तीर चलाया कलियुग के
एकमुखी रावण ने ही,
सतयुगी दशानन पर,
भारी भीड़ में।
गिरा दशग्रीव,
धरा की गोद में।
किया था अपहृत,
बेटी को जिसकी।
धनुर्धारी एकानन पौलस्त्य,
सहेजा फिर दम्भ-दीप्त भाव से ,
मन-ही-मन,
भस्म कुम्भीनस के।
स्फ़िंक्स-सी
अपनी दैत्यात्मा में!
सुनायी अपनी वीरगाथा
वि-भक्त कार्यकताओं में,
पृथक-पृथक अथक!
सर्वांग विभक्तियों में,
कारक की अपने।
हे दशकन्धरों!
इस लंकेश ने,
दशमौलि को,
दशवदन के द्वारा,
दशमुख शर से,
लंका के लिए,
लंकापति के,
स्कंध से,
दशाशीश को विभक्त कर,
राख कर दिया है,
रणभूमि में!
विराज गए
राम तो कब के,
प्रासाद में अपने।
चौकीदारी करने
अपनी चढ़ौती की!
रेंगते तिलचट्टों और
भिनभिनाती मक्खियों
के इस आवर्त्त में।
मचाएँगे धूम
संततियों संग अपनी,
अब भी कृतिकर ही,
कलियुग के!
गूँजा रव असुरों का।
रावण रावण रो रिया,
अगले बरस तू फिर से आ!

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