Tuesday, 5 May 2026

कलम पर पहरा!

 क्या कहा कवि?

कविता कह नहीं पा रहा!

अन्दर का खदबदाता इंकलाब

भीतर ही घुटता अटका ठहरा है।

कारण,

मुल्क का आम जन बहरा है।

हो गई पंगु, पन्नों पर लेखनी,

संशय का तम गहरा है।

साफ साफ कह न! सच बोल!

कि स्याही सूख रही,

क्योंकि

कलम पर पहरा है।

10 comments:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 09 मई, 2026
    को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
      

    ReplyDelete
  2. वर्तमान समय में सत्ता की विसंगति यों के समक्ष बुद्धिजीवियों का मौन खेद जनक है! कलम के पहरे यदि कोई तोड़ सकता है तो स्वयं सजग कवि क्योंकि कलमकार ही समाज और सत्ता को सही आईना दिखा सकता है!सभी कवियों से विनम्र आग्रह 🙏
    --*--*----*---*
    सच देखो आँखे खोलकर,
    हटा दो कलम के पहरे कवि!
    भरो हुंकार ऐसी सुन ले
    जो कान हुए बहरे कवि!

    बड़ा भयावह प्रतीत हो रहा
    तुम्हारा अनवरत मौन कवि!
    तुम डरे तो जन की पीड़ा को
    देगा शब्द फिर कौन कवि!
    ना होगा ईलाज़, नासूर बनेंगे,
    जो जख्म लगे गहरे कवि!

    छद्म जनसेवक पहन मुखौटा
    भरते सेवा का स्वाँग कवि!
    मिल लूट रहे सुख सत्ता का
    बाँटें धर्म की भांग कवि!
    नफरत लील गई भाईचारा
    लोग भूले प्यार के ककहरे कवि!
    🙏🙏

    ReplyDelete
    Replies
    1. वाह! हार्दिक आभार इस सुंदर, सारगर्भित और सार्थक काव्यात्मक टिप्पणी का जो मूल कविता से भी बहुत ज्यादा प्रभावशाली और मारक है।

      Delete
  3. मुल्क का आम जन बहरा है।
    हो गई पंगु, पन्नों पर लेखनी,
    संशय का तम गहरा है।
    साफ साफ कह न! सच बोल!
    कि स्याही सूख रही,
    क्योंकि
    कलम पर पहरा है।
    https://halchalwith5links.blogspot.com/2026/05/4737.html

    ReplyDelete
  4. सारे पहरे तोड़ने होंगे, टूटे दिल फिर जोड़ने होंगे, सुंदर सृजन

    ReplyDelete
  5. सच आपके उसके लिए झूठ हैं
    उसके मन में झांकिए जरा
    जहां जर्रे जर्रे लड्डू रहे फूट हैं :)

    ReplyDelete
  6. बहुत सही। हार्दिक आभार।

    ReplyDelete