Wednesday, 6 November 2019

खकिया-कलुआ भाई-भाई!

बाप रे!
सहनशीलता चरम सीमा पर है,
सभी सह रहे हैं, एक दूजे को।
सहिष्णुता में ही बदलता है रंग,
देख खरबूजा, खरबूजे को।
खाकी के कालेपन में ,
कल्लू भी खकिया गया है।
सहनशीलता के चक्कर मे
कानून भी सठिया गया है।
बीच चौक पर ,
कल्लू सीटी बजा रहा है।
और खाकी, सी सी टी वी का,
'एंगल' सजा रहा है।
कलुआ चालान काट रहा है।
खकिया गीता बाँट रहा है।।
'नारद' शनि बन गए हैं।
और शनि! सूरज बन ,
बाप-से तन गए हैं।
सुना है, जांच होगी।
न झूठ होगी, न साँच होगी।।
पंचों की पंचाट होगी।
न्याय की बंदरबाँट होगी।।
चैन के रैन-बसेरे होंगे।
सुलह के सबेरे होंगे।।
कुछ 'तेरे' कुछ 'मेरे' होंगे।
चोर-चोर मौसेरे होंगे।।
जनता की फिर होगी कुटाई,
खकिया-कलुआ भाई-भाई!
संस्कृति का ' शील'  हरण होगा।
सहिष्णुता की सभ्यता का वरण होगा।।
जब  से सभ्यता के इस नवोद्घोष में,
आबालवृद्ध सब  नव-सहिष्णु हुए हैं।
 विचारों के क्षीर सागर में हम,
जागे-से लगते विष्णु हुए हैं।

28 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 06 नवम्बर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी,अत्यंत आभार आपका।

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  3. विचारों के क्षीर सागर में हम,
    जागे-से लगते विष्णु हुए हैं।
    सत्यवान, सार्थक चिंतन

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  4. जवाब नहीं इस गलथेंथरई का....

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  5. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 07 नवंबर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  6. आदरणीय विश्वमोहन जी प्रणाम, सर्वप्रथम आपको इस अनूठी एवं चिंतन से परिपूर्ण सृजन हेतु बहुत सारी शुभकामनाएं। आपकी लेखनी ऐसे ही अनवरत चलती रहे ऐसी कामना करता हूँ। सादर 'एकलव्य'  

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  7. वाह! क्या शब्दो का चयन है - "खकिया कलुआ"। अप्रतिम।
    अगर जो लोग कुछ वर्ष पहले के हो-हल्ला में सहिष्णुता और असहिष्णुता का परिभाषा नहीं समझ पाए थें पुनः वो अवसर आ गया है...समझ लें, नहीं तो फिर चूक जाएँगे।

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  8. वर्तमान में यही तो हो रहा है साहब।
    वकील गिरी और पुलिश वाले मिल जाते है और फिर आम जनता की रक्षा का जाल बुनने की बजाए इसको दोनों तरफ से लुटा जाता है।
    इस विषय पर कवि की जागृति जरूरी है। शानदार रचना।

    मेरी नई पोस्ट पर स्वागत है👉👉 जागृत आँख 

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    1. आपके पृष्ठ का अवलोकन मैंने पहले भी किया है और आपकी अद्भुत विचार शैली से प्रभावित भी हुआ हूँ। अत्यंत आभासर।

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  9. अप्रतिम रचना। भाई भाई भी लड़ते हैं कभी कभी !!!
    इस लड़ाई से जनता कुछ सीख ले तो बेहतर।

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  10. समसामयिक विषय पर सार्थक, सटीक रचना।
    बहुत बढ़िया..

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  11. वाह!!विश्वमोहन जी ,खकिया और कलुआ......मान गए आपकी लेखनी का लोहा ...(पहले से ही माना हुआ है ) समसामयिक विषय पर ...सशक्त प्रहार करती हुई रचना 👍👍

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    1. आप अक्सर हमें झाड़ पर चढ़ा देती हैं। बहुत आभार।

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  12. बहुत खूब ,वर्तमान परस्थितियों पर करारा व्यंग्य ,सादर नमस्कार

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    1. जी, अत्यंत आभार। प्रणाम।

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  13. उत्तम।
    वर्तमान हालात पर आपका सटीक चिंतन और लेखन बेहद उम्दा आदरणीय सर ।
    सादर नमन शुभ रात्रि 🙏

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    1. बहुत बहुत आभार आपका।

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  14. समसामयिक विषय पर करारा व्यंग आदरणीय
    विश्वमोहन जी । प्रतीकों के रूप में अभिनव प्रयोग । लेखन शैली हमेशा की तरह धारदार और शानदार। 👌👌👌सादर शुभकामनायें और बधाई 🙏🙏

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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  15. वर्तमान स्थिति का बहुत ही सटिक आकलन।

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