Thursday, 13 September 2018

जय हिन्द, जय हिन्दी!!!


मेरे लिए सितम्बर महीना भी न वैचारिक व्यस्तताओं का महीना बन जाता है! शिक्षक दिवस (दार्शनिक राधाकृष्णन का जन्म दिवस), अभियंता दिवस (इंजीनियर विश्वेश्वरैया का जन्म दिवस), हिदी दिवस (राजभाषा हिंदी का जन्म दिवस), फिर इस देश की आज़ादी का स्वाद जिनकी अमर कुर्बानियों के कारण हम चख रहे हैं उस प्रातःस्मरणीय  'शहीद-ए-आजम' सरदार भगत सिंह का जन्मदिवस और संगीत की सुर-सम्राज्ञी एम एस सुब्बालक्ष्मी का जन्म दिवस.  ये सभी किरदार किसी न किसी रूप में हमारे अन्दर के भारतीय संस्कारों को कुरेदते हैं . और सच कहूँ तो ये समस्त जन्म दिवस समारोह मेरे अंतर्मन में श्रद्धांजली समारोह के रूप में ज्यादा उभरते हैं. अमूमन इन दिवसों पर इन किरदारों के बारे में हमारे मुख से कुछ ऐसे ही भाव से भरे शब्द निकलते है जो आम तौर पर निधन के बाद निकलते हैं. यह हमारा स्वभाव हो गया है. हमें ये करना चाहिए, हमें वो करना चाहिए, हम उनके इस रास्ते से अलग हो गए, ...आदि आदि. और, अंत में सारा ठीकरा या तो सरकार के सर फोड़ देते हैं या फिर रो पीट के कुछ शाश्वत चिरंजीवी संकल्पों का उच्चारण कर  अगली श्रद्धान्जली दिवस तक चुप हो जाते हैं.
अब देखिये न, इसी कड़ी में कल हिंदी दिवस है. पूरा देश कल पानी पी-पी के हिंदी की दुहाई देगा. चिल्ला चिल्ला कर कसमें खायेगा 'हमने ये नहीं किया, हमने वो नहीं किया, हम ये करेंगे, हम वो करेंगे.' फिर अगले ही शैक्षणिक सत्र में मेकाले की मानस संतति-धारा को चिरंतन बनाने हेतु किसी अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय के नामांकन फार्म की लम्बी लाइन में चहकते नज़र आयेंगे. लेकिन, कम से कम, हिन्दी दिवस के दिन तो 'निज-भाषा -गौरव' की उत्ताल तरंगों से पूरा देश आप्लावित रहेगा ही. हो भी क्यों नहीं! मैथिली शरण जी सुना जो गए हैं:
'जिसे न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है. '
इसलिए यह श्रद्धांजली उत्सव कहीं दिवस के रूप में मनेगा तो कहीं सप्ताह भर! तो, कहीं पखवाड़े भर का इंतज़ाम! हिंदी के दिवस, सप्ताह और पखवाड़ों की दूकान लग गयी है. बाज़ार सज गयी है. उत्सवों की भी 'ब्रांडिंग' हो गयी है अब विशुद्ध बाजारू ढंग से. सब कुछ अब बाजारू हो गया है . और, यदि हम सच कहें तो बाज़ार ही वह जगह है, जहाँ फूहड़ गंवार 'भाखा' भी सज धज कर सुहागन 'भाषा' बन जाती है. जहाँ सभी अपनी अपनी फूहड़ता को फूंककर एक समरूप अभिव्यक्ति के परिधान में सजकर साथ खड़े हो जाते हैं. एक दूसरे को अपनी बात बताने-बुझाने को और दूसरे की बात सुनने-समझने को भावों और शब्दों की सम्पुट शैली का सूत्र तलाश लेते हैं. यह सब स्वाभाविक रूप से होता है . न कोई दबाब , न कोई आरोप और न कोई प्रत्यारोप ! जो बाज़ार में बिका, वो टिका! जिसका भाव जितना गहरा, वो उतना ही ठहरा! इस बात को सबसे पहले किसी ने समझा-समझाया तो वह हमारे फक्कड़-फकीर कबीर थे ;
"कबीरा खडा बाज़ार में लिए लुगाठी हाथ
जो घर फूंका आपने, चले हमारे साथ." और आगे
"कबीरा खडा बाज़ार में सबकी मांगे खैर
ना काहू से दोस्ती, ना कहू से बैर."
जी, तो मेरे कहने का मतलब यहीं है कि हमारी वर्तमान हिंदी ने भी अपने इस स्वरुप में गढ़े जाने के पहले किसिम-किसिम की मंडियों की तेज़ी और मंदी की खुरदराहट और फिसलन से गुजरते हुए अपनी जमीन तैयार की है. यह प्रक्रिया सनातन है और सनातन जारी रहेगी.  हाँ, पहले ही मैं आपको साफ़ कर दूँ कि भाषा के दो रूप समानांतर चलते हैं. एक उसकी बोल चाल और रोज रोज के चलन का उसका सामजिक व्यावहारिक चोला और दूसरा उसका साहित्यिक झोला! आगे आगे समाज ,पीछे पीछे साहित्य! आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है.
मैं कोई भाषा विज्ञानी नहीं. इसलिए मेरी बातों का आप अपनी भारी-भरकम बुद्धि के शक्तिशाली माइक्रोस्कोप से छिद्रान्वेषण न करें. मुझे पता है बीच-बीच में मेरे द्वारा प्रयोग किये जा रहे अंग्रेजी शब्दों पर आप अपनी भौहें तान रहे है. अरे भाई, यहीं तो भाषा का बाज़ार है. चलिए, भगवान कृष्ण की बात तो  मानेंगे न!
 " यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः | स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते "
( समाज के श्रेष्ठ कुलीन जन जैसा आचरण करते हैं, उसी को प्रमाण मानकर आम जन अनुसरण करते हैं.)
 अपनी तत्सम शब्दावली समृद्ध कविता 'राम की शक्ति पूजा में' महाकवि निराला ने भी 'मशाल' शब्द का प्रयोग किया है. यह हिंदी का शब्द नहीं. जब साहित्य में हमारे कुलपुरुष ऐसा कर सकते हैं तो फिर कृष्ण भगवान द्वारा दिए गए 'डिस्काउंट' का 'लाभ' हम क्यों नहीं उठाएं! बाज़ार है भाई! मैं हिन्दी साहित्य का इतिहास उकटने नहीं जा रहा और न ही राजभाषा के राजकीय पल्लवन , पुलकन और पालन पोषण का प्रसंग छेड़ने! मैं तो उस कलकल छलछल हिन्दी सरिता के सरल प्रवाह की बात कर रहा हूँ जो मुगलों के मीना बाज़ार में उर्दू की मिठास घुलाती, अंगरेज बहादुर के कंपनी बाज़ार में सियासत के ककहरे सीखती, स्वाधीनता के संघर्ष काल में माटी के मूल्यों को सहेजती, उसमें सजती-संवरती, स्वातंत्र्योतर भारत के समाजवादी और राष्ट्रवादी कलेवर में निखरती, उदारवादी खुले बाज़ार में पसरती और अब सूचना क्रांति के साइबर-बाज़ार में इन्टरनेट के सोशल साईट पर सज-धज कर खिलखिलाती जन-मानस को लुभा रही है . साथ-साथ इसकी मुंह बोली बहने और सखियाँ भी अपने-अपने प्रान्तों में वैसे ही अपने उपभोक्ताओं से महारास रचा रही हैं. कहा न, बाज़ार है. जो ग्राहक की पसंद होगी, वहीँ बिकेगा.
हाँ, तो मैं बता दूँ कि बाज़ार तलाशने ही एक डच व्यापारी कर्टलर आये थे १६८५ में सूरत. मकसद था तिजारत और समस्या थी जुबान की. भाषा की. अब जहाँ तिजारत करेंगे तो भाषा भी तो वहीँ की जाननी होगी. हिन्दी गुजराती के मिश्रित रूप से उनकी मुलाक़ात हुई. सो, उन्होंने रच डाला - हिन्दी का पहला व्याकरण जो ज्यादा हिन्दीपरक ही था. १७१९ में ईसाई धर्म प्रचारक बेंजामिन शुल्गे मद्रास आया. बुरा न माने तो लगे हाथ ये भी बता दें कि जहाँ भी धर्म के प्रचार की जरुरत पडी तो समझिये ये भी परोक्ष रूप में तिजारत ही है. अध्यात्म का प्रचार या तिजारत नहीं किया जाता. वह एक मूल्य है, दर्शन है, संस्कृति है, अंतस की चेतन उत्कंठा का स्वाभाविक उच्छवास है, मन की भाषा है जो अपने आप फैलती है , जैसे हिन्दी फ़ैल रही है. हाँ तो, शुल्गे ने भी उसी भाषिक परम्परा में 'गरमेटीश हिंदी व्याकरण' नाम से देवनागरी अक्षरों में हिंदी व्याकरण की रचना की. फिर लवेडेफ़ नामक पादरी ने भी पूर्वी बोलियों पर आधारित व्याकरण की किताब लिखी. तो एक बात तो साफ़ हो ही गयी कि हिन्दी व्याकरण की पहली किताबें विदेशी लोगों ने मद्रास और सूरत जैसी जगहों पर ही लिखी. यह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि हिंदी बोलियों का प्रभाव क्षेत्र कितनी दूर तक फैला था, भले ही उसका मुलभूत कारण व्यापार और धर्म-प्रचार ही रहा हो!
 फिर, ब्रिटेन की कंपनी 'ईस्ट इंडिया कंपनी'  आयी. आयी तो  थी तिजारत करने लेकिन वहाँ से धीरे धीरे  सियासत का रास्ता खोल गयी. मुनाफ़ा कमाने के लिए ऐसे एजेंट तैयार करने थे उसे जो तिजारत और सियासत दोनों मुकामों को मुकम्मल करने में उनकी मदद कर सके. १८१३ में ब्रिटिश संसद में भारत की शिक्षा-नीति की रुपरेखा रची गयी. एक लाख रुपये का प्रावधान रखा गया, कंपनी को शिक्षा पर खर्च करने के लिए. बात प्राच्य और पश्चिमी शिक्षा के टकराव पर आकर अटक गयी. किसको बढ़ावा दें! २० सालों तक मशक्कत चली. प्राच्य घड़े को खुश करने के लिए अतिरिक्त ३१००० रुपये का प्रावधान किया गया. १८३३ में नया आज्ञा (चार्टर) पत्र  आया ब्रिटेन की संसद का. लार्ड वेलेस्ली गवर्नर जनरल थे. कानूनी सदस्य के रूप में आये - लार्ड मेकाले, जो स्वयं प्राच्य साहित्य के प्रति भयंकर दुराग्रहों से परिपूर्ण एक अंग्रेजी साहित्यकार और लेखक थे. भारत भूमि को चोट पहुंचाने वाला उनका यह वक्तव्य चिर स्मरणीय है कि 'यदि सम्पूर्ण प्राच्य साहित्य को एक जगह इकठ्ठा कर दिया जाय तो अंग्रेजी साहित्य के लाइब्रेरी की एक आलमारी भर ही भर पाएगी.' खैर, १८३५ में मेकाले ने भारत की शिक्षा नीति का एक प्रारूप रखा. 'क्लास'(अभिजात्य वर्ग) को पढाओ, वह 'मास'(आम जनता) को पढ़ायेगा.' इसे 'अधोमुखी निस्यन्दन सिद्धांत'(downward filtration theory) कहा गया. मेकाले ने अपने प्रारूप में कहा, "
"We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern… a class of persons Indian in blood and colour , but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population.” (Selections from Educational Records, Part-1, Edited by H. Sharp; Reprint Delhi : National Archives of India, 1965, Pages 107 – 117 )
(हम एक ऐसे वर्ग का निर्माण करें जो हमारे और हमारे द्वारा शासित उन करोड़ों लोगों के बीच एक दलाल की तरह काम करे..... एक ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग में हिन्दुस्तानी हो लेकिन रूचि, सोच, नैतिकता और मेधा में अँगरेज़ हो. उसी वर्ग के हाथो में हम इस देश की स्थानीय बोली और भाखाओं को परिष्कृत करने का जिम्मा सौंपेंगे.........). मूल भावना का हमने अनुवाद कर दिया है .
 कालांतर में यहीं 'क्लास' मेकाले की मानस-संतान बनकर आज तक पुष्पित-पल्लवित हो रहा है. फिर भी मेकाले ने प्रारम्भिक शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को ही रखा.
ऐसा नहीं था कि अंगरेज़ शासकों में प्राच्य साहित्य या दर्शन के पैरोकार नहीं थे. सर विल्लियम जोंस कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट (तब कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट ही था) के जज बनकर आये थे. उन्होंने भारत में हिन्दुओं और मुसलामानों के उत्तराधिकार क़ानून की रूप रेखा बनाने के चक्कर में भारतीय साहित्य का विषद अध्ययन किया. अपने गहन शोध से यह स्थापित किया कि संस्कृत ग्रीक और लैटिन की सहोदरी है तथा गोथिक, कल्तिक और फारसी भाषाओं से इसका गहरा तादात्म्य है. इस निष्कर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भाषा और मज़हब के सम्बन्ध के मिथक को ध्वस्त कर दिया. यानि भाषा किसी मज़हब की बपौती नहीं!  फोर्ट विल्लियम कॉलेज में कंपनी के डॉक्टर जो अब सर्जन बन गए थे, डा. गिलक्राइस्ट, को भाषा विभाग का प्रमुख बनाया गया. तब तक कंपनी के सियासत की भाषा प्रमुखत: फारसी ही थी. गिलक्राइस्ट पहले सख्स थे जिन्होंने यह जरुरत समझी कि राज काज की भाषा हिंदी हो और उन्होंने तदनुरूप कार्य किया. बताते चलें कि सिविल सेवा के अंग्रेज अधिकारियों को इसी कॉलेज में प्रशिक्षण दिया जाता था. गिलक्राइस्ट ने अपनी योजना को ठोस जामा पहनाते हुए तीन ग्रंथों की रचना की :-
१. अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोष
२.हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण और
३. प्राच्य भाषा विज्ञान
  अब पूरी कहानी सुनाने के बजाय सारतः और बहुत संक्षेप में हम यह बता देना चाहते हैं कि जैसी अपेक्षाएं आयी उसी रूप में हिंदी का चाल और चरित्र भी गढ़ता गया. साहित्य भी समान्तर चलता रहा. देश में आजादी की लड़ाई ने अंगरेजों के उस बाज़ार को ध्वस्त करने के लिए तेज़ी पकड़ी. समूचे देश में उबलते जन-जन के आक्रोश की भावना को साझा करने के लिए हिंदी फिर आगे आयी. कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक क्रांतिकारी, विद्रोही, अहिंसक आन्दोलनकारी और भिन्न भिन्न रंगों में रंगे आजादी के बलिदानी सिपाही आपस में संपर्क सूत्र जोड़ रहे थे. इस दौर में हिन्दी का जोर-शोर से प्रसार हुआ. स्वाभाविक लय में आवश्यकता से उद्भूत होकर. बिहार में भूदेव मुखर्जी, बंगाल में राजा राम मोहन राय (जो स्वयं अंग्रेजी सीखने के प्रबल पक्षधर थे), केशव चन्द्र सेन, बंकिम चन्द्र, जस्टिस श्यामचरण मिश्र, रमेशचंद्र दत्त, अरविंद घोष, महाराष्ट्र में लक्ष्मण नरायण गर्दे, बाबूराम विष्णु पराडकर, माधवराव सप्रे, पंजाब में लाला लाजपतराय, लाला हंसराज, स्वामी श्रद्धानंद, राजस्थान में लज्जाराम मेहता, गौ ही ओझा, गुजरात में स्वामी दयानंद तथा गांधी इन सभी नेताओं ने अपना भरपूर योगदान दिया. 
देश भर की माटी का सुगंध बटोरकर हिन्दी की शब्द संपदा बढाने का जो काम विद्यापति, कबीर, नानक, रैदास, मीरा, मलूकदास, जायसी, कुतुबन, मंझन, सूर, रहीम और तुलसी सरीखे कवियों ने किया, इस दौर में आजादी के सूरमाओं ने भी अपनी आवाज को मजबूत करने के लिए बखूबी वही किया और परिस्थिति की मांग पर आज़ाद भारत के लिए जब राजभाषा के चुनाव का वक्त आया तो इसी चौदह सितम्बर को एक निर्णायक मत की बढ़त लेकर आज़ादी के दिनों में राष्ट्रभाषा के रूप में गढ़ चुकी हिंदी ने राजभाषा के पद को सुशोभित किया. अब तो राजभाषा विभाग खुल गया है . बजट खर्च करने और नीतियों के बनाने में सरकार कहीं नहीं चूकती है. अब यदि मेकाले की मानस-संतान 'बाबू' से भूल-चूक लेनी देनी हो रही है तो इसमें सरकार का क्या दोष!
बाबू का बच्चा किस माध्यम में पढेगा, कौन सी फिल्म देखेगा, कौन सी पोशाक पहनेगा, कौन सा विषय पढ़ेगा, कौन सी कविता समझेगा इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं. काका हाथरसी ने इन बाबुओं की बात कही है:
बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ काका ' , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ काका ' कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत
 यह लोकतंत्र है.  विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार की हुंकार भरने वाला देश जिसके तहत ही हम यह लेख बिंदास होकर लिखे जा राजे हैं, ' कोऊ नृप होहुं हमही का हानि!'
हाँ, कुल मिलाकर मेरा मानना है कि हिंदी धड़ल्ले से पसर रही है. मुझे किसी के छद्म विधवा-विलाप से कोई मतलब नहीं. समाचार वही बिकेगा जो हिन्दी में हो या भारतीय भाषाओं में हो. टी आर पी उसी चैनल की बढ़ेगी जिसके दर्शक ज्यादा हों, फ़िल्में उसी भाषा की मुनाफा कमाएगी जिसे अधिक से अधिक लोग समझ सकें. भाषा वहीँ बाजी मारेगी जिसका बाज़ार बड़ा हो.  हाँ, मेरे लिए हिंदी का मतलब उसकी सभी बहनों से भरा पूरा परिवार है. अब हिन्दुस्तान में कोका कोला तभी बिकेगा जब ' ठंडा का मतलब कोका कोला' होगा. यानी प्रचार हिंदी में. राजनीति करनी है तो देवेगौडा साहब और सोनिया गाँधी को हिन्दी बोलनी सीखनी होगी और उन्होंने बखूबी सीखकर बोला भी. और तो और, अब ओबामा , ट्रम्प और विदेशों के अन्य नेता भी हिंदी बोलना अपनी शान समझ रहे हैं. कभी आपने ऐसी कल्पना की थी! संयुक्त राष्ट्र संघ में वाजपेयी, चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव तो बोलकर आ ही गए. हिन्दी पखवाड़े में ही जन्मे (१७ सितम्बर) हमारे वर्त्तमान प्रधान मंत्री आज जब विदेशी धरती पर अपनी धारा प्रवाह शैली में तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अपने भाषण का आगाज़ हिन्दी में करते हैं तो किस भारतीय का सर गर्व से ऊँचा नहीं उठ जाता. 
इन्टरनेट और सोशल साईट ही नयी दुनिया के सूचना-वाहक और विचारों के आदान-प्रदान केंद्र है और वह हिन्दी से 'पटे' हैं और 'पटते'  चले जा रहे हैं. विज्ञान, इंजीनियरी और मेडिकल की भाषा पर मैं फिर कभी बात करूँगा. जैसी मिट्टी हो, वैसी ही फसल बोई जाती है और जिसका सामान खरीदना है उसकी भाषा तो सीखनी ही होगी! अभी मेरा जोर सिर्फ राष्ट्र-भाषा पर है. हम कई कदम आगे निकलकर विश्व-भाषा की ओर अब बढ़ चुके हैं. मॉरिशस के विश्व हिन्दी सम्मलेन की कार्यवाही देख लें. हिंदी मस्त चाल में संपुष्ट होकर फ़ैल रही है. हमें सिर्फ मेकाले के मानस-पुत्रों के रक्तबीजी प्रसार को रोकना है. बाज़ार उनसे भी निबट लेगा एक दिन !  
जय हिन्द!! जय हिंदी!!!