अश्वत्थामा शापित है जीने को। इस भारतखण्ड में। सपनों में। टुकड़ों-टुकड़ों में।एक के बाद एक चित्र सरकता है।
……..राजा गुरुकुल आए हैं। राजमुकुट मुख्य द्वार पर उतारकर रख दिया है। उपानह भी उतर गए हैं।अँगरक्षक वहीं रुक गए हैं।कुटीर में गुरु अपने ऊँचे आसान पर विराज रहे हैं। सामने फर्श पर राजा साष्टाँग मुद्रा में हाथ जोड़े।………
काल क्वांटम की कला में गतिमान है।प्रकाश से भी तेज।अगला दृश्य -
…….मास्टर को सरपंच साहेब हड़का रहे हैं, अवमानना के आरोप में! गलती से मास्टर ने सही लिख दिया है। सरपंच बैठा है ऊँचे इजलास पर। मास्टर नीचे थरथर काँप रहा है। डर के मारे खड़ा। ……
अश्वत्थामा बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।
राजा जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते। कौन सच । वह सच। या यह सच!
जनक को ढकेलकर अश्वत्थामा महर्षि के चरण पकड़ लेता है। हाँ, महर्षि कौन सच? मास्टर या सरपंच!
अष्टावक्र का आर्ष अट्टहास गूँजता है - दोनों सच। वत्स, दोनों सच। पहले मास्टर सच। और अब सरपंच सच !
अश्वत्थामा मारा गया था कभी ? फिर आ गया क्या? :)
ReplyDeleteवह हाथी था😄
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