गलथेथरई

गलथेथरई

▼
Wednesday, 22 July 2026

कुछ बोलो जंतर मंतर

›
  नहीं ठहरता काल तनिक, तुमसे जादा कौन जाने। कितने आए कितने गए, लंगड़े, बहरे काने। ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर, आ गए आलमगीर। रुन्ड-मुन्ड चीखे द...
10 comments:
Thursday, 4 June 2026

ख़बरनवीस बाज़ीगर बनिया!

›
अनजाने ॐकारा भरती, गिरती-पड़ती हर की पौड़ी। ‘यू टू वर’ नीट धुरफ़ंथी, नहीं सुहाती फूटी कौड़ी।   कबडी, कबडी, कबडी करती, चौथे खम्भे तक जा दौड़ी...
11 comments:
Tuesday, 5 May 2026

कलम पर पहरा!

›
 क्या कहा कवि? कविता कह नहीं पा रहा! अन्दर का खदबदाता इंकलाब भीतर ही घुटता अटका ठहरा है। कारण, मुल्क का आम जन बहरा है। हो गई पंगु, पन्नों पर...
10 comments:
Tuesday, 24 March 2026

बधाई जीते जी इलाहाबाद!

›
  हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही...
6 comments:
Friday, 27 February 2026

सरपंच सच

›
अश्वत्थामा शापित है जीने को। इस भारतखण्ड में। सपनों में। टुकड़ों-टुकड़ों में।एक के बाद एक चित्र सरकता है।  ……..राजा गुरुकुल आए हैं। राजमुकुट...
10 comments:
›
Home
View web version

बोलेंगे तो बोलेगा कि बोलता है, गांठ मन की गने-गने खोलता है.

My photo
विश्वमोहन
बी ई (आई आई टी, रुड़की), एम टेक (आई आई टी, बॉम्बे), विधि स्नातक (दिल्ली विश्वविद्यालय)
View my complete profile
Powered by Blogger.