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्‍लान थे, गरीब, कृश और रोगी। कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज-शत्रु समझने लगे हैं। मैं तो द्विज-मित्र हूं, इसलिए देख रहा हूं कि राधारानी की गोपियों, मल्‍लाहिनों और चमाइनों को हटाकर द्विजनारियों ने भी अपनी कांति खो दी है। मिलाओ ब्रज की रज में पुष्‍पों की महक, दो हिंदुस्‍तान को कृष्‍ण की बहुरूपी एकता, हटाओ राम का एकरूपी द्विज-शूद्र धर्म, लेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्‍ते पर, सच और नियम पालन कर।
सरयू और गंगा कर्तव्‍य की नदियां हैं। कर्तव्‍य कभी-कभी कठोर होकर अन्‍यायी हो जाता है और नुकसान कर बैठता है। जमुना और चंबल, केन तथा दूसरी जमुना-मुखी नदियां रस की नदियां हैं। रस में मिलन है, कलह मिटाता है। लेकिन आलस्‍य भी है, जो गिरावट में मनुष्‍य को निकम्‍मा बना देता है। इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्‍ण ने अपनी लीला की, लेकिन कुरु-धुरी का केंद्र उसने गंगा के किनारे ही बसाया। बाद में, हिंदुस्‍तान के कुछ राज्‍य जमुना के किनारे बने और एक अब भी चल रहा है। जमुना, क्‍या तुम कभी बदलोगी, आखिर गंगा में ही तो गिरती हो। क्‍या कभी इस भूमि पर रसमय कर्तव्‍य का उदय होगा। कृष्‍ण! कौन जाने तुम थे या नहीं। कैसे तुमने राधा-लीला को कुरु-लीला से निभाया। लोग कहते हैं कि युवा कृष्‍ण का प्रौढ़ कृष्‍ण से कोई संबंध नहीं। बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहीं। बात इतनी सच नहीं, क्‍योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्‍ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के बताई हैं। सभ्‍य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करते, जो समझते हैं वे, और जो नहीं समझते वे भी। महाभारत में राधा का जिक्र हो कैसे सकता है। राधा का वर्णन तो वहीं होगा जहां तीन लोक का स्‍वामी उसका दास है। रास का कृष्‍ण और गीता का कृष्‍ण एक है। न जाने हजारों वर्ष से अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्‍यों भारी हो जाता है? बताओ कृष्‍ण!

Wednesday, 15 August 2018

नाम में क्या रखा है!!!!


जी, आज पंद्रह अगस्त है. सन सैंतालिस के १४ अगस्त के निविड़ तम प्रहर में जब दुनिया की अमूमन आधी आबादी औंघियायी हुई थी अपने मुकद्दर से करार करते एक नए हिन्दुस्तान के सूरज ने पूरब के क्षितिज पर दस्तक देना शुरू किया था. और तब से अपने आब और रुआब के शौकत को सरे आम करता यह सूरज आसमान में चढते जा रहा है. कोई शक नहीं कि बीते इकहत्तर सालों में हमने कई बुलंदियाँ छुई है और अब तो दूसरों की दहलीज़ को भी दहला  दे रहे हैं. लेकिन जो एक बात सबसे ज्यादा आज खटक रही है वह आम आदमी और जान माल के महफूज़ होने का सवाल है. जम्हूरियत की रूह भले ही मजबूती पकड़ी हो लेकिन यह सारी खुशफहमी औंधे मुंह गिरती दिखती है जब हम उन तमाम मसलों और दिक्कतों से लबरेज़ दीखते हैं, वो भी किसी ख़ास दिन कि हम घर से बाहर निकलने में उस दिन हिचकिचाते हैं. महफूज़ियत के ख्याल से वह दिन इतना खौफनाक होता है कि आम आदमी बाहर कहीं भी आने जाने में आना कानी करता है. सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था को भी धत्ता बताकर ऐसी वारदातें हो जाती हैं कि मन में भय और संशय का घर कर जाना लाजिमी है. ये माकूल समय है जब हम इस बात पर गौर फरमायें कि आखिर वह चूक कहाँ और कैसे होती है! हांलाकि अधिकांश चूकें गैर इरादतन और सिर्फ निरा लापरवाही का सबब ही होती हैं.

लापरवाही के एक ऐसे ही मिसाल से हमारा सामना कल हुआ. वाकया ये हुआ कि हम दिल्ली से पटना जाने के लिए गो एयर का विमान पकड़ने टी 2 टर्मिनल पहुंचे. कल यानी १४ अगस्त को. सारी दिल्ली तक़रीबन छावनी में तब्दील हो चुकी थी. सुरक्षा जांच के बाद हवाई अड्डे में प्रवेश हुआ. बोर्डिंग पास के काउंटर पर पहुंचा. हमसे पहले के यात्री को काउंटर वाले ने थोड़ी बहुत बतकुच्चन के बाद बड़े अधिकारी के पास भेज दिया. मसला था जमजम के अतिरिक्त भार के शुल्क का. यात्री का कहना था इस पर अतिरिक्त शुल्क देय नहीं है. खैर मेरी बारी आयी. पहले तो मैंने पूछ लिया कि ये जमजम क्या होता है. मैं आदतन जिज्ञासु जो ठहरा! मुझे पता चला कि मक्का से लाये पवित्र जल को जमजम कहते हैं. इसी बीच उसी विमान कंपनी के एक अन्य स्टाफ ने उस काउंटर क्लर्क को बताया कि वह यात्री सही थे. तबतक यात्री थोड़े असहज अवस्था में बड़े अधिकारी के काउंटर की तरफ बढ़ चले थे.

अब मेरी बारी थी. मेरा परिचय पत्र और टिकट लिया गया. फिर बोर्डिंग पास मिला और मैं सुरक्षा जांच के लिए आगे बढ़ गया. सुरक्षा जांच में फिर सामान की स्कैनिंग के साथ मेरा बोर्डिंग पास चेक किया गया और उस पर तसल्ली की मुहर लगा मुझे लौटा दिया गया. आदतन मैंने बोर्डिंग पास पर अपना द्वार संख्या पढ़ा और निर्दिष्ट द्वार संख्या ३१ की ओर बढ़ गया. १२:३५ अपराह्न में विमान की उड़ान निर्धारित थी. करीब १२:०० बजे द्वार संख्या परिवर्तन की घोषणा हुई और इसे उपरी तल पर द्वार संख्या ३५ में परिवर्तित कर दिया गया. थोड़ी अफरा तफरी के बाद विमान में प्रवेश के लिए फिर से बोर्डिंग पास और सुरक्षा जांच हुई. यहाँ से भी निवृत होकर मैं आगे बढ़ा.

फिर एक सुरक्षा जांच! होना भी चाहिए. कल १५ अगस्त ! वक़्त की दरकार! यहाँ एक महिला स्टाफ. उन्होंने हमें रोका. बोर्डिंग पास को जांचने के बाद उन्होंने वाकी टाकी पर किसी से पूछा कि क्या किसी 'लेवल फोर' पैसेंजर को आपने पास इशू किया है. पता नहीं दोनों में क्या बात हुई. हाँ उनके मुंह से एक मुस्लिम नाम का उच्चारण जरुर हुआ. मुझे आगे बढ़ने की अनुमति मिल गयी. लेकिन मेरा जिज्ञासु मन उनसे पूछ बैठा, ' मैडम, ये 'लेवल फोर पैसेंजर' क्या होता है.' उन्होंने मुझे टरकाने के अंदाज़ में त्वरित उत्तर दिया, 'सुरक्षा के ख़याल से संवेदनशील यात्री.'  थोडी देर तो मैं इसी ऊहापोह में रहा कि भला मेरे जैसे यात्री का सुरक्षा की अति संवेदनशीलता से क्या सरोकार! न ही मैं कोई अति विशिष्ट व्यक्ति और न ही कोई कसाई कसाव! खैर! आगे बढ़ा.

सुरक्षा जांच का एक और काउंटर. यहाँ पर सामान की तलाशी और बोर्डिंग पास की जांच! मैं आह्लादित था इस चाक चौबंद चेकिंग पर. सतर्कता की कसरत में कोई कसर नहीं! वहाँ से अब मैं विमान में प्रवेश करने वाला ही था कि जिज्ञासा की बुरी लत से परेशान मेरा मन रुककर 'लेवल फोर' पर विचारने लगा और वैचारिक विमर्श की विलक्षण विधा में इस बार मैंने भलीभांति अपने बोर्डिंग पास को शब्द दर शब्द पढना शुरू किया. मुझे तो मानों काठ मार गया! बोर्डिंग पास पर मेरा नाम लिखा था- 'मुहम्मद नवेद आलम'!  भाई, चाक चौबंद सुरक्षा जांच की चौकसी ने तो मुझे थर्राया ही, चिंता तो ये सताने लगी कि मेरे यात्रा-भत्ता के भुगतान का क्या होगा! मैं तत्काल समीप ही खड़े एक सुरक्षा अधिकारी की ओर लपका. उन्हें अपना टिकट दिखाया. परिचय पत्र दिखाया. मेरी बाल सुलभ शराफ़त पर गदगद होते बड़ी नम्रता से बोले, सर आप जाएँ, अपनी जगह लें. फिर मैंने विनती की, ज़रा मेरा बोर्डिंग पास भी देख लें. बोर्डिंग पास देखते ही उनकी सहृदय मुखाकृति पर वातानुकूलित-क्षेत्र-दुर्लभ पसीने की बुँदे छलक आयी. अब तो एयरलाइन्स और सुरक्षा अधिकारियों के बीच नीति और विधान के बहुमुखी व्याख्यान का आदान प्रदान प्रारम्भ हो गया. एक 'लेवल फोर यात्री' दूसरे नाम का परिचय पत्र लेकर "महाभारत में भगवान के भगीने अभिमन्यु" के कौशल को शर्मसार करता सुरक्षा का सातों व्यूह भेद गया! मुझे सलाह दी गयी कि यात्रा स्थगित कर दें, अगली विमान से भेज दिया जाएगा मानों मैं कोई लावारिस सामान होऊं और मेरे वारिस का इंतज़ाम अगली विमान में हो जाएगा. एक तो चोरी फिर बलजोरी! मैं अड़ गया.मेरी मीटिंग है पटना में. संभवतः मेरे सरकारी अधिकारी होने के छद्म रुआब से वे थोडा सहमे. फिर बोर्डिंग पास पर मेरे नाम को हाथ से सुधारकर अधिकारी ने एक हस्ताक्षर किया और मुझे ससम्मान फुसलाने के अंदाज़ में विमान के अतिविशिष्ट सीट पर बिठाया गया. इस आपाधापी में विमान नियत समय से एक घंटे विलम्ब से उड़ा. उड़ते विमान में फिर एक बार मेरे नाम की उद्घोषणा हुई और आग्रह (या आगाह!) किया गया कि विमान की व्योम बाला को आईडेंटीफाई कर दूँ.

तो इस वाकया ने १५ अगस्त के पूर्व दिवस की संवेदनशील सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी. हाँ एक सीख जरुर मिली कि हमारी हिन्दुस्तानी परम्परा में ब्रितानी शेक्सपियर का जुमला "नाम में क्या रखा है" नहीं चलेगा और आगे से अब अपने सामान के साथ साथ अपने नाम की सुरक्षा की जिम्मेवारी भी हमारी ही है. तभी इत्मीनान और सकून का जम्हूरियत-ए-हिन्द फूलेगा फलेगा! आज़ादी की सालगिरह मुबारक हो. जय हिन्द! जय विश्व!         

Monday, 16 July 2018

जेएनयु अड्डा


'अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए( मुक्तिबोध, अँधेरे में)', अपनी लफ्फाजी के इस फुलौने को फूंकने के पहले 'मंगलाचरण' के अंदाज़ में मैं सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई और एक दोहे का स्मरण करना चाहूँगा जिसका सम्बन्ध विभीषण रावण संवाद से है. दोहे से तुलसीदास ने संवाद का श्री गणेश किया है और चौपाई से इति श्री!

 सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
(अर्थात सचिव, वैद्य और गुरु भय या लाभ की आशा मे प्रिय और हितकर वाणी बोलते हैं तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म - तीनों का नाश होता है.) 
                            और
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
(अर्थात, हे रावण, आप मेरे पिता सदृश हैं . भले ही आप हमारी ह्त्या कर दें किन्तु राम को भजने में ही आपकी भलाई है. ऐसा कहकर विभीषण सचिव सहित आकाश मार्ग से चल दिए.)
 
 अब भला सचिव तो सत्ता का नौकर होता है और बैद्य 'बुद्धिजीवी' ! लेकिन गुरु ही एक ऐसा प्राणी है जो इन दोनों से इतर ' बुद्धिवीर' होता है, जिससे समाज को आशा होती है और जिसको समाज से आशा होती है. उसमे किसी भी तरह की मिलावट समझ लीजिये कि विनाश काल की आहट है. वही समय पड़ने पर रावण के दरबार में विभीषण बनकर उठ खडा हो सकता है और व्यवस्था को चुनौती देते हुए खरी खोटी सुना सकता है. हालाँकि कुछ ऐसा ही काम नन्द के दरबार में चाणक्य के हाथों भी संपन्न हुआ था लेकिन दोनों घटनाओं में थोड़ा अंतर है. विभीषण परिवार के सदस्य थे और अन्दर तक वह लंका परिवार की भावनाओं के साथ बंधे थे. चाणक्य के साथ ये बात नहीं थी. दूसरी बात विभीषण की घटना इस देश की माटी के मूल्यों के साथ अटूट रूप से नित्य प्रातः सुमिरे जाने की स्थिति तक जुड़ गयी है.
अब आप में कुछ तथाकथित 'बुद्धिविलासी' सम्प्रदाय के लोग आँखे घूरकर मुझे 'सेक्युलर वार्निंग' न दें , क्योंकि न तो मैं किसी 'मिथ' का इतिहासीकरण कर रहा हूँ और न ही किसी इतिहास का मिथ्याकरण. मैं तो  एक किताब की कथावस्तु की बात कर रहा हूँ जो पिछले दिनों एक ' रौंग नंबर' की तरह मुझे गपगपाने को मिल गयी.
यह पुस्तक है " जे एन यु अड्डा' !  और, इसके लेखक हैं प्रोफ़ेसर चंद्रकांत प्रसाद सिंह. अपने मित्रों में 'सी पी' के नाम से मशहूर डॉक्टर सिंह ने अपनी इस पुस्तक में जेएनयु कैंपस के अंदरूनी ज़ज्बातों की बड़ी तल्ख़ शिनाख्त की है. इस पुस्तक को पढने के पहले पुस्तक के नाम मात्र से मेरे दिमाग में एक साथ कई रेखाएं खिंच गयी. 
 सन १९७७ का ज़माना था. मैं नवीं कक्षा का छात्र था. गणित के दो पेपर होते थे . एक एलीमेंट्री और दूसरा एडवांस. उसी साल इमरजेंसी के बाद चुनाव भी हुए थे . मैं गया के टाउन स्कूल का छात्र था. 'जे पी' ने अपनी सरपरस्ती में जम्हूरियत की खैरियत के खातिर कई दलों का जमवाड़ा 'जनता पार्टी' चुनाव में उतारा था. चुनाव प्रचार में मुल्क के तकरीबन सारे बड़े नेता इंदिरा गाँधी, जे पी, मोरारजी भाई, जगजीवन राम, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनारायण, नानाजी देशमुख आदि आदि का भाषण गाँधी मैदान में होता था. गाँधी मैदान मेरे स्कूल से सटा पसरा पड़ा था. कभी तो पार्टी वालों की जबरदस्ती, तो कभी हम खुद भी क्लास से भागकर इन भाषणों की भीड़ बढाते और अपनी मंडली के पैनल में आज के वाचाल बुद्धिबिलासी टी वी पत्रकारों की तरह चिल्ला चिल्लाकर उन नेताओं की चीत्कार को विस्तार देते. नतीजा सामने तुरत आ गया था. मैं एडवांस गणित में ६/१०० अंकों के साथ देश की आदर्श 'भक्ति' में खेत हो गया था. मैंने कुछ दिनों बाद 'अपने पुत्र के भविष्य के सपनों को बुनते एक मध्यम वर्गीय पिता' के मुंह से यह कहते सुना कि यदि मन लगाकर पढ़ाई की तो दीक्षा का उपसंहार संस्कार जे एन यु में हो सकता है. यह था जे एन यु के नाम से मेरा पहला परिचय!
 फिर समय का चक्का नाचा. फल्गु की सुखी रेत में उस ६/१०० की टीसती स्मृति का पिंड दान कर मैं मुंगेर की हहराती उत्तरायनी गंगा की कष्ट हरनी गोद में आ गया . फिर पटना, रुड़की औए बम्बई के रास्ते आगे  की यात्रा तय करता हुआ दिल्ली में राष्ट्रीय ताप निगम में नौकरी पकड़ ली. मित्र मोह में शुरू के छ: महीने आई आई टी दिल्ली के छात्रावास में बीते. अक्सर अड्डाबाजी करने जे एन यु कैंपस अपने मित्रों के पास पहुँच जाता था. और यही वह समय था जब मैंने जे एन यु को बड़े करीब से जाना. बड़ा सजीव माहौल लगता था. 'सब कुछ' मुक्त और मुफ्त! आपस में विमर्श की बड़ी समृद्ध परम्परा. ऐसे भी हम इंजीनियरी और विज्ञान के सूखे ठूंठ बाड़ पेड़! वहाँ के छात्रों की लच्छेदार तहरीर सुनकर मन अघा जाता. कहाँ आई आई टी के छात्रावास सूखे जड़ निर्जीव पहाडों और पर्वत श्रृंखलाओं (काराकोरम,नीलगिरी, कुमायूं आदि)के नाम को ढोते, वहीँ जे एन यु के छात्रावास कलकल छलछल बहती सजीव चंचल नदियों के नाम में अपने आस्तित्व का उद्घोष करते. वहाँ किसी भी अलोकतांत्रिक और असभ्य हरकत को 'कंडेम' कर दिया जाता. एक ओर जहाँ हम कठिन से कठिन संरचनाओं को संतुलन के सरलतम समीकरण में समाहित करने की शैली के शिल्पकार थे, वहीँ कावेरी का ढाबा हिन्दुस्तान के दूर देहात में घटने वाली सरल से सरल घटनाओं को रूस, चीन और  क्यूबा की कटोरी में मार्क्स के मसाले के साथ प्रगतिशील तर्कों का तड़का बना एक अद्भुत अभिजात्य बौद्धिक शैली में पेश करता. उनकी तहरीरें भले हमारे सर के सतह का स्पर्श न कर पाती पर उनकी वार्ता शैली मन को गुदगुदाती जरूर. तब चंद्रकांत जी भी उसी गुदगुदाते गिरोह के सदस्य हुआ करते थे. उन्होंने वही से 'एम.फिल' किया और बाद में 'पीएचडी' भी. दोनों डिग्रीयों में उनके शोध निर्देशक थे - ज्ञानपीठ सम्मानित प्रसिद्द कवि केदारनाथ सिंह. इन्टर में पटना विश्वविद्यालय के हमारे सहपाठी (और हमारे मामा भी), चंद्रकान्तजी, अद्भुत प्रतिभा संपन्न और विलक्षण तर्क क्षमता के धनी छात्र रहे हैं. अभी वह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के जन संचार संस्थान में प्रोफ़ेसर हैं तथा एक प्रखर विचारक और चिन्तक हैं.
 ' कश्मीर फाइल ' और 'टर्निंग पॉइंट' जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों के स्क्रिप्ट लेखक और कथा निर्देशक रह चुके चंद्रकांत जी ने प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी बेबाकी और साफगोई से अपने ही संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की कलई परत दर परत उघेड दी है. लेखक अपनी किताब का वितान ९ फरवरी २०१६ को विश्वविद्यालय परिसर में घटित अशोभनीय देशद्रोही घटनाओं की पृष्ट भूमि पर तानता है. स्वस्थ विचार विमर्श की लोकतान्त्रिक परम्परा की ओट में परिसर में उठने वाले ये नारे लेखक को अंतर्मन तक व्यथित कर देते हैं.
"भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह
.....................................
भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी.
अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं"
उसी व्यथा की अकुलाहट से उपजे दर्द ने लेखक को जेएनयु की स्थापना से बरास्ता इसके उद्देश्य इसकी उपलब्धियों तक बड़ी तल्खी से तहकीकात करने की तड़प पैदा की है जो इस किताब में स्पष्ट प्रतिभाषित होती है. इतिहास के आईने से झांकती पंक्तियाँ जेएनयु की परिकल्पना पर प्रकाश डालती हैं,
"बात १९६४-६५ की है. पिता पंडित जवाहरलाल नेहरु के निधन के बाद इंदिरा गाँधी उनकी स्मृति में कुछ योजनायें बना रही थी तो एक विश्वविद्यालय भी बनाने का सुझाव राज(थापर) के पति रोमेश थापर ने ही दिया था ( शंकर शरण, 'जेएनयु का सच', भारतीय विचार मंच, २०१६, पृष्ठ ४). १९६०-७० के दशकों में राज थापर श्रीमती गांधी की निकटवर्ती रही थी. राज थापर की आत्म कथा(ऑल दीज़ इयर्स, पृष्ठ २३८) से उद्धृत करते ......लिखते हैं, " बहुत सोच विचार कर रोमेश ने एक ऐसे उत्कृष्ट संस्थान की कल्पना की जहाँ देश विदेश से स्कॉलर आकर तीन महीने से तीन वर्ष तक रहेंगे और शांति से विचार विमर्श कर सकेंगे.... अंततः तय हुआ कि दक्षिण दिल्ली में बनने वाले विश्वविद्यालय का नाम जवाहरलाल युनिवर्सिटी रखा जाय जहाँ भाषा अध्ययन के सिवा सभी कोर्स स्नाकोत्तर के रखे जाएँ और 'गुणवता' का ध्यान रखा जाय. इसे भविष्य का 'मॉडल' बनना था."
'गुणवता' और 'मॉडल' के बांयी और दांयी ओर लटकती तख्ती इसकी वर्तमान दुरावस्था पर लेखक के तंज की तल्खी है. लेखक ने आगे भिन्न भिन्न शीर्षकों में इस विश्वविद्यालय की सांगोपांग खबर ली है. इतिहास की झुठलाने की जिम्मेदारी, रेडिकल राजनीतिबाजी, तथ्य विरोध से देश विरोध तक, 'पैगम्बर' मार्क्स उवाच, अल्पमत मानसिकता का शिकार बहुमत, जेएनयु-राग बनाम देश-राग, वोट बैंक का बौद्धिक भोंपू, जेएनयु बनाम अन्य विश्वविद्यालय, मेकाले की मानस संताने , सोशल मीडिया ने बिगाड़ा खेल  आदि कसौटियों पर लेखक ने इस विश्वविद्यालय के परिदृश्य को बखूबी परखा है.
लेखक की चिंता बिलकुल जायज है कि "... विश्वविद्यालय डिग्री वितरण एजेंसी ( Degree Distribution Agency) बनकर रह गए हैं, मानों शिक्षण संस्थान नहीं 'राशन' की दूकान हों. अगर ऐसा नहीं होता तो दुनिया के दो सौ शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूचि से भारत के विश्वविद्यालय गायब नहीं होते. हर छोटे बड़े शहरों में कोचिंग संस्थानों की बाढ़ न आई होती और इनमें समाज-विज्ञान और भाषा साहित्यों की नहीं बल्कि सिर्फ विज्ञान और प्रोफेशनल विषयों की पढ़ाई न हो रही होती." गौरतलब है कि दुनिया के संस्थानों की रैंकिंग में जेएनयु का स्थान १२४५ है.
आगे लेखक का आक्रोश टपकता है, " ऐसा इसलिए भी कि  भारत में समाज विज्ञान-भाषा-साहित्य की पढ़ाई वास्तविकता और अपने जड़ों से कटी हुई है. लोगों को इनके तोता रटंत सिलेबस में जानने समझाने लायक कुछ विशेष नज़र नहीं आता जो काम का भी हो और आसपास के जीवन से मेल खाता हो. लेकिन यह भी सच है कि अपने जड़ों से कटे होने के कारण इन्होने मानसिक गुलामों और नक्कालों की फौज खड़ी कर रखी है..... इसी स्थिति को लक्षित करते हुए नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार और १९६० के दशक में भारत में मेक्सिको के राजदूत औकटेवियो पाज ने कहा था ' भारत के अभिजात वर्ग जैसा नक्काल दुनिया में कहीं का अभिजात वर्ग नहीं है.........यहीं वजह है कि जेएनयु जैसे प्रति छात्र प्रति शिक्षक सर्वाधिक केन्द्रीय सुविधा प्राप्त विश्वविद्यालय के सेक्युलर-वामी प्रोफेसर सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा प्राप्त आतंकवादियों अब्दुल कसाव और अफ़ज़ल गुरु के सम्मान में 'भारत तोड़क' नारे लगाने वालों के बचाव में सहज भाव से खड़े हो जाते हैं."
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने सूचनाओं को आम जन के आगे परोस दिया है. अब ज्ञान किसी अभिजात की बपौती नहीं रही. ज्ञान के प्रसार की प्रक्रिया ने जागरूकता की नयी लहर पैदा कर दी है. पुस्तक का दूसरा भाग २०१६ के फरवरी से दिसंबर महीने तक के जेएनयु घटना चक्र पर लेखक के सोशल मीडिया पर विचार और प्रबुद्ध व्यक्तियों की टिपण्णी का संकलन है. लेखक ने अपने ख़ास लहजे में बड़ी बेबाकी से राष्ट्र विरोधी तत्वों को चिन्हित किया है और उनकी कड़ी खबर ली है:-
"पता नहीं कौन है वो
कहाँ से आये हैं वो
कहाँ पर जायेगे वो
कहाँ ले जायेंगे वो
काका कलाम के नाम से परेशान हैं वो
तंजील की शहादत से हलकान हैं वो"
चंद्रकांत जी की यह किताब राष्ट्र धर्म के पालन को रेखांकित तो करती ही है साथसाथ जेएनयु में व्याप्त राष्ट्रविरोधी विरुदावलियों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाती है. यह समाज को नित नित सर उठाती छद्म बुद्धिविलासी राष्ट्र विध्वंसक शक्तियों की इस कथित अड्डेबाजी के विरुद्ध चेताती भी है, अभिव्यक्ति की आज़ादी को देश द्रोह की सीमा तक ले जाने की विसंगति और विद्रूपता से सावधान करती है और इतिहास को भूलकर इसको दुहराने के अभिशाप से सतर्क करती है. 
किताब की भाषा बातचीत की सरस शैली में है. तुष्टिकरण के लिए 'तेलमालिश नीति' जैसे खांटी देशी शब्द कथ्य को सीधे पाठकों के मन में उतारते हैं. उनकी पढ़ाई की पीठिका में पालित विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य और पत्रकारिता के बेल बूटे समवेत उभर आये हैं उनकी विवेचनाओं में. बड़े लहरदार लहजे में अपनी धार पीजाते चंद्रकान्तजी मानों अपना केंचुल उतारकर उन संपोलो को ललकार रहे हैं.  उसी परिवार की कोख से निकल अब वह विभीषण की मुद्रा में आ गये है और अपनी गुरुता का मंगलाचरण उचार रहे हैं:-
 तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

    
   
(उपरोक्त लेख पर 'जेएनयु अड्डा' के लेखक प्रोफेसर चंद्रकांत प्रसाद सिंह की टिपण्णी फेसबुक पर:-

Chandrakant P Singh ने जवाब दिया4 जवाब28 मिनट
Chandrakant P Singh आलोचना एक श्रेष्ठ सर्जनात्मक कर्म है जो आलोच्य पाठ को केंद्र में रखते हुए भी समाज-विश्व के उन अनगिन आकाश-गंगाओं को ढूँढ़ निकालती है जिनसे पाठ का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध होता है। इस दृष्टि से 'जेएनयू अड्डा' पर लिखी आपकी समीक्षा इस पुस्तक से संबद्ध होकर भी एक स्वतंत्र सर्जनात्मक उत्पाद की हैसियत रखती है। आभार और हार्दिक बधाई!
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Thursday, 10 May 2018

बामुलाहिजा होशियार! जिन्ना का जिन्न!!!

आपको लगता है न कि कुछ गज़ब की बातें हैं इस देश में . एक लुटेरा रत्नाकर अपने जीवन के उत्तरार्ध में ईश्वर की शरण में जाकर वाल्मीकि बन जाता है और रामायण की रचना कर घर घर में आराध्य बन जाता है.यह देश महाराणा प्रताप की पूजा करता है और उनके पूजे जाने के मूल कारण उनके घोर शत्रु को अकबर 'महान' के रूप में याद करता है. सरदार भगत सिंह को 'शहीदे आज़म' कहता है और उनको फांसी दिए जाने पर न केवल मौन व्रत धारण करने बल्कि 'महात्मा' इरविन के साथ समझौते में  अंग्रेजों को उनकी इस कार्यवाई को समर्थन देने वाले गाँधी को 'बापू' कहता है. अपने स्वातंत्र्य वीर सैनिको के काले पानी और जेल की कड़ी यातना को तीर्थ सा सम्मान देता है और आज़ादी की पूरी लड़ाई में एक दिन भी जेल का मुंह न देखने वाले आंबेडकर और जिन्ना को भी स्वतंत्रता सेनानी की संज्ञा देता है. धर्म के रक्षार्थ पुत्र की शहादत देने वाले सिख गुरुओं के ज़ज्बे को नम आँखों से आदर देता है और  धार्मिक अनुष्ठान में पिता को चुनौती देने वाले नचिकेता को अपना आदर्श मानता है. ऐसी अनगिनत घटनाये हैं जिसका ज़िक्र आपको हैरत और भ्रम में डाल सकता है.
नहीं! यह कोई भ्रम या हैरत में डालने वाली बात नहीं! यह इस महान माटी का संस्कार है जो न्याय की तुला में गुण को गुण के पलड़े पर और दोष को दोष के पलड़े पर तौलता है. जहाँ राम युद्ध के अंत में लक्ष्मण को रावण की विद्वता की महिमा बताते हैं और उसे श्रद्धा सुमन अर्पित करने को प्रेरित करते हैं. जहाँ कर्ण के मारे जाने पर कृष्ण की आँखों में आंसू आ जाते हैं और वह उसे अर्जुन से बड़ा योद्धा बताते हैं. ये अलग बात है कि समय समय पर राजनीति और पत्रकारिता के कुछ भोंडे दिक्भ्रमितों की 'डेमागौजरी' इस संस्कार पर जहर पटाने का काम किया करती है.
आप हमारा इशारा समझ ही गए होंगे. स्वतंत्रता प्राप्ति के सत्तर वर्षों बाद "सोशलिस्ट, सेक्युलर, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक भारत" के अलीगढ 'मुस्लिम' विश्वविद्यालय के छात्र संघ हॉल से जिन्ना की तस्वीर हटाने के लिए जो कुहराम मचा वह समकालीन परिदृश्य का एक दुखद चित्र प्रस्तुत करता है. आरोप है जिन्ना ने घर का बँटवारा कराया था. मैं तो थोड़ी देर के लिए दहशत में आ गया कि कुछ सिरफिरे हमारे 'अल्मा मैटर' आई आई टी रुड़की पहुंचकर वहाँ के ' मेन बिल्डिंग ' में स्थापित परम आदरणीय थॉमसन की मूर्ति को ध्वस्त न कर दें,इस बिना पर कि वह उस अंगरेजी राज के अंगरेज़ गवर्नर थे जिसने हमें गुलाम रखा था. या फिर इस संस्थान के पूर्व प्रमुख जॉर्ज कौटले की तस्वीर फेंक दे. आपको बताते चले कि थोमसन ने समूचे राष्ट्रमंडल देशों के इस सबसे पहले इंजीनियरिंग संस्थान की १८४७ में स्थापना की थी. और इतिहास गवाह है कि महान इंजिनियर कौटले ने जब हरिद्वार से गंगा के पानी को लेकर जाने वाली गंगा नहर का निर्माण किया तो तत्कालीन सिरफिरे धर्मांध तथाकथित गंगापुत्रों की भीष्म प्रतिज्ञ टोली ने सर 'जी कौटले' को ' गंगा काट ले ' कहकर उनका तीव्र विरोध किया था.
हम इस कृषि प्रधान देश भारत की उस संयुक्त परिवार व्यवस्था के जीवाणु हैं जहाँ परिवार में दूसरे बैक्टेरिया के जनमते ही पुश्तैनी ज़मीन में उसका नैसर्गिक हिस्सा स्वतः 'क्रिएट' हो जाता है. जिसमे, उत्पन होने वाली किसी भी बाधा के निवारण के लिए लाठी, भाला , बन्दुक से लेकर यहाँ की अदालतें और क़ानून अपनी चिरंतन सेवा देने के लिए अहर्निशं तत्पर हैं. जहाँ बँटवारा न्याय और कानून सम्मत है. जहाँ उसकी "रखो अपनी धरती तमाम, दे दो केवल पाँच ग्राम" मांग नहीं पूरी होने पर महाभारत छिड़ जाता है जो इस माटी का गौरव ग्रन्थ है. जहाँ राज हड़पने के लिए बेटे द्वारा बाप की ह्त्या करने की मगध साम्राज्य की पुश्तैनी परम्परा है.
हमारा मतलब आपको आत्महीनता के गर्त में नहीं धकेलना है बल्कि इस बात के लिए सजग करना है कि आत्म-मुग्धता के मोह जाल से निकलकर  बातों को हम उचित परिप्रेक्ष्य में लें. उनका समय और स्थान के सन्दर्भ में वस्तुनिष्ठ परीक्षण और मूल्याङ्कन करें और एक शिक्षित सोच विकसीत करें.
यह बात निर्विवाद है कि देश के विभाजन की पटकथा से पटाक्षेप तक जिन्ना एक सबसे बड़े खलनायक थे. इसलिए  मैं उस जीनियस वकील जिन्ना की वकालत नहीं कर रहा हूँ जो गाँधी के न केवल गुरुभाई थे बल्कि बड़े भाई थे. अर्थात, राजनीति में सीनियर थे ( इस जोड़ी का कुछ परिवर्द्धित रूप में स्वतात्र्योत्तर संस्करण देवी लाल और वी पी सिंह को मान सकते हैं उस 'राष्ट्रीय एकता महायज्ञ' को याद कर जो वी पी सिंह ने देवी लाल को राजनितिक पटकनी देने के लिए संपन्न की थी). दोनों गुरु गोखले के चेले थे. जिन्ना की तमन्ना थी "हम मुस्लिम गोखले बनें". बाल गंगाधर तिलक ने अपने मुकदमे का उन्हें स्वयं वकील बनाया और राजद्रोह के मामले में जिन्ना ने तिलक को जेल जाने से बचाया. इसके पहले के मामले में तिलक को मांडले जेल भेजने वाले जज की विदाई समारोह का जिन्ना ने यह कहकर सार्वजनिक बहिष्कार किया कि हमारे राष्ट्रभक्त तिलक को दण्डित करने वाले जस्टिस में हमारी कोई श्रद्धा नहीं. लार्ड मिन्टो के समक्ष आगा खान के हिन्दू विरोधी वक्तव्य का न केवल विरोध किया बल्कि गुज़राती अखबार के सम्पादक को पत्र लिखकर आगा खान को मुस्लिम प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया. वक्फ बोर्ड और इंडियन मिलिट्री अकादमी की स्थापना में योगदान दिया. कांग्रेस में रहते ही भारतीय मुसलमानों में राष्ट्रीय भाव जगाने के उद्देश्य से मज़हरुल हक़ और प्रसिद्द देशभक्त न्यायविद एम सी छागला  जैसे नेताओं के साथ मुस्लिम लीग से जुड़े. अपनी प्रबल सांप्रदायिक और मुस्लिम तुष्टिकरण विरोधी मिजाज़ में गाँधी के उस खिलाफत का घोर विरोध किया जिसमे कट्टर मज़हबी मुसलमानों ने अफगानिस्तान के राजा से भारत पर आक्रमण का न्योता दिया था और गाँधी ने इसे समर्थन भी दिया था. तिलक के साथ स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दू मुस्लिम एकता का राष्ट्रवादी संस्कार पुष्ट करने के लिए लखनऊ समझौता किया. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंगरेजों से स्वराज मांगने के लिए सड़क पर उतर आये. उनके राष्ट्रीय तेवर से जनता इतनी गदगद हुई कि चंदा कर जिन्ना हॉल का निर्माण कराया. काकोरी केस के स्वतंत्रता सेनानियों का केस लड़ा.
 सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा जब तक फिरोजशाह मेहता, गोखले और तिलक जिंदा रहे. फिर गाँधी पसरने लगे, नेहरु इतराने लगे और जिन्ना छितराने लगे. फिर तो एक ऐसा दौर आया जब वे राजनीतिक ठिकाने लगते प्रतीत हुए. उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था. पहले खिलाफत और फिर  मोतीलाल नेहरु रिपोर्ट में उनकी अनदेखी और उपेक्षा उनको भयंकर रूप से टीसने लगी. और फिर बहुत आगे चलकर १९३७ के चुनावों में कांग्रेस द्वारा उनकी घोर अवहेलना ने उनको कांग्रेस से बूरी तरह तोड़ दिया.  निराशा और बीमारी की अवस्था में वापस इंग्लैण्ड अपनी बहन के साथ लौट गए थे ये तकरीबन तय कर कि अब अदालती तक़रीर में ता जिंदगी बिता देंगे. लेकिन कुछ ही वर्षों बाद मृतप्राय मुस्लिम लीग को फिर से जिलाने की इल्तिजा लेकर कट्टरपंथी मुसलमान उनके पास गोलबंद होने लगे. थोड़ी ना नुकुर के बाद एक दूसरे जिन्ना का जन्म हुआ जिसने गाँधी, नेहरु और कांग्रेस के पैरो तले अपने कुचले अहंकार के फन को साम्प्रदायिकता और मज़हबी कट्टरपंथिता के 'संजीवन' ज़हर से भरपूर भरकर फुंफकारना शुरू किया.
अब मैं यहाँ इतिहास बांचने नहीं बैठा हूँ. उस के पन्ने आप खुद उलट कर अपनी आँखों से देखे. यह बताने आया हूँ आपको. किसी दूसरे की सुनकर कि कौआ आपका कान लेकर भाग गया, कौए के पीछे न दौड़े! पहले अपना कान देखें! सरोजिनी नायडू, मोहम्मद करीम छागला, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, ऐताज़ अहसन, डॉ अजीत जावेद, आयेशा जलाल, अकबर अहमद, एच एम सीरवाई, क्रिस्टोफर ली, हेक्टर बोलिथा और स्टैनली वाल्पोर्ट जैसे कई लेखकों की पुस्तकों की भरमार पडी है आपके इतिहास ज्ञान के लिए. मेरा तो बस इतना कहना है कि लोकतंत्र हमारे लिए महज़ एक व्यवस्था नहीं बल्कि एक संस्कार है. हम अपनी अभिव्यक्तियों में और प्रतिक्रियाओं में अपनी माटी के संस्कार को न भूलें. घर में बंटवारा हो जाने के बाद अपने घर में टंगे अविभाजित संयुक्त परिवार के पुराने फोटो में हम आग नहीं लगाते बल्कि स्मृतियों के रूप में सहजते हैं. साझी विरासत हमारा स्वभाव है.
ऐसा न हो कि संपेरो के देश का संपेरा अपनी बीन भूल जाए और सांप की फुफकार पर स्वयं नाचने लगे. अलादीन का चिराग यहाँ के लिए एक आयातित चिराग है जिसका इस्तेमाल कुछ ख़ास किसिम के फिरकापरस्त खास खास समयों में अपनी रोटी सेंकने के लिए करते हैं. समय आते ही चिराग रगड़ देते है.
 बामुलाहिजा होशियार! 
एक बार फिर उन्होंने चिराग रगडा है और इस बार सामने उपस्थित हो गया है   "जिन्ना का जिन्न"!!

Sunday, 8 October 2017

अंतर आई.आई.टी. और जे.एन.यु. का!

वैश्विक स्तर पर यदि दो कालजयी विभूतियों के नाम मुझे लेने हों जिनकी प्रतिभा से मैं चमत्कृत हूँ तो वो दो नाम होंगे - महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन और महान सामजिक आर्थिक समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स. इन दोनों महात्माओं ने इस धरती को अपने बेमिशाल कृतित्व समर्पित किये हैं. इनके चिंतन में गहन दर्शन का पुट है और भविष्य तथा भवितव्य के लिए प्रखर दृष्टि है. दोनों ने अपने अपने क्षेत्र में जो प्रतिमान स्थापित किये हैं उसकी एक उर्वरा दार्शनिक पृष्ठभूमि है. इसलिए मै दोनों को क्रमशः एक वैज्ञानिक या समाजशास्त्री से बढ़कर एक अद्भुत स्वप्नद्रष्टा मानता हूँ जिन्होंने मानव संतति को भविष्य के लिए एक विलक्षण विचार पथ दिया. हाँ ये जरुर एक खासियत रही कि इनके सपनों के बीज विशुद्ध वैज्ञानिक धरा पर पनपे. ऐसा नहीं कि कल्पना के डैने पर सवार होना या सपनों के सतरंगी संसार में कुलांचे भरना केवल साहित्यकारों या विज्ञानेतर सामाजिक शास्त्रों के अध्येताओं का ही शगल है. केकुल नामक प्रसिद्द रसायनशास्त्री ने नींद में ही सपने में एक सांप देखा जो अपनी पूंछ अपने मुंह में दबाये था. इसी सपने से प्रेरित होकर उहोने बेंजीन जैसे एरोमेटिक साइक्लिक कार्बनिक यौगिकों की संरचना का अविष्कार किया. अवोगाद्रो की परिकल्पना, आर्कीमिडिज के बाथटब में स्नान की कहानी और लीवर की सहायता से पूरी धरती को उलट देने की उनकी कल्पना तो किंवदंती ही बन  गयी है.
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को उलटते हुए आइन्स्टीन ने जब स्पेशल और जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी को सामने रखा, क्वांटम मेकानिक्स में कणिका-तरंग द्वैत की बात की  और फिर उन्होंने गुरुत्वीय तरंगो की कल्पना की , तो वे वैज्ञानिक से ज्यादा कहीं दार्शनिक और सृष्टि के सूत्रपात के  आध्यात्मिक अन्वेषण के प्रखर स्वप्नद्रष्टा नज़र आये. हालांकि तब वे गुरुत्वीय तरंगों के अस्तित्व की कोई ठोस प्रायोगिक पुष्टि करने में सफल नहीं रहे और मन मसोस कर रह गए कि यदि उनके पास अति संवेदनशील यंत्र रहते तो इन अति क्षीण कमजोर और अल्प संवेदी तरंगो को माप लेते . खैर, उन्होंने न्यूटन के त्रिविमीय ढाँचे में एक आयाम समय का भी डाला .चूँकि न्यूटन के त्रिविमीय ढाँचे में पीछे की ओर भी जाने की दिशा थी जो समय पर लागु नहीं हो पाती इसलिए आइन्स्टीन ने स्पेस-टाइम जाल का सिंगल एंटिटी प्रतिदर्श रखा जिसमे पिंड के घूर्णन के कारण हुआ संकुचन उसे परिक्रमा पथ प्रदान करता है.  इस तरह उनके मॉडल में  दो पिंडो के पारस्परिक स्पेस-टाइम जाल का विकृत संकुचन (distortion) ही किसी पिंड को दूसरे पिंड की ओर धकेलता है जिसे हम उन दोनों पिंडों के बीच का गुरुत्वाकर्षण कहते है; न कि जैसा न्यूटन ने कहा कि दोनों पिंड एक दूसरे को अपने 'गुरुत्व-पाश' में खींचते हैं. उन्होंने न्यूटन के नियमों को अत्वरित गति लोक तक ही सीमित रखा और त्वरित गतिशील जगत में न्यूटन की निरपेक्षता को नकारकर अपनी सापेक्षिक अवधारणा को स्थापित किया. अर्थात किसी वस्तु या पिंड की स्थिति दर्शक की स्थिति पर निर्भर करता है. एक ही पिंड की स्थिति टाइम स्पेस जाल के भिन्न भिन्न रिफरेन्स फ्रेम में अवस्थित दर्शकों के लिए भिन्न भिन्न होगी. कणिका-तरंग द्वैत में उन्होंने पदार्थ और उर्जा को आपस में परिवर्तनीय माना.
विज्ञान जगत में आइन्स्टीन की दृष्टि ने हलचल मचा दी. कुछ वैज्ञानिकों ने तो इसे सिरे से ख़ारिज ही कर दिया. कुछ ने क्वांटम सिद्धांत का भी मज़ाक उड़ाया. लेकिन ध्यान रहे , यह विज्ञान की दुनिया है. यहाँ कोई वाद या पंथ नहीं होता. यहाँ लोग न्यूटन और आइन्स्टीन का झंडा टांगकर उसके नीची जिंदाबाद या मुर्दाबाद के नारे नहीं लगाते. यहाँ किसी सिद्धांत के आलोचक होने का मतलब है पूरी तन्मयता से उस सिद्धांत के उत्तरोतर शोध में संलग्न हो जाना और उसकी तार तार व्याख्या करना, स्वीकृति या अस्वीकृती की! ठीक वैसे ही जैसे आइन्स्टीन ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को खगोलीय पिंडों की स्थिति को मापने के क्रम में गलत साबित किया कि कैसे दूर तारों से आती किरणों का पथ मध्य में पड़ने वाले ब्लैक होल के प्रभाव में मुड़ जाता है.
आज आइन्स्टीन के गुरुत्वीय तरंग की परिकल्पना के करीब १०० वर्ष बीत गए. पर, वैज्ञानिकों ने अपने अदम्य शोध से प्रायोगिक तौर पर उन तरंगों की उपस्थिति को खोज निकाला है और अब तो भौतिकी का नोबल पुरस्कार इन्ही वैज्ञानिकों को मिल गया है. ये तरंगे कथित तौर पर १.२ बिलियन वर्ष पहले किसी दो ब्लैक होल के टकराने से उत्पन्न हुई थी .और आगे हम अब यह आशा भी कर सकते हैं कि आइन्स्टीन की कल्पनाओं की गुत्थी पर यूं हीं पड़ताल की प्रक्रिया जारी रही तो शीघ्र ही इस सृष्टि के निर्माण का सूत्र भी हमारे हाथ होगा !
अब हम अपने दूसरे प्रिय नायक समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स की बात करें. समाज में अर्थ के बंटवारे की पड़ताल मार्क्स ने उत्पादन के साधन के स्वामित्व के अलोक में की. उन्होंने दो वर्ग चिन्हित किये . एक इन साधनों का प्रभु - 'बुर्जुआ' वर्ग, और दूसरा इस पर आश्रित श्रमिक वर्ग - 'सर्वहारा'.  'दोनों के मध्य की विषमता और एक के द्वारा दूसरे के शोषण और दमन की त्रासद प्रक्रिया असंतोष के गहरे बीज बोती है. उत्पाद का सरप्लस मालिक का खज़ाना भरता है और नौकर तिल तिल कर मरता है. अपनी ही बनायी वस्तु जब निर्माता श्रमिक को बाज़ार में खट्टे अंगूर की तरह अप्राप्य नज़र आती है तो उसमे गहन विरसता का भाव उत्पन्न हो जाता है और यहाँ से शुरू होती है श्रमिक मन में असंतोष के गहराने की तीव्र प्रक्रिया. बुर्जुआ 'थीसिस' के विपरीत एक विद्रोही सर्वहारा 'एंटी थीसिस' जन्म लेना शुरू होता है और इन दो प्रबल 'ध्रुवों' के मध्य विद्रोह की भावना घनीभूत होकर इतनी तीक्ष्ण हो जाती है कि 'वर्ग संघर्ष' का सूत्रपात होता है जिसकी परिणति वर्गहीन समाज के 'सिंथेसिस' में होती है. मार्क्स ने बड़ी तार्किक कुशलता और वैज्ञानिक ढंग से इस प्रक्रिया के आलोक में समाज की समस्त संस्थाओं यथा, शिक्षा, धर्म, विवाह आदि की व्याख्या बुर्जुआ वर्ग के हितों को साधने वाले टूल के रूप में की. आप उनके सिद्धांतों से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी व्याख्या और मीमांसा की वैज्ञानिकता पर दांतों तले अंगुली दबाने के सिवा कुछ नहीं बचता. उनकी अद्भुत सामजिक आर्थिक विवेचना के 'मैटेरिअल डाईलेकटीज्म' पर हेगेल और ऐंजल्स के दार्शनिक द्वैत का असर बतलाते हैं. उन्होंने बड़ी दक्षता से समाज में क्रांतिकारी संघर्ष की अवधारणा रखी.
बड़ी तेजी से समकालीन परिवेश में मार्क्स की अवधारणा अपना जादुई असर दिखाते दिखी. समाज का प्रबुद्ध शिक्षित वर्ग इस अद्भुत समाज-वैज्ञानिकी की ओर उन्मुख हुआ. एक नवीन बुद्धिजीवी धारा से सामाजिक धरा सिक्त हुई . समाज, साहित्य, संस्कृति सर्वत्र इसकी धूम सुनाई दी. पर, दुर्भाग्यवश यह विचार दर्शन अपने ऐसे कपूतों के हत्थे चढ़ा कि वाद और पंथ के दुर्गन्धमय पंक में धंसकर इसका बंटाधार हो गया. यह सामाजिक दर्शन राजनितिक कुचाल और सियासी स्वार्थ में फंस गया. मार्क्स की वैचारिक आत्मा के महत आदर्श  को उनके ही मार्क्सवादी कपूतों ने अपनी स्वार्थी सत्ता लोलुपता में छलनी छलनी कर दिया. समाज-परिवर्तन के इस अनोखे क्रांतिकारी दर्शन  को इन मार्क्स विध्वंसक कुलवीरों ने सत्ता का औज़ार बना लिया और इसकी इस कदर ह्त्या कर दी कि अब यह क्यूबा से मिटकर कोलकाता के रास्ते केरल में अपने पिंड दान की तैयारी कर रहा है.
अपने इन दो सर्वप्रिय आदर्शों के उपरोक्त उद्वरणों के आलोक में मैं आपके समक्ष विज्ञानं के साधक आलोचक सपूतों और विज्ञानेतर शास्त्रों के अंध'पंथी' झंडाधारी कपूतों के बीच की रेखा को खींचना चाहता हूँ.  हमने दो प्रतिगामी सिद्धांत ,कणिका बनाम तरंग, के पुरोधा न्यूटन और आइन्स्टीन को समान रूप से पूजा और अपनाया. ऐसे भी विज्ञान में दो विपरीत ध्रुवों में आकर्षण ही होता है. उन्हें किसी ने  दक्षिणपंथी और वामपंथी डिक्लेयर कर अलग अलग झंडों के नीचे खड़ा कर लड़ाया नहीं. नतीज़ा आपके सामने है.
संभवतः यहीं विज्ञान और अ-विज्ञान में  अंतर है .

यहीं आई.आई.टी. और जे.एन.यु. में अंतर है!